ठीक एक हफ्ते पहले यानी 13 नवंबर, 2017 को 72 साल की उम्र पूरी करने वाले प्रियरंजन दासमुंशी का सोमवार को निधन हो गया. वे पिछले नौ साल से बीमार और अस्पताल में भर्ती थे. प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी सहित तमाम हस्तियों ने उनके निधन पर शोक जताया है.

पश्चिम बंगाल से ताल्लुक रखने वाले प्रियरंजन दासमुंशी जब तक राजनीति में सक्रिय रहे तब तक उनकी पहचान अपनी मौजूदगी दर्ज कराते रहने वाले नेता की रही. लेकिन उनके बीमार होने के बाद भी कांग्रेस में उनकी कमी लगातार महसूस की गई. 2016 में जब पश्चिम बंगाल में विधानसभा चुनाव हो रहे थे तब उस वक्त भी पार्टी नेताओं में इस बात को लेकर चर्चा होती थी कि अगर दासमुंशी होते तो कांग्रेस की स्थिति कुछ और ही होती. 2016 में दासमुंशी की कमी इसलिए भी खली क्योंकि प्रणब मुखर्जी राष्ट्रपति बन गए थे और उनकी सेवाएं पार्टी के लिए उपलब्ध नहीं थीं. इन दोनों की कमी में कांग्रेस के पास प्रदेश में कोई ऐसा नेता सक्रिय नहीं था, जिसकी पूरे सूबे में अपनी एक पहचान और अपना असर हो.

ऐसे में वहां के कांग्रेसियों को प्रियरंजन दासमुंशी की कमी काफी खली. प्रणब मुखर्जी के बाद दासमुंशी ही बंगाल में कांग्रेस के खेवनहार रहे. कुछ लोग तो यह भी मानते हैं कि उनका असर प्रणब मुखर्जी से कहीं अधिक रहा है. खुद प्रणब मुखर्जी ने कई बार दासमुंशी की जमकर तारीफ की है.

2008 में दासमुंशी को तब दिल का दौरा पड़ा और पक्षाघात हुआ जब वे उस समय की संयुक्त प्रगतिशील गठबंधन सरकार में बतौर सूचना प्रसारण मंत्री काम करते हुए अपने राजनीतिक करियर के शिखर पर थे. उन्हें जो हुआ था उसे सामान्य शब्दों में समझें तो उनकी दिमाग की कुछ नसें इस तरह से प्रभावित हुईं कि उन्होंने काम करना बंद कर दिया था. इससे हुआ यह कि दासमुंशी के शरीर के दूसरे अंग तो काम करते रहे लेकिन उनका दिमाग नहीं काम कर रहा था और वे अपने आसपास चल रही चीजों से बेखबर थे. वे कोमा में थे.

लेकिन ऐसी परिस्थिति में बंगाल के इस नेता का असर वहां किस कदर था, इसे जानने के लिए एक घटना का जिक्र जरूरी है. 2009 में जब दासमुंशी अस्पताल में संघर्ष कर रहे थे तो उनकी लोकसभा सीट रायगंज से उनकी पत्नी दीपा दासमुंशी चुनाव जीतीं. इस सीट के बारे में माना जाता है कि 1998 का चुनाव हारने के बाद यहां संगठन को पूरी तरह से खड़ा करने का काम प्रियरंजन दासमुंशी ने ही किया था. 2014 में भी दीपा की जीत पक्की मानी जा रही थी. लेकिन प्रियरंजन दासमुंशी के भाई सत्यरंजन दासमुंशी भी तृणमूल के टिकट पर चुनावी मैदान में कूद गए. परिवार की आपसी खींचतान में जीत माकपा के मोहम्मद सलीम की हो गई.

