14 नवंबर, 1969 को अपने पिता के 80वें जन्मदिन पर किसी विश्वविद्यालय के दीक्षांत समारोह में इंदिरा ने कहा था- ‘जवाहरलाल नेहरू को मैं एक पिता और एक नेता के साथ-साथ एक दोस्त के रूप में भी जानती थी.’ किसी भी पिता के लिए शायद इससे बढ़कर प्रशंसोक्ति नहीं हो सकती कि बेटी कहे कि मेरे पिता मेरे दोस्त भी हैं या थे.

बेटियों के बचने, पढ़ने और आगे बढ़ने के लिए यह भी जरूरी हो सकता है कि उनके पिता उनके दोस्त बनें. पिता और बेटी के बीच की यह मित्रता केवल किसी मध्मवर्गीय संवेदना की उपज नहीं कही जा सकती. परिवार के भीतर सत्ता के लैंगिक समीकरणों के नजरिए से भी इसे समझना मुश्किल हो सकता है. यह शायद इस तथ्य से भी एकदम निरपेक्ष हो सकता है कि माता-पिता के आपसी दांपत्य संबंध कैसे हैं.

पिता और पुत्री का यह मित्रवत संबंध जाति, संप्रदाय, वर्ग और संस्कृति के दायरों से निरपेक्ष भी हो सकता है. यह दो पीढ़ियों के बीच के आपसी संवाद का एक सुंदर धरातल भी हो सकता है. एक ऐसा उदार और मानवीय धरातल जिस पर नई पीढ़ी न केवल खड़ा होना, चलना और बोलना सीखती है, बल्कि अपनी बौद्धिक, सांसारिक और आध्यात्मिक जिज्ञासाओं को शांत करने के लिए अपनी बालसुलभ सहजता में मौके-बेमौके सवाल भी पूछती है. कभी अतार्किक सी लगने वाली किसी बात, कार्य या फैसले पर सवाल उठाने का आत्मविश्वास भी उसी धरातल पर उगता है.

उसी धरातल पर मासूम अपेक्षाओं से भरे उलाहने और किसी अनपेक्षित कार्य को कर ही गुजरने की जिद भी खर-पतवार की तरह पनपते हैं. यह उलाहना और जिद अलग-अलग समय पर पिता और बेटी में से किसी की भी हो सकती है. यह दोस्ती हमेशा एकदम पारदर्शी ही हो, ऐसा जरूरी नहीं, इसलिए इसमें थोड़े से छिपाव की एक झीनी परत भी स्वाभाविक रूप से हो सकती है. अक्सर इस छिपाव में वैसा ही निश्छल आनंद होता है, जैसा आनंद अपने पेड़ में भरपूर फल लगे होने के बावजूद किसी और के बाग से आम-अमरूद चुराकर खा लेने का होता है. और इसका आनंद तब और भी बढ़ जाता है, जब उस बाग का बागवान इसे छिपकर देखते हुए भी बिना जाहिर किए और हंसते हुए इसे अनदेखा कर दे.

अपनी बेटी को उसका अपना स्पेस देते हुए जब कोई पिता प्रौढ़ और परिपक्व हो रहा होता है, तो उसकी स्थिति शायद उसी बागवान जैसी होती है. पिता और बेटी के बीच दोस्ती के उगने के लिए जितनी नमी और उर्वरता चाहिए, वह इसी स्पेस से तैयार होती है. इंदिरा और नेहरू के दोस्ताना संबंध को उनकी उन चिट्ठियों के माध्यम से समझा जा सकता है, जो उन्होंने जीवन के अलग-अलग दौर में एक-दूसरे को लिखीं. एक संवेदनशील पिता और एक मुक्तमना बेटी के बीच के इस संवाद के बौद्धिक और राजनीतिक प्रसंगों को यदि एक किनारे भी रख दें, तो भी उनकी आपसी दोस्ती की ऊष्मा को सहज ही महसूस किया जा सकता है.

