गुजरात विधानसभा चुनावों से अब कई राजनैतिक दिग्गजों का भविष्य जुड़ चुका है. हाल ही में इन चुनावों में भाग न लेने की घोषणा करने वाले कांग्रेस प्रदेशाध्यक्ष भरतसिंह सोलंकी इस फेहरिस्त में शामिल एक प्रमुख नाम हैं. कयास लगाए जा रहे थे कि सोलंकी ने यह फैसला टिकट वितरण के समय पार्टी हाईकमान द्वारा उनकी बात को तरजीह न देने की वजह से लिया है. लेकिन उन्होंने मीडिया के सामने इस बात को सिरे से ख़ारिज किया. उन्होंने दावा किया है कि वे पार्टी के वफादार सिपाही हैं और हर मोर्चे पर पार्टी के साथ हैं. भरतसिंह सोलंकी के मुताबिक वे इन चुनावों में किसी एक क्षेत्र से न बंधकर पूरे प्रदेश में संगठन को मजबूती देने का काम करना चाहते हैं.

अपने बयान में भरतसिंह सोलंकी ने भले ही खुद को एक सिपाही माना हो लेकिन पार्टी प्रदेशाध्यक्ष होने के नाते सूबे में इस समय उनकी भूमिका सिपाहसलार की है. ऐसे में गुजरात जैसे महत्वपूर्ण राज्य में अरसे बाद वापसी की उम्मीद पाले बैठी कांग्रेस के सेनापति का ऐन मौके पर चुनाव न लड़ने का फैसला किसी को भी चौंका सकता है. अपने संगठन के मनोबल के लिए पार्टी प्रदेशाध्यक्ष का चुनाव लड़ना कितना महत्वपूर्ण होता है, यह बात पड़ोसी राज्य राजस्थान से समझी जा सकती है. यहां अजमेर के सांसद सांवरलाल जाट (भाजपा) के निधन से खाली हुई सीट पर कुछ महीनों में उपचुनाव होना है. संयोगवश कांग्रेस प्रदेशाध्यक्ष सचिन पायलट भी पिछली दो बार से इसी सीट पर अपनी दावेदारी ठोकते आए हैं जिनमें से इस बार (2014 में) उन्हें जाट के हाथों शिकस्त का सामना करना पड़ा था. सूत्रों के मुताबिक पायलट यह उपचुनाव लड़ने से झिझक रहे थे क्योंकि नतीजे के नकारात्मक रहने की स्थिति में उनके राजनैतिक भविष्य के दांव पर लगने का खतरा है. लेकिन आलाकमान का मानना था कि पायलट के चुनाव न लड़ने की स्थित में प्रदेशभर के कार्यकर्ताओं में गलत संदेश जाने के साथ उनका मनोबल भी कमजोर होगा. लिहाजा कड़े मुकाबले की संभवानाओं के बावजूद पायलट को यह उपचुनाव लड़ने का फैसला लेना पड़ा.

इसलिए सवाल है कि क्या आज की तारीख में राजनैतिक तौर पर राजस्थान से कहीं ज्यादा महत्व रखने वाले गुजरात में अपने प्रदेशाध्यक्ष के चुनाव न लड़ने के फैसले से कांग्रेस शीर्ष नेतृत्व वाक़िफ नहीं होगा? यदि हां तो आखिर ऐसा कौन सा कारण था जो गुजरात में पार्टी के मुखिया को ही चुनावों में पीछे हटने की इजाजत दी गई? इसके जवाब में गुजरात के एक वरिष्ठ राजनैतिक विश्लेषक बताते हैं कि भरतसिंह सोलंकी ने यह निर्णय कांग्रेस आलाकमान के इशारे पर ही लिया है और ऐसा करके उन्होंने अपनी और पार्टी की बड़ी दुविधा हल कर दी है.

गुजरात में इन चुनावों में पाटीदार राजनीति का केंद्र बने हुए हैं, लेकिन भाजपा से नाराज होने के बावजूद वे सोलंकी के पिता और 80 के दशक में दो बार प्रदेश के मुख्यमंत्री रह चुके माधवसिंह सोलंकी की पाटीदार विरोधी नीतियों के चलते पूरी तरह से कांग्रेस के साथ भी जाते नहीं दिखते. ऐसे में जानकार बताते हैं कि भरतसिंह सोलंकी के चुनावी रेस से बाहर होने के बाद कांग्रेस पाटीदारों के उस समूह को कम से कम मनाने की स्थिति में आ गई है जो पार्टी और सोलंकी परिवार से अब तक नाराज है.

