1957 में आई गुरुदत्त की फ़िल्म ‘प्यासा’ में नायक शायर अखबार के एडिटर को दी हुई नज़्मों को छापने की गुज़ारिश करता है. एडिटर शायर की खिल्ली उड़ाते हुए उसे मोमिन और मीर को पढ़ने की सलाह देता है. शायर कहता है कि उसने इनकी मुहब्बत की शायरी के साथ-साथ जोश और फ़ैज़ को भी पढा है. इस बात का ज़िक्र इसलिए कि 1957 में फ़ैज़ अहमद फ़ैज़ 46 साल के थे और सिर्फ़ मशहूर थे बल्कि बल्कि अपने दौर के सबसे बड़े शायर बनकर उभरे.

देखा जाए तो उसे फ़ैज़ का दौर भी कहा जा सकता है. पाकिस्तान की मशहूर टीवी एंकर जुगनू मोहसिन ने एक प्रोग्राम में कहा था, ‘आज अगर कोई मुझे पूछे कि फील्ड मार्शल अयूब ख़ान कौन थे, तो मैं कहूंगी वो फ़ैज़ अहमद फ़ैज़ के दौर के सबसे पहले फ़ौजी आमिर थे’.

ग़ालिब के बाद अगर किसी शायर ने किसी एक वक़्त को प्रभावित किया है तो जोश मलीहाबादी और इकबाल के नाम के साथ-साथ फ़ैज़ का नाम भी आता है. प्रोग्रेसिव राइटर्स की जिस कहकशां में साहिर लुधयानवी, कैफ़ी आज़मी, सरदार जाफ़री जैसे शायरों के नाम हैं, उनमें फ़ैज़ का तारा सबसे तेज़ चमकता है.

अमृतसर और फिर उसके बाद दिल्ली में प्रोगेसिव राइटर्स के साथ संगत फ़ैज़ की ज़िंदगी के अहम मोड़ों में से एक है. दिल्ली में वे मज़ाज, जांनिसार अख़्तर, साहिर लुधयानवी, सरदार जाफ़री, कृष्ण चन्दर और राजिंदर सिंह बेदी जैसे तरक़्क़ी पसंद शायरों और अफ़सानानिगारों से मिले. इसी दौरान उनके सर से पांव तक कम्युनिस्ट बनने की प्रकिया शुरू हो गई जो बाद में उनके पाकिस्तान चले जाने पर, ‘रावलपिंडी साज़िश’ में बड़े ही ड्रामाई अंदाज़ में पकड़े जाने और आख़िर में जेल की सज़ा काटने पर पूरी हुई. बस चे गेवारा के जैसे उन्होंने टोपी नहीं पहनी और बंदूक नहीं उठाई.

नेहरु की तरह फै़ज़ को भी जेल रास आई. ‘दस्ते-सबा’ और ‘जिंदानामा’ उस दौर में लिखी गई थीं. ‘दस्ते-सबा’ की एक ग़ज़ल के दो अशआर से आपको फ़ैज़ के जेल के दिनों का अंदाज़ा होगा.

‘तुम आये हो न शब -ए-इंतज़ार गुज़री है

तलाश में है सहर बार-बार गुज़री है

जेल में ही उन पर मुकद्दमा चला, सैकड़ों झूठी गवाहियां हुईं. अनगिनत धाराओं में उनपर इलज़ाम लगे. यह शेर इस बात को कितनी खूबसूरती से बयान करता है:

वो बात सारे फ़साने में जिसका ज़िक्र न था

वो बात उनको बहुत नागवार गुज़री है

जुर्म साबित हुआ और कुछ साल की सज़ा सुनाई गयी. खैर, बात तरक़्क़ी पसंद शायरों की हो रही थी. यह वह जमात थी जो मार्क्सवादियों, कम्युनिस्टों या तत्कालीन रूस के साम्यवाद में यकीन रखते थे. वे सर्वहारा की ज़िन्दगी के इर्द-गिर्द अपने ख़याल बुनते और अशआर चुनते. अस्सी के दशक के आख़िरी सालों में पूर्वी यूरोप के कम्युनिस्ट देशों की दीवारें गिरने लगीं, जर्मनी में बर्लिन की दीवार ढहा दी गयी और 1991 में एक दिन जब स्टेज पर भाषण देने के लिए खड़े रूस के मिखाइल गोर्बाचेव के हाथ से उन्हीं की पार्टी के बोरिस येल्तसिन ने भाषण का पन्ना छीनकर फाड़ा तो उस दिन साम्यवाद ने दम तोड़ दिया. प्रोग्रेसिव राइटर्स ठगे से रह गए थे.