1929 में जब पिता नेहरू ने मात्र ग्यारह साल की बेटी इंदिरा को लिखे पत्रों को पुस्तक के रूप में छपने के लिए दिया तो उसकी प्रस्तावना में लिखा- ‘ये तो महज दस साल की छोटी सी लड़की को लिखी गई निजी चिट्ठियां थीं. लेकिन कुछ ऐसे दोस्त, जिनकी सलाह मेरे लिए मायने रखती हैं, उन्होंने सुझाव दिया कि मैं इन्हें बड़े पाठक वर्ग के सामने भी रख सकता हूं. मुझे नहीं मालूम कि दूसरे लड़के और लड़कियां इन ख़तों को सराहेंगे कि नहीं. लेकिन मुझे उम्मीद है कि उनमें से जो भी इन ख़तों को पढ़ेंगे, वे धीरे-धीरे हमारी इस दुनिया को राष्ट्रों का एक बड़ा परिवार होने के रूप में सोचना कर सकते हैं. हालांकि थोड़े आत्मसंशय के साथ मैं यह भी उम्मीद करता हूं कि इन ख़तों को पढ़ने में उन्हें उस आनंद का एक कतरा जरूर मिल सकता है, जो आनंद मुझे इन्हें लिखते हुए मिला.’

नेहरू जब अपनी किशोरवय बेटी को चिट्ठियां लिखते हैं तो उनकी बौद्धिकता भी एकदम नीरस, बोझिल या शुष्क नहीं लगती. नेहरू के पितृवत स्नेह की चिकनाई उन शब्दों में लगातार बनी रहती है. वे ठेठ शिक्षक की भूमिका अख्तियार नहीं करते बल्कि बिस्तर पर सुलाते समय कहानियां सुनाने वाले पिता ही बने रहते हैं. वे जिज्ञासाओं के अंतिम समाधान की कोशिश नहीं करते, वे जिज्ञासाओं को बढ़ाने का प्रयास करते हैं. वे चाहते हैं कि इससे आगे की बात इंदिरा खुद कहीं और से पढ़कर, देखकर और जीकर जानें. वे अपने निष्कर्षों में ‘शायद’ और ‘संभवतः’ की गुंजाइश बनाए रखते हैं.

और इसलिए जैसे-जैसे इंदिरा दुनिया की दूसरी संस्कृतियों को प्रत्यक्ष देखतीं और उससे जुड़ती जाती हैं, वैसे-वैसे वे अपने तार्किक और स्वायत्त फैसले खुद भी लेने लगती हैं. और उन छोटे-छोटे फैसलों से नेहरू को अवगत कराने के लिए जब वे चिट्ठियां लिखती हैं तो उनकी भाषा में उनका अतिरिक्त आत्मविश्वास हावी नहीं हो पाता है, वहां एक सहज और दोस्ताना रवैया आकार लेता रहता है. और प्यार तो इतना भर-भरके होता है कि पढ़ने वाले पिता को दूरी का एहसास ही न हो.

यूरोप में पढ़ते हुए एक बार जब वे अपने बाल छोटे करवा लेती हैं, तो पिता को इसकी जानकारी देते हुए लिखती हैं- ‘कल दोपहर मैं गई और अपने बाल कटा आई. एक तो इसलिए कि मेरा जूड़ा दिन में लगभग दस बार खुल जाता था और इसे बार-बार बनाना एक सरदर्द ही होता था. इसके अलावा यह यूरोपीय कपड़ों के साथ यह बिल्कुल भी फबता नहीं था.’ जहां इतनी सहजता और इतना विश्वास हो कि बेटी बिना किसी तनाव के यह समझने लगे कि पिता मेरी हर छोटी-बड़ी समस्याओं को मेरे ही स्तर पर आकर समझ सकेगा, तो बेटियां उनसे कुछ भी साझा करने में हिचकिचाती नहीं. लिंगभेद वहां आड़े नहीं आता. बल्कि उसका कभी खयाल ही नहीं आता. पिता तो सब जानते ही होंगे, समझते ही होंगे, और नहीं समझते होंगे तो भी समझ सकते तो होंगे ही, उन्हीं की तो बेटी हूं, यह भावना अवचेतन में बनी रहती है. इंदिरा की निजी चिट्ठियां पढ़कर इसका खूब एहसास होता है.

