आज इंदिरा गांधी का जन्मदिन है. साढ़े दस साल की इंदिरा को पत्रों के माध्यम से मानवता का इतिहास समझाते हुए नेहरू ने लिखा था

‘लड़के, लड़कियों और सयानों को भी इतिहास अकसर एक अजीब ढंग से पढ़ाया जाता है. उन्हें राजाओं और दूसरे आदमियों के नाम और लड़ाइयों की तारीखें याद करनी पड़ती हैं. लेकिन दरअसल इतिहास लड़ाइयों का, या थोड़े- से राजाओं या सेनापतियों का नाम नहीं है.

इतिहास का काम यह है कि हमें किसी मुल्क के आदमियों का हाल बतलाए, कि वे किस तरह रहते थे, क्या करते थे और क्या सोचते थे, किस बात से उन्हें खुशी होती थीं, किस बात से रंज होता था, उनके सामने क्या-क्या कठिनाइयां आईं और उन लोगों ने कैसे उन पर काबू पाया.

अगर हम इतिहास को इस तरीके से पढ़ें तो हमें उससे बहुत-सी बातें मालूम होंगी. अगर उसी तरह की कोई कठिनाई या आफत हमारे सामने आए, तो इतिहास के जानने से हम उस पर विजय पा सकते हैं.’

बाद में जब नेहरू ने ‘डिस्कवरी ऑफ इंडिया’ लिखी तो उसमें कल्पित इतिहास और वास्तविक इतिहास में फर्क समझाने के लिए एक पूरा अध्याय ही लिख दिया. आज के समय में इसे पढ़ना-पढ़ाना और जरूरी हो गया है. नेहरू लिखते हैं-

‘कहा जाता है कि गेटे (जर्मन विचारक) ने उन लोगों की मलामत की है, जिन्होंने लूक्रिशिया को और दूसरी पुरानी रोमन वीरगाथाओं को गढंत और झूठी बताया है. उसने कहा है कि जो चीज दरअसल जाली और झूठी होगी, वह भद्दी और निकम्मी भी होगी, वह कभी सुंदर और जान फूंकनेवाली नहीं हो सकती.

...इसलिए यह कल्पित इतिहास, जो घटनाओं और गढ़ंत का मेल है, या जो कभी-कभी बिल्कुल गढ़ंत है, एक प्रतीक के रूप में सत्य बन जाता है और हमें उस ख़ास ज़माने के लोगों के दिल और दिमाग़ और मकसदों के बारे में बताता है.

...(तथ्य-आधारित) इतिहास को अनदेखा करने के बुरे नतीजे भी हुए और ये अब तक हमारा पीछा कर रहे हैं. इसने हमारा नज़रिया धुंधला कर दिया, ज़िंदगी से एक तरह का बिलगाव पैदा किया, हमें झट विश्वास कर लेनेवाला बना दिया और जहां तक वास्तविक तथ्यों का ताल्लुक था, हमारे दिमाग में उलझाव डाल दिया.

विज्ञान और आजकल की दुनिया से वास्ता पड़ने की वजह से अब तथ्यों की समझ-बूझ पैदा हुई है, जांच-पड़ताल और प्रमाणों के तौलने की बुद्धि उपजी है और परंपरा को ज्यों-का-त्यों क़ुबूल करने से इन्कार भी हुआ है. बहुत से क़ाबिल इतिहासकार आजकल काम में लगे हुए हैं, लेकिन वे अक्सर उल्टी ग़लती ही करते हैं, यानी घटनाओं के काल-क्रम की तो बहुत छान-बीन करते हैं, लेकिन ज़िंदा इतिहास को छोड़ देते हैं.

लेकिन आजकल भी हमपर परंपरा का कितना असर होता है, यह एक ताज्जुब की बात है, और बुद्धिमान आदमी की विवेचना-बुद्धि भी जाती रहती है. मुमकिन है, यह इस वजह से हो कि हम अपनी मौजूदा हालात में जातीयता के ख़याल में ग़र्क़ हैं. जब हमें राजनैतिक और आर्थिक आज़ादी हासिल हो जाएगी, तभी हमारा दिमाग़ बाक़ायदा और सही अंदाज़ में काम करेगा.

...यह सच है कि हिंदुस्तान के लोगों में परंपरा और चली आई बातों को अच्छी तरह जांचे-परखे बग़ैर ही इतिहास मान लेने की आदत है. उन्हें इस तरह की ढीली-ढाली सोच से और आसानी से कोई निष्कर्ष निकाल लेने की प्रवृत्ति से अपने को छुड़ाना पड़ेगा.’