लगभग दो साल के यूरोप प्रवास के बाद 1927 के आखिर में जब नेहरू, कमला और इंदिरा मार्सेई से स्वेज और फिर कोलंबो से मद्रास के रास्ते भारत लौट रहे थे, तो दस वर्ष की इंदिरा घंटों तक जहाज के ऊपरी डेक पर खड़ी रहती थी. समुंदर की लहरों और दूर तक फैले क्षितिज को निहारते हुए उसके मन में कई सवाल उठते. जैसे कि यह संसार कैसे बना? तरह-तरह के जीव कैसे बने? मनुष्यों की सभ्यता कैसे विकसित हुई? अलग-अलग राष्ट्र, धर्म और जातियां कैसे बनीं? इत्यादि. ये सारे सवाल वह अपने पिता नेहरू से लगातार करती रहती.

फिर जब 1928 की गर्मियां आईं तो इंदिरा मसूरी में थी और पंडित नेहरू इलाहाबाद में. इस दौरान उन्होंने इंदिरा को 31 पत्र लिखे और इनमें इंदिरा के उन सवालों का जवाब देने की कोशिश की. अपने पहले ही पत्र में उन्होंने लिखा- ‘जब तुम मेरे साथ रहती हो तो अक्सर मुझसे बहुत-सी बातें पूछा करती हो और मैं उनका जवाब देने की कोशिश करता हूं. लेकिन, अब, जब तुम मसूरी में हो और मैं इलाहाबाद में, हम दोनों उस तरह बातचीत नहीं कर सकते. इसलिए मैंने इरादा किया है कि कभी-कभी तुम्हें इस दुनिया की और उन छोटे-बड़े देशों की जो इन दुनिया में हैं, छोटी-छोटी कथाएं लिखा करूं.’

जल्दी ही इन पत्रों के बारे में नेहरू और इंदिरा के करीबी लोगों को पता चल गया. इनमें से कुछ लोग चाहते थे कि ये पत्र पुस्तकाकार छप जाएं. इसी दौरान गांधीजी ने ढ़ाई महीने का संयुक्त प्रांत का अपना दौरा शुरू किया. इसमें इलाहाबाद में भी उनका कार्यक्रम था और वे आनंद भवन में भी ठहरे. तब तक इलाहाबाद में नेहरू द्वारा लिखे गए इन पत्रों की खूब चर्चा फैल गई थी. लेकिन इन पत्रों के प्रकाशन को लेकर नेहरू बहुत आश्वस्त नहीं थे. उन्होंने इन पत्रों को महात्मा गांधी को दिखाने का फैसला किया और इन पर उनकी राय जाननी चाही.

गांधीजी को भी ये पत्र बहुत अच्छे लगे. इलाहाबाद से लौटते हुए ट्रेन से ही उन्होंने नेहरू को इन पत्रों पर अपने विचार लिख भेजे. 29 जुलाई, 1929 को नेहरू को इस पत्र में उन्होंने लिखा- ‘प्रिय जवाहरलाल, इन्दु के नाम तुम्हारे पत्र उत्तम हैं; उन्हें प्रकाशित किया जाना चाहिए. तुमने उन्हें हिन्दी में लिखा होता तो कितना अच्छा होता. कुछ भी हो, उनका हिन्दी में भी साथ ही प्रकाशन होना चाहिए.’

उन्होंने आगे लिखा- ‘तुम्हारा विषय निरूपण बिल्कुल परंपरागत है. मनुष्यों की उत्पत्ति अब एक विवादास्पद विषय हो गया है. धर्म की उत्पत्ति तो और भी विवादास्पद बात है. परंतु इन मतभेदों से तुम्हारे पत्र का महत्व नहीं घटता. उनका महत्व तुम्हारे निष्कर्षों के ठीक होने में न होकर निरूपण के ढंग और इस तथ्य में है कि तुमने इन्दु के हृदय तक पहुंचने और अपनी बाह्य प्रवृत्तियों के बीच में उसकी बुद्धि की आंखें खोलने की कोशिश की है.’

उसी साल नवंबर में इलाहाबाद लॉ जर्नल प्रेस से वह पुस्तक ‘लेटर्स टू अ डॉटर फ्रॉम हर फादर’ के नाम से अंग्रेजी में छप गई. इसकी प्रस्तावना में नेहरू ने लिखा- ‘ये तो महज दस साल की छोटी सी लड़की को लिखी गई निजी चिट्ठियां थीं. लेकिन कुछ ऐसे दोस्त, जिनकी सलाह मेरे लिए मायने रखती हैं, उन्होंने सुझाव दिया कि मैं इन्हें बड़े पाठक वर्ग के सामने भी रख सकता हूं.’

निश्चय ही, यह सलाह देनेवालों में गांधी भी एक थे जिनकी ओर नेहरू ने संभवतः इशारा किया था. नेहरू ने गांधीजी की उस हिदायत का भी पूरा ध्यान रखा कि किताब हिन्दी में भी छपनी चाहिए. इसलिए अंग्रेजी संस्करण की प्रस्तावना में नेहरू ने लिखा- ‘मुझे इसका एहसास है कि पत्रों के अंग्रेजी में होने की वजह से इसकी अपील बहुत सीमित है. इसमें पूरी तरह दोष मेरा ही है. अब इसका निदान यही है कि इसका एक अनुवाद कराया जाए. इसका हिंदी अनुवाद तैयार किया जा रहा है और यदि सबकुछ अच्छा रहा तो यह जल्दी ही प्रकाशित भी होगा.’ बाद में जैसा कि हम जानते हैं कि प्रेमचंद और कृष्णदत्त पालीवाल जैसे भाषा के मर्मज्ञों नेइन पत्रों का सुंदर अनुवाद किया.

पंडित नेहरू और गांधीजी के बीच के पत्राचार से हमें यह भी पता चलता है कि इस पुस्तक के प्रकाशन के बाद भी पंडित नेहरू ने इंदिरा को लिखे बाद के कुछ पत्र गांधीजी को दिखाए थे. 7 सितंबर, 1931 को गांधीजी नेहरू को एक पत्र में लिखते हैं- ‘प्रिय जवाहरलाल, देवदास ने इंदिरा को लिखे तुम्हारे और पत्र दिए हैं. उन्हें देखने का मुझे अभी तक समय नहीं मिला है. ‘यंग इंडिया’ और ‘नवजीवन’ के लिए सामग्री तैयार करने, चिट्ठियां लिखने, कुछ मुलाकातियों से भेंट करने और सोने में ही मेरा पूरा समय गया है.’

नवंबर, 1929 में किताब का पहली बार प्रकाशन हुआ था. और उसी महीने जब ‘यंग इंडिया’ में गांधीजी ने अपने संयुक्त प्रांत की यात्रा की एक विस्तृत रिपोर्ट प्रकाशित की, तो उसमें एक स्थान पर यह भी लिखा- ‘इलाहाबाद में अपराह्न के कार्यक्रम का आरंभ महिलाओं की बड़ी भारी सभा से हुआ, जहां छोटी सी इंदिरा ने, जो अब पंडित जवाहरलाल नेहरू द्वारा उसे लिखे गए पत्रों से प्रसिद्ध हो गई है, एक थैली भेंट की जिसमें 8,000 रुपये का एक चेक था.’

सचमुच छोटी सी इंदिरा अपने पिता द्वारा लिखे गए पत्रों के माध्यम से मशहूर हो गई थी. आखिर इसकी
शुरुआत उसी के जिज्ञासा भरे सवालों से तो हुई थी!