और अचानक जब एक दिन बेटी बड़ी हो जाती है तो वह एक दार्शनिक के लहजे में बात करने लगती है. एक अभिभावकपने के साथ वह पिता को समझाती है, ढाढस बंधाती है, दुलार करती है, ज्यादा ख्याल रखने लगती है. पिता बेटी की भूमिका में आ जाते हैं और बेटी पिता की भूमिका में. इंदिरा को ही देखिए, 1939 के आसपास जब भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस की अंदरूनी राजनीति में काफी खींचतान पैदा होती है और नेहरू तनाव में होते हैं, तो इंदिरा उन्हें लिखती हैं -

‘यदि मैं आपका उदासी से भी कुछ अधिक उदास वाला चेहरा नहीं देखती रहूं, तो यह इतनी बुरी बात भी नहीं होगी. मेरे लाड़ले-दुलारे पापू, इतने पराजयवादी तो न बनिए- खुद के अलावा आपको कोई और नहीं हरा सकता. भारतीय राजनीति में घुसती जा रही क्षुद्रताओं से आप बहुत ऊपर हैं. इन क्षुद्रताओं को जड़ें जमाते देख बहुत दुःख होता है- लेकिन इस सबसे आप अपने आपपर कुछ भी फर्क नहीं पड़ने दीजिए. ऐसा दुनियाभर में होता है. और ये दौर भी हमेशा बीत जाते हैं.’

बेटी जब पिता की भूमिका में आ जाती है तो भी उतनी ही अच्छी दोस्त साबित होती है. दुःख भरे पलों में, एकदम उदास कर देनेवाले पलों में, बेटियां दुलारती हैं, गुदगुदाती हैं, हंसाती हैं, हौसला बढ़ाती हैं और कई बार सारा नेतृत्व अपने हाथ में ले लेती हैं. वे हमें बचाने के लिए आगे आती हैं, मुश्किलों का सामना करती हैं, हमें छोड़ती नहीं हैं. हम बेटियों के दोस्त बनें तो बेटियां भी सचमुच की दोस्ती निभाती हैं.

ट्रोल इत्यादि की भूमिका में कुछ भी कह गुजरने वाले आज के युवक इस बात को भली-भांति जान लें कि एक दिन वे ऐसी ही लड़कियों के पिता बनेंगे. तब वे किन्हीं अमर्त्य सेन को या किन्हीं सुब्रमण्यम स्वामी को उनकी बेटी का नाम लेकर शर्मसार करने का अज्ञानतापूर्ण दुष्प्रयास नहीं कर पाएंगे. उस दिन वे समझ पाएंगे कि अपनी बेटियों को एकसाहसी, आत्मनिर्भर और स्वतंत्र व्यक्तित्व के रूप उभरने देकर ये लोग अच्छे पिता साबित हुए हैं. वे अपनी बेटियों के अच्छे दोस्त साबित हुए हैं.

हर पिता का नेहरू ही होना या हर बेटी का इंदिरा ही होना तो जरूरी नहीं, लेकिन हर पिता और बेटी के बीच आपस में उतनी ही अच्छी दोस्ती होनी जरूर महत्वपूर्ण हो सकती है, जितनी कि नेहरू और इंदिरा के बीच थी. आने वाले समय में ज्यादातर बेटियां कई अर्थों में इंदिरा जैसी ही होने वाली हैं, इसलिए हम भी अपने भीतर के नेहरू रूपी पिता को अभी से जानने और जगाने का अभ्यास शुरू करें. एक सुंदर प्रयोग आपस में एक-दूसरे को वैसी ही चिट्ठियां लिखना भी हो सकता है.