हाल में देश में स्वास्थ्य की स्थिति पर अब तक की सबसे विस्तृत रिपोर्ट ‘इंडिया हेल्थ ऑफ द नेशन्स स्टेट्स’ जारी की गई. देश में पहली बार जारी इस रिपोर्ट को भारतीय चिकित्सा अनुसंधान परिषद (आईसीएमआर) द्वारा जारी किया गया. रिपोर्ट में 1990 से 2016 के बीच देश के राज्यों में स्वास्थ्य की स्थिति बताई गई है.

बीते ढाई दशक के दौरान भारतीय अर्थव्यवस्था संकट की स्थिति से निकलते हुए तेजी से बढ़ती हुई अर्थव्यवस्था में तब्दील हो चुकी है. इस दौरान देश के जिन राज्यों का नाम विकास के मामले में काफी चर्चा में आया है उनमें गुजरात भी शामिल है. इस राज्य में 1995 से लेकर अब तक भाजपा का शासन रहा है.

बीते कुछ वर्षों के दौरान विकास को लेकर भाजपा बार-बार ‘गुजरात मॉडल’ की बात करती रही है. अगले महीने होने वाले विधानसभा चुनावों में भी पार्टी विकास के नाम पर वोट मांग रही है. प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी अपनी चुनावी रैलियों में बार-बार कह रहे हैं कि यह चुनाव विकास और वंशवाद की राजनीति के बीच है.

लेकिन पूरे देश की तरह गुजरात में भी आर्थिक मोर्चे से इतर विकास की स्थिति को लेकर सवाल उठाए जाते रहे हैं. राज्य में स्वास्थ्य की स्थिति कैसी है और सरकार द्वारा इस पर कितना ध्यान दिया जा रहा है, इससे जुड़ी खबरें समय-समय सामने आती रही हैं. इनके मुताबिक सरकार के लाख दावों के बावजूद राज्य में बीमारियों और मौतों की सबसे बड़ी वजह कुषोषण और साफ-सफाई की सुविधा का न होना है. इसके अलावा शराबंदी के बावजूद इससे होने वाली मौतों और बीमारियों की बात भी सामने आई है.

‘इंडिया हेल्थ ऑफ द नेशन्स स्टेट्स’ रिपोर्ट के मुताबिक राज्य के कुल रोगियों में गैर-संक्रामक बीमारियों से पीड़ित व्यक्तियों की हिस्सेदारी 56.7 फीसदी है. इसके अलावा 31.6 फीसदी रोगी संक्रामक बीमारियों से जूझ रहे हैं. 1990 में सबसे अधिक लोग (11.3 फीसदी) डायरिया से पीड़ित थे या उनकी मौत इसकी वजह से हुई थी. 2016 में इस पायदान पर दिल से जुड़ी बीमारियों ने कब्जा जमा लिया. बीते साल गुजरात में 10.9 फीसदी मरीज इन बीमारियों से पीड़ित थे या उनकी मौत इसके चलते हुई थी. 1990 में यह आंकड़ा सिर्फ 4.6 फीसदी हुआ करता था. इसके अलावा राज्य में बीते ढाई दशक के दौरान बीमारियों में डायबिटीज की हिस्सेदारी 0.7 फीसदी से बढ़कर 2.1 फीसदी हो गई.

साभार : 'इंडिया हेल्थ ऑफ द नेशन्स स्टेट्स' रिपोर्ट
साभार : 'इंडिया हेल्थ ऑफ द नेशन्स स्टेट्स' रिपोर्ट

1990 से लेकर 2016 के बीच गुजरात में स्वास्थ्य संबंधी समस्याओं की वजह से होने वाली मौत या स्वास्थ्य संबंधी समस्याओं के पीछे कुपोषण (14.6 फीसदी), भोजन से जुड़ी समस्याएं (10.4 फीसदी) और जहरीली हवा (9.1 फीसदी) सबसे बड़े कारण रहे हैं. इस सूची में धूम्रपान, शराब और नशीली चीजों का सेवन भी शामिल है. यहां बताते चलें कि 1960 में राज्य बनने के बाद से ही गुजरात में शराबबंदी कानून लागू है.

साल 2014 में केंद्र की सत्ता संभालने के बाद से प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी स्वच्छता पर काफी जोर दे रहे हैं. फिर भी रिपोर्ट के मुताबिक 2016 में राज्य में 2.6 फीसदी मरीज दूषित पेयजल और शौचालय के अभाव के चलते होने वाले रोगों से या तो जूझ रहे थे या इनके कारण उनकी मौत हुई थी.

साभार : 'इंडिया हेल्थ ऑफ द नेशन्स स्टेट्स' रिपोर्ट
साभार : 'इंडिया हेल्थ ऑफ द नेशन्स स्टेट्स' रिपोर्ट

इसके अलावा स्वास्थ्य सुविधाओं की बात करें तो मार्च, 2014 के आंकड़ों के मुताबिक गुजरात के कुल 33 जिलों में से नौ ऐसे भी हैं जहां जिला अस्पताल नहीं है. इसके अलावा उपजिला अस्पतालों की संख्या 30 और प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्रों (पीएचसी) की संख्या 1208 है. साल 2011की जनगणना के मुताबिक राज्य की कुल आबादी 6.04 करोड़ है. यानी एक पीएचसी पर औसतन 50 हजार रोगियों की जिम्मेदारी है. जिला अस्पताल के स्तर पर देखें तो यह आंकड़ा करीब 25 लाख हो जाता है.

साभार : राष्ट्रीय स्वास्थ्य मिशन, गुजरात (2012)
साभार : राष्ट्रीय स्वास्थ्य मिशन, गुजरात (2012)

सरकारी आंकड़ों के मुताबिक साल 2012 में पूरे राज्य में 275 पीएचसी की कमी दर्ज की गई थी. इन केंद्रों में 1158 डॉक्टरों की जगह केवल 778 डॉक्टर काम कर रहे थे. इसके अलावा स्वास्थ्यकर्मियों की भी 4400 सीटें खाली थीं. बीते पांच वर्षों में हालात कितने बदले हैं, ये नए आंकड़े सामने आने के बाद ही सटीक रूप से बताया जा सकता है.

आईसीएमआर की ताजा रिपोर्ट के अलावा नेशनल फैमिली हेल्थ सर्वे (एनएफएचएस-4), 2015-16 के मुताबिक गुजरात में नवजात (एक साल से कम) मृत्युदर 34 प्रति हजार और शिशु मृत्यु दर 43 प्रति हजार है. राज्य में पांच साल से कम उम्र के 39.3 फीसदी बच्चों का वजन उनकी उम्र के लिहाज से कम है. इसके अलावा 62.6 फीसदी बच्चे, 55 फीसदी महिलाएं और 22 फीसदी पुरुष शरीर में खून की कमी से जूझ रहे हैं. एनएफएचएस-4 के मुताबिक स्वच्छता के दावों के बावजूद राज्य की एक-तिहाई आबादी अब तक खुले में शौच करने के लिए जाती है. इसके अलावा केवल 23 फीसदी परिवार ही स्वास्थ्य बीमा के दायरे में आते हैं.