इंटरनेट की दुनिया में पॉर्नोग्राफ़ी और हिंसा का प्रचार करने वाली वेबसाइटों की भरमार है. इन्हें रोकने के लिए बनारस हिंदू विश्वविद्यालय (बीएचयू) ‘हर हर महादेव’ लेकर आया है. टाइम्स ऑफ़ इंडिया की ख़बर के मुताबिक़ बीएचयू के चिकित्सा विज्ञान संस्थान (आईएमएस-बीएचयू) के एक न्यूरोलॉजिस्ट और उनकी टीम ने ‘अनचाही’ वेबसाइटों को ब्लॉक करने के लिए यह एप्लिकेशन ‘हर हर महादेव’ बनाया है.

‘हर हर महादेव’ पॉर्नोग्राफ़ी, हिंसा और अश्लील सामग्री से संबंधित वेबसाइटों को विशेष रूप से रोकेगा. एप डाउनलोड करने और उसमें रजिस्ट्रेशन करने के बाद यूज़र जब भी कोई ‘अनुचित’ वेबसाइट खोलेगा तो उसे भजन सुनाई देगा. आईएमएस-बीएचयू में न्यूरोलॉजी विभाग के डॉ विजय नाथ मिश्रा ने बताया कि ‘हर हर महादेव’ को बनाने में छह महीने का समय लगा. उन्होंने कहा कि यह अभी क़रीब 3800 वेबसाइों को ब्लॉक कर सकता है. विजय नाथ कहते हैं, ‘हम इसे (एप) और अपडेट करेंगे क्योंकि ऐसी अनचाही वेबसाइटें रोज़ बन रही हैं.’ फ़िलहाल इस एप पर केवल हिंदू धर्म के भक्ति गीत सुने जा सकेंगे. विजय बताते हैं कि दूसरे धर्मों के गीतों को शामिल करने का काम किया जा रहा है.

ट्विटर की इस कार्रवाई ने दुनिया भर के दक्षिणपंथियों को चिंतित कर दिया है

सोशल नेटवर्किंग साईट ट्विटर ने दुनिया भर के दक्षिणपंथियों की चिंता बढ़ा दी है. उसने अपनी नई नीति के तहत अमेरिका के कई चर्चित दक्षिणपंथी नेताओं की प्रोफाइल से ‘वेरिफिकेशन बैज’ हटा लिया है. ट्विटर द्वारा ‘वेरिफिकेशन बैज’ मशहूर हस्तियों, चर्चित संस्थानों और संगठनों को दिया जाता है. ट्विटर पर इसे नील रंग के ‘टिक मार्क’ से दर्शाया जाता है, जो किसी यूजर के नाम के आगे दिखता है. इसे पाने वाले व्यक्ति को ट्विटर एक आम यूजर से अलग कई अतिरिक्त सुविधाएं देता है.

अमेरिकी मीडिया के मुताबिक बुधवार को ट्विटर ने अमेरिका के कई दक्षिणपंथी नेताओं के अकाउंट से इस विशेष सहूलियत को हटा लिया है. इनमें जाने-माने दक्षिण पंथी नेता जेसन कैसलर, रिचर्ड स्पेन्सर, लौरा लूमर और ब्रिटेन स्थित एक इस्लाम विरोधी संगठन के पूर्व नेता टॉमी रॉबिन्सन शामिल हैं.

बीते अगस्त में वर्जीनिया के शार्लट्सविल इलाके में ‘श्वेत वर्चस्ववादी’ समूह की एक बड़ी रैली आयोजित हुई थी. जेसन कैसलर और रिचर्ड स्पेन्सर द्वारा आयोजित की गई इस रैली की वजह से उस समय अमेरिका में माहौल काफी ज्यादा तनावपूर्ण हो गया था. लौरा लूमर भी पिछले दिनों मुस्लिम विरोधी ट्वीटस की वजह से खासी चर्चा में रही थीं.

तकनीक से जुड़ी अमेरिकी वेबसाइट द वर्ज ने जब ट्विटर से इस बारे में सवाल किया तो कंपनी ने अपने नियम और शर्तों का हवाला दिया. द वर्ज के मुताबिक इन शर्तों में साफ़ लिखा है कि जो लोग या संगठन नस्ल, जाति, राष्ट्रीय मूल, लिंग, सम्प्रदाय, उम्र, विकलांगता या रोग के आधार पर नफरत या हिंसा को बढ़ावा देते हैं, उनसे कभी भी ‘वेरिफिकेशन बैज’ की सुविधा को वापस लिया जा सकता है.

‘फेक न्यूज’ की काट के लिए अब फेसबुक और गूगल भी ‘ट्रस्ट इंडिकेटर’ का इस्तेमाल करेंगे

सोशल मीडिया और इंटरनेट पर फैलाई जा रही फर्जी खबरों को रोकने के लिए फेसबुक, गूगल और ट्विट्टर जैसी दिग्गज कंपनियों ने कमर कस ली है. गुरूवार को इन तीनों ने इसकी जानकारी देते हुए बताया कि अब वे ‘फेक न्यूज़’ के खिलाफ शुरू किये गए ‘द ट्रस्ट प्रोजेक्ट’ अभियान का हिस्सा हैं.

‘द ट्रस्ट प्रोजेक्ट’ अभियान को अमेरिका के सेंटा क्लैरा यूनिवर्सिटी के सेंटर फॉर एप्लाइड एथिक्स द्वारा शुरू किया गया है. इसका मकसद पाठकों को इंटरनेट और सोशल मीडिया पर किसी भी खबर के स्रोत के बारे में जानकारी देना है. इस प्रोजेक्ट को अमेरिका और यूरोप के करीब 75 समाचार संस्थानों ने अपना समर्थन दिया है. इन संस्थानों में अमेरिकी न्यूज़ वेबसाइट द इकनॉमिस्ट, वाशिंगटन पोस्ट, ब्रिटेन की मिरर और जर्मनी की जर्मन प्रेस एजेंसी भी शामिल हैं.

खबरों के अनुसार अब ये सभी संस्थान अपनी खबरों में ‘ट्रस्ट इंडिकेटर’ को प्रदर्शित करेंगे. इस इंडिकेटर पर क्लिक करते ही पाठक को खबर या लेख के स्रोत और लेखक के बारे में जानकारी मिल सकेगी. साथ ही उसे यह भी पता चल पाएगा कि वे जो पढ़ रहे हैं वह विज्ञापन है, खबर है या लेखक की अपनी राय है.

सेंटर फॉर एप्लाइड एथिक्स की निदेशक अमेरिका की चर्चित पत्रकार सैली लेहमन ने गुरुवार को बताया कि गूगल, फेसबुक, बिंग और ट्विटर ने भी ‘ट्रस्ट इंडिकेटर्स’ या संकेतकों का उपयोग करने को लेकर सहमति जताई है. जल्द ही ‘ट्रस्ट इंडिकेटर’ इन प्लेटफॉर्म पर आने वाली खबरों या लेखों के बगल में दिखेगा.

अमेरिका और यूरोप में गूगल, फेसबुक और ट्विट्टर को फर्जी खबरों को प्रमोट करने की वजह से भारी आलोचना झेलनी पड़ रही है. माना जाता है कि अमेरिकी राष्ट्रपति चुनाव के दौरान फेसबुक के न्यूज फीड और ट्रेंडिंग सेक्शन में रूसी एजेंसियों ने ऐसी खबरें फैलायी थीं जिसने डोनाल्ड ट्रंप की जीत में अहम भूमिका निभाई थी.