ज़ाहिर है, फ़ैज़ का भी दिल टूटा होगा. दुनिया जिस पूंजीवाद को हर तक़लीफ़ का हल मान रही थी, वह भी लंगड़ा रहा है. समाज में अमीरी और ग़रीबी की खाई पहले से भी और गहरी हो गयी है. लिहाज़ा, फ़ैज़ की शायरी आज भी उतनी ही असरदार है, जितनी उस दौर में थी.

पर जो बात परेशानी पैदा करती है, वह यह कि फ़ैज़ को सर्वहारा का दर्द तो दिखता है, हुक्मरान के ज़ुल्मो-सितम नज़र नहीं आते जो सर्वहारा पर ही किये गए. सामूहिक क़त्लेआम को अंजाम देने वाले स्टालिन के प्रोग्राम नज़र नहीं आये जिनमें लाखों-लाख लोग साइबेरिया के जंगलों में मार दिए गए. चीन में लोगों का कुचल दिया जाना नहीं दिखा उनको. अगर आज फ़ैज़ जिंदा होते तो मध्य एशिया में मचे घमासान पर ज़रूर लिखते, शायद रोहिंग्याओं के मारे जाने पर कलम उठाते पर भी पर क्या चीन में क़त्ल हो रहे मुसलमान पर लिखते और क्या आसिया बीवी के साथ हो रहे अत्याचार पर बोलते?

फैज़ इंसान के दर्दमंद बनकर जिए. उनकी शुरुआती शायरी पर 1920-1930 के दौर का असर रहा. वे दौर कुछ बेनियाज़ी (अलगाव) का था. कुछ आज़ादी के ज़ज़्बे का था. उस दौर में हसरत मोहानी, जोश मलीहाबादी, हाफ़िज़ जालंधरी, अख़्तर शिरानी और इकबाल जैसे शायर धूम मचा रहे थे. 1935 के आते आते फैज़ की शायरी अलग रंग लेने लगी. वो सियासत समझने लगे. ‘मुझसे पहली सी मोहब्बत मिरे महबूब न मांग’ उन्होंने उसी दौर में लिखा. कुछ हद तक फ़ैज़ इक़बाल की शायरी से भी प्रभावित थे पर बाद में वे इक़बाल से ख़यालों से जुदा हो गए. इक़बाल की बाद के दौर की शायरी में ख़ुदा या ईश्वर हावी है, वहीं फ़ैज़ एग्नॉस्टिक (खुदा की सत्ता पर खामोश रहने वाला) थे. यह उनकी सोच थी या मजबूरी, नहीं कहा जा सकता, पर यह बात अहम है. साम्यवाद को मानने वाले, ख़ुदा को नहीं मानते और न ही ख़ामोश रहकर इस बात को बात टालते हैं.

ग़ालिब की शायरी का असर फ़ैज़ की शुरुआती शायरी पर दिखता है. ग़ालिब ने कहा था कि ‘गो हाथ को जुम्बिश नहीं आंखों में तो दम है, रखने दो अभी सागरो मीना मेरे आगे.’ फ़ैज़ कहते हैं, ‘लब बंद हैं साकी, मिरी आंखों को पिला दे, वो जाम को मिन्नतकशे-सहबा नहीं होता.’ पर जो बात फ़ैज़ को ग़ालिब से जुदा करती है, वह यह है कि ग़ालिब ने अवाम की मुश्किलात पर कोई पुरज़ोर बात नहीं कही है. ग़ालिब की जिंदगी में 1857 का ग़दर सबसे अहम पड़ाव था. उस दौर पर उन्होंने ‘दस्तंबू’ नाम की क़िताब लिखी है जिसमें वे ब्रिटेन की महारानी विक्टोरिया की शान में कसीदे पढ़ने से भी नहीं चूके, बल्कि वज़ीफ़े और पेंशन की जुगाड़ में ब्रिटिश सरकार की तरफ़ झुक गए. मुग़ल बादशाह के हुज़ूर में उनका यह कलाम, ‘हुआ का शाह का मुहासिब फिरे है इतराता, वगरना गालिब की शहर में आबरू क्या है.’ वहीं फ़ैज़ अपनी नज़्म ‘हम देखेंगे’ में ताजों और तख्तों को हवा में उछाल कर आम इंसान को सिंहासन पर बैठाने की बात करते हैं. महान कवि शैलेंद्र ने भी कुछ ऐसा ही कहा था, ‘होंगे राजे राज कुंवर हम बिगड़े दिल शहजादे, हम सिंहासन पर जा बैठे, जब जब करें इरादे. फ़ैज़ की शायरी इसी दबी कुचली अवाम की आवाज़ है... वह चाहे उनकी नज़्म ‘इंतेसाब’ हो, या फिर ‘बोल के लब आज़ाद हैं तेरे’ या फिर इन जैसी कई और नज्में, सब उसी सर्वहारा की आवाज़ हैं.

