बीते मंगलवार को देश में स्वास्थ्य की स्थिति पर अब तक की सबसे विस्तृत रिपोर्ट ‘इंडिया हेल्थ ऑफ द नेशन्स स्टेट्स’ जारी की गई. देश में पहली बार जारी इस रिपोर्ट को भारतीय चिकित्सा अनुसंधान परिषद (आईसीएमआर) ने तैयार किया है. इसे जारी करते हुए उपराष्ट्रपति वेंकैया नायडू का कहना था, ‘दुनिया के कई देशों के मुकाबले भारत में स्वास्थ्य की स्थिति बेहतर हुई है. हमें इसे और अच्छा करने की जरुरत है.’ इस रिपोर्ट में 1990 से 2016 के बीच देश के राज्यों में स्वास्थ्य की स्थिति बताई गई है.

इस रिपोर्ट में कई चिंताजनक बातें सामने आई हैं. इसमें कहा गया है कि ओडिशा और हिंदी पट्टी के राज्यों- उत्तर प्रदेश, बिहार, राजस्थान, उत्तराखंड, झारखंड, मध्य प्रदेश और छत्तीसगढ़ में बच्चे और महिलाएं कुपोषण की समस्या से जूझ रहे हैं. दूसरी ओर, इनकी तुलना में विकसित माने जाने वाले राज्यों तमिलनाडु, पंजाब, गोवा और केरल कैंसर के साथ-साथ जीवनशैली से जुड़ी बीमारियों (गैरसंक्रामक रोग- एनसीडी) का गढ़ बन रहे हैं. इस रिपोर्ट के मुताबिक पूरे देश में 1990 की तुलना में एनसीडी से जुड़े मामलों की संख्या करीब दोगुनी बढ़ोतरी हुई है. हालांकि, राहत की बात है कि संक्रामक और कुपोषण आधारित बीमारियों से संबंधित मामलों में करीब 50 फीसदी कमी दर्ज की गई है.

विश्व में तेजी से उभरती हुई अर्थवस्था वाले देशों में शामिल भारत में स्वास्थ्य की स्थिति कैसी है या पिछले ढाई दशक के दौरान देश की तबीयत कितनी बेहतर हुई है, इस बारे में आंखें खोलनी वाली इस रिपोर्ट को देश के मीडिया में काफी कम जगह मिल पाई. अधिकांश न्यूज चैनलों के साथ अखबारों ने भी प्रधानमंत्री के फिलीपींस दौरे और संजय लीला भंसाली की फिल्म पद्मावती पर छिड़े विवाद पर अपना काफी वक्त खर्च किया है. इनके अलावा बीते शुक्रवार को वैश्विक क्रेडिट एजेंसी द्वारा भारत की रेटिंग बढ़ाने के मुद्दे को भी व्यापक कवरेज मिली है. उधर, लोगों के स्वास्थ्य को लेकर इस बड़ी रिपोर्ट पर देश के प्रमुख अखबारों में केवल दो- बिजनेस स्टैंडर्ड और द इकनॉमिक टाइम्स ने ही गंभीर टिप्पणी का विषय बनाया है जबकि ये कारोबारी अखबारों की श्रेणी में आते हैं.

द इकनॉमिक टाइम्स ने इस रिपोर्ट के हवाले से भारत के सामने दो मोर्चों पर चुनौती होने की बात कही है. पहला, अमीर व्यक्तियों में जीवनशैली से जुड़ी बीमारियों का तेजी से बढ़ना और संक्रामक बीमारियों से जुड़े मामलों का लगातार बना रहना. बीती 16 तारीख को अपने संपादकीय में अखबार लिखता है कि क्रोनिक डिजीज की वजह से काम करने की क्षमता में कमी आने के साथ लोगों में तनाव की समस्या सामने आती है. साथ ही, इससे रोगी के परिवार की मानसिक और आर्थिक स्थिति पर भी बुरा असर पड़ता है. क्रोनिक डिजीज उन बीमारियों को कहा जाता है जो लंबे वक्त तक ठीक नहीं होती हैं. इन बातों को देखते हुए इस समस्या पर सही ढंग से विचार करने और इस पर काम करने की जरुरत है. अखबार ने इसके लिए जीवनशैली में बदलाव के साथ-साथ स्वास्थ्य बीमा के क्षेत्र में भी काम करने की वकालत की है.

उधर, बिजनेस स्टैंडर्ड का मानना है कि इस रिपोर्ट में जो बातें सामने आई हैं, वे चौंकाने वाली नहीं हैं. बीते गुरुवार को अखबार लिखता है कि देश के आर्थिक विकास के साथ ही स्वास्थ्य क्षेत्र की स्थिति बेहतर हुई है. उसके मुताबिक इस मुद्दे पर केंद्र के साथ-साथ राज्य सरकारों ने भी काम किया है. हालांकि, अखबार का मानना है कि अब भी हम अपने पड़ोसी देशों खासकर चीन से पिछड़े हुए हैं. इसके अलावा राज्यों के बीच भी स्वास्थ्य के अलग-अलग मानकों पर प्रदर्शन में अंतर दिखता है. अखबार का आगे कहना है कि देश में लोगों के स्वास्थ्य से जुड़ी समस्याओं में सुधार के लिए अलग-अलग राज्यों में उनकी समस्याओं को लेकर लक्ष्य तय किए जाने की जरूरत है. साथ ही, इसे हासिल करने के लिए कदम उठाए जाएं. इस दिशा में यह रिपोर्ट नीति बनाने वालों की मदद कर सकती है.