यहां प्रियरंजन दासमुंशी का असर किस कदर था, इसे सिर्फ हार-जीत से नहीं देखा जा सकता. इन तीनों उम्मीदवारों को मिले मतों पर ध्यान दें तो उनके असर का अंदाजा लगता है. यहां जीतने वाले मोहम्मद सलीम को मिले 3,17,515 वोट. प्रियरंजन दासमुंशी की पत्नी दीपा दासमुंशी को 3,15,881 वोट मिले. यानी वे सिर्फ 1,634 मतों से हारीं. वहीं प्रियरंजन दासमुंशी के भाई को 1,92,698 वोट मिले. अब अगर दासमुंशी परिवार के कुल मतों को जोड़ दें तो पता चलता है कि यहां प्रियरंजन दासमुंशी की विरासत कितनी मजबूत है और उनका नाम लेकर चुनाव लड़ने वाला कितनी भारी जीत हासिल करता.

बहरहाल, दासमुंशी लंबे समय से दिल्ली के अपोलो अस्पताल में भर्ती थे. अस्पताल प्रशासन ने दासमुंशी परिवार को यह विकल्प दिया था कि अगर वे चाहें तो उन्हें घर ले जा सकते हैं और प्रशिक्षित स्वास्थ्यकर्मियों के जरिए वहां उनकी देख—रेख की जा सकती है. लेकिन दासमुंशी परिवार ने उन्हें अस्पताल में ही रखने का फैसला किया था.

प्रियरंजन दासमुंशी जिस अपोलो अस्पताल में भर्ती थे, उसे महंगा अस्पताल माना जाता है. जब केंद्र की सत्ता से कांग्रेस बेदखल हुई और भाजपा सत्तासीन हुई तो यह संदेह कई ओर से जाहिर किया जा रहा था कि दासमुंशी के इलाज के लिए सरकार की ओर से दिया जा रहा पैसा रोका जा सकता है. लेकिन उस समय के केंद्रीय स्वास्थ्य मंत्री हर्षवर्धन ने साफ कर दिया था कि सरकार का ऐसा कोई इरादा नहीं है और दासमुंशी की चिकित्सा सरकारी पैसे से जारी रहेगी. हर्षवर्धन ने उस वक्त कहा था कि दासमुंशी ने समाज के लिए काफी काम किया है और अब यह समाज की बारी है कि वह उनके लिए कुछ करे.

विपक्षी नेताओं के मुंह से इस तरह की बात अपने आप में किसी नेता की शख्सियत का अंदाजा देती है. हालांकि, अस्पताल ने कभी औपचारिक तौर पर नहीं बताया था कि दासमुंशी के इलाज में कितना खर्च आता था लेकिन कुछ खबरों के मुताबिक हर रोज तकरीबन 30,000 से 40,000 रुपये का खर्च उनकी चिकित्सा पर आता था.

13 नवंबर, 1945 को जन्मे प्रियरंजन दासमुंशी महज 25 साल की उम्र में 1970 में पश्चिम बंगाल यूथ कांग्रेस के अध्यक्ष बन गए थे. इसके अगले साल यानी 1971 में वे संसद में पहुंच गए. यहां से वे लगातार राजनीति में आगे बढ़ते गए. वे एक तरफ केंद्र की राजनीति में सक्रिय थे तो दूसरी तरफ राज्य की सियासत में भी उनका दबदबा बढ़ता जा रहा था. 1985 में वे पहली बार केंद्र में मंत्री बने. दासमुंशी की दिलचस्पी खेलों में भी खासी रही है. वे तकरीबन 20 साल तक ऑल इंडिया फुटबॉल फेडरेशन के अध्यक्ष भी रहे.

2004 में जब मनमोहन सिंह की सरकार बनी तो उसमें दासमुंशी न सिर्फ सूचना प्रसारण मंत्री थे बल्कि संसदीय कार्य मंत्री भी रहे. सूचना प्रसारण मंत्री के तौर पर वे काफी चर्चा में रहते थे. कभी एएक्सएन और फैशन टीवी पर प्रतिबंध को लेकर तो कभी खेलों का प्रसारण अधिकार दूरदर्शन को दिलाने को लेकर. लेकिन मीडिया में सबसे ज्यादा चर्चा उनकी उस कोशिश की रही जिसके तहत वे खबरिया चैनलों को नियंत्रित करना चाह रहे थे. इसके लिए उन्होंने एक कानून लाने की तैयारी कर ली थी. लेकिन उनके बीमार होने के बाद यह कोशिश धरी की धरी रह गई.