मेघालय के मावलिननोंग को 2003 से लगातार एशिया महाद्वीप के सबसे ‘स्वच्छ ग्राम’ का दर्जा मिल रहा है. डीएनए की एक ख़बर के मुताबिक मेघालय के ईस्ट-खासी हिल जिले में बसे इस गांव की आबादी महज 500 है. लेकिन इतने से लोगों ने मिलकर पूरे गांव को ‘स्वच्छता की मिसाल’ बना दिया है. यहां हर घर में चालू हालत में शौचालय हैं. पक्के रास्ते, सौर ऊर्जा से प्रकाशित होने वाली गलियां और हर कोने में बांस के बने कचरादान भी हैं. आवारा जानवर तो क्या यहां पेड़ों से गिरे पत्ते तक सड़कों पर नजर नहीं आते. गांव में प्लास्टिक की थैलियां पर पूरी पाबंदी है और धूम्रपान पर भी. इन चीजों से संबंधित नियम बने हुए हैं जिन्हें तोड़ने पर भारी जुर्माना भी लगता है. इस गांव से प्रभावित होकर कई सरकारी अधिकारी भी यहां आ चुके हैं ताकि स्वच्छ भारत अभियान को सफल बनाने के सबक सीख सकें.

बताते हैं कि भारत-बांग्लादेश सीमा के पास बसे इस गांव में स्वच्छता की अलख 29 साल पहले एक स्कूल शिक्षक रिशोत खोंगथोरम ने जलाई थी. यह 1988 की बात है. उस दौर में करीब-करीब हर सीजन में महामारी गांव को चपेट में ले लेती थी. इससे कई बच्चों को जान से हाथ धोना पड़ता था. इससे चिंतित रिशोत ने स्वच्छता की अहमियत पहचानी और एक मिशन की तरह इस काम में जुट गए. गांव के सेवानिवृत्त शिक्षक लांफरांग बताते हैं, ‘शुरू में तो गांव की समिति के सदस्यों के भीतर रिशोत की योजना को लेकर थोड़ी झिझक थी. लेकिन जब उन्होंने समग्र योजना पेश की तो सब राजी हो गए.’

अपने साफ-सुथरे घर के सामने अलसाए से बैठे ऐनेस खोंगलामेत उन दिनों को याद करते हुए बताते हैं, ‘गांव की समिति ने 1988 में ही स्वच्छता अभियान शुरू किया. पहला आदेश आया कि जानवरों को घरों में बांधो. फिर वे चाहे पालतू हों या आवारा. इसके बाद हर घर में शौचालय बनाने का हुक्म हुआ. वह भी सैप्टिक टैंक के साथ. आगे चलकर रसाेई से निकलने वाले कचरे के निस्तारण की योजना अमल में लाई गई. ’

वे बताते हैं, ‘आज गांव के सभी 97 घरों में सैप्टिक टैंक के साथ घरों से लगे बागीचों में कंपोस्ट पिट भी बने हुए हैं. सभी के लिए अनिवार्य है कि वे जैविक और अकार्बनिक कचरे को अलग-अलग रखें. जैविक कचरे को कंपोस्ट पिट में डालकर खाद बनाई जाती है जो खेतों में काम आती है. वहीं अकार्बनिक कचरे को बांस के बॉक्स में इकट्‌ठा किया जाता है. इसे महीने में एक बार शिलॉन्ग भेजा जाता है जहां इसको रीसाइकिल किया जाता है.’