फ़ैज़ ग़ालिब की तरह अपने सुखन की तारीफ़ नहीं करते. वे कहते थे, खुद-बयानी बोरियत से भरे लोगों का काम है. ग़ालिब ख़ास के शायर थे, इक़बाल आम के और फ़ैज़ आम औ ख़ास के शायर थे. बाद के वक़्त यानी 50 के दशक के आस पास वे पाब्लो नरूदा और पुश्किन सरीख़े शायरों के समाजवाद के ख़यालों से मुतासिर हो गए.

सत्तर के दशक तक आते-आते फैज़ पाकिस्तान की सरकारों से दूर होते जा रहे थे और अवाम और सोवियत रूस के करीब. 1977 में जब पाकिस्तानी जनरल जिया उल हक़ ने ज़ुल्फ़िकार अली भुट्टो की सरकार का तख़्ता पलट किया तो फ़ैज़ को घर पर ही नज़र बंद कर दिया गया था. एक दिन रोज़मर्रा की तरह सुबह वे सैर को निकले तो तैनात सिपाहियों को अंदेशा भी न हुआ और वे सिगरेट पीते पीते पाकिस्तान से धुआं होकर बेरुत चले गए. 1983 में जब इसराइल ने लेबनान पर हमला बोला तो उस समय वे वहां एक अखबार ‘लोटस’, के संपादक थे. हमले के बाद फैज़ फिर पाकिस्तान आ गए.

1985 में जनरल ज़िया उल हक़ ने फ़ैज़ के कलाम के साथ-साथ औरतों के साड़ी पहनने पर पाबन्दी लगा दी थी. मशहूर गायिका इक़बाल बानो ने इसकी नफ़रमानी की ठान ली और साड़ी पहने हुए उन्होंने लाहौर के स्टेडियम में 50,000 लोगों के सामने, ‘हम देखेंगे, लाज़िम है कि हम भी देखेंगे.’ सुनाई. इस नज़्म ने इक़बाल बानो को और इकबाल बानो ने इस नज़्म को अमर कर दिया है. कहते हैं के नज़्म उस दौर की एंथम बन गयी थी. कुछ इसी तरह मेहदी हसन का भी किस्सा है. उनका कलाम ‘गुलों में रंग भरे, बादेनौ बहार चले, चले भी आओ के गुलशन का कारोबार चले.’ आज भी उन्हें चाहने वालों के सबसे पसंदीदा कलामों में से एक है.

फैज़ की शायरी तीसरी दुनिया की शायरी भी थी. ‘आ जाओ अफ्रीका, ‘फिलिस्तीन के लिए’, ईरानी तुलबा के नाम’ जैसी उनकी कुछ नज्में इस बात की तस्दीक करती हैं.अवाम के हालात तो नहीं बदले हैं पर हां, सियासतदानों के तेवर बहुत बदल गए हैं. अब अपने ख़िलाफ़ कुछ भी सुनने से उन्हें गुरेज़ है. अवाम सिर्फ महसूस करे, सहे पर उसका बोलना मना है. इस दौर में फ़ैज़ की नज़्म, ‘बोल के लब आज़ाद हैं तेरे’ हर मुल्क की अवाम का एंथम होनी चाहिए.

बोल के थोड़ा वक़्त बहुत है,

जिस्म-ओ-ज़बां की मौत से पहले,

बोल के सच जिंदा है अब तक,

बोल जो कुछ कहना है कह ले.’

फ़ैज़ हर दौर में पढ़े जाने वाले शायर रहेंगे. इसलिए कि फ़ैज़ की शायरी उन लोगों की जुबां है, जो कभी अपने हक़ के लिए खड़े नहीं हो पाए. अगर कभी हुए भी तो कुचल दिए गए. ज़ुल्मतों के दौर से मुक्ति की आशा लिए ऐसी बात फ़ैज़ ही लिख सकते हैं. फ़ैज़ सच के जिंदा होने का यकीन दिलाते हैं और हौसला भी कि यह दौर बदलेगा, कहने की हिम्मत करो. आज उनको गुज़रे हुए 34 साल हो गए हैं. लेकिन वे इसी दौर के शायर लगते हैं.