विशेषज्ञ यह भी मानते हैं कि भरतसिंह सोलंकी भले ही हार्दिक पटेल के कांग्रेस के साथ आने से उतने खुश न हों लेकिन चुनाव न लड़ने की बात कहकर उन्होंने पटेल की भी मुश्किलें कुछ कम ही की हैं. गुजरात में जब से हार्दिक के कांग्रेस के साथ जाने की खबरें सामने आने लगीं तब से ही न सिर्फ उनके विरोधी बल्कि उनके खास रह चुके लोग भी उन पर एक ऐसी पार्टी का एजेंट होने का आरोप लगाने लगे थे जिसने उनके समुदाय को एकबारगी हाशिए पर ला खड़ा किया था.

प्रदेश के राजनीतिकारों के मुताबिक अब हार्दिक को अपने समुदाय में यह संदेश देने में आसानी रहेगी कि पाटीदार विरोधी नीतियां माधवसिंह सोलंकी ने बनाई थीं न कि कांग्रेस ने, और उनके पुत्र के चुनाव न लड़ने की स्थिति में कांग्रेस से नाराजगी का कोई ठोस कारण नहीं बनता, लिहाजा समुदाय को खुलकर पार्टी और उसके टिकट पर लड़ने वाले पास (पाटीदार अनामत आंदोलन समिति) और अन्य पटेल नेताओं के समर्थन में आना चाहिए.

जानकारों का एक वर्ग यह भी मानता है कि भरतसिंह सोलंकी का चुनावों से पीछे हटने में उनका भी हित छिपा है. प्रदेश के एक वरिष्ठ पत्रकार कहते हैं, ‘सोलंकी जानते थे कि इन चुनावों में उनके पिता की पाटीदार विरोधी छवि का खामियाजा उन्हें उठाना पड़ सकता है. इससे पहले वे दो बार लोकसभा चुनाव जीतने के बाद 2014 के आम चुनावों में आणंद सीट पर दिलीप भाई पटेल (भाजपा) के सामने हार का स्वाद चख चुके हैं. बताया जाता है कि पिछले कुछ समय में अपने क्षेत्र में उनकी पकड़ भी कमजोर हुई है. ऐसे में जब गुजरात चुनाव पार्टी के लिए जीवन-मरण का प्रश्न बन गया है तब प्रदेशाध्यक्ष होते हुए हार जाने की स्थिति में सोलंकी की राजनैतिक प्रतिष्ठा को बट्टा लगने के साथ पार्टी में उनका कद भी घटने खतरा रहेगा.’

वे आगे कहते हैं, ‘इन चुनावों में कांग्रेस का चाहे जो हो लेकिन भरतसिंह सोलंकी अपनी बाजी जीत चुके हैं. उनका नाम अब उन नेताओं में शुमार हो चुका है जो पार्टी के हितों के लिए किसी भी त्याग से पीछे नहीं हटते. देर-सवेर उन्हें इस बात का बड़ा लाभ जरूर मिलेगा.’ यानी कुल मिलाकर देखा जाए तो इन चुनावों में भरतसिंह सोलंकी के पीछे हटने से उन्हें, उनकी पार्टी और उसके सहयोगियों को फायदा ही होता दिख रहा है.

लेकिन प्रदेश के अन्य राजनीतिकार की मानें तो सोलंकी के इस कदम से सूबे में सत्ताधारी भारतीय जनता पार्टी कतई खुश नहीं है. पाटीदारों को कांग्रेस से मिलने से रोकने के लिए भारतीय जनता पार्टी अभी तक माधवसिंह सोलंकी की खाम नीति का हवाला देती आई है. खबरों की मानें तो सोशल मीडिया पर भाजपा द्वारा तैयार करवाया एक विज्ञापन जबरदस्त ट्रेंड में है जिसमें एक दुकानदार दो (पाटीदार) युवकों को इस बात का आभास करवाता है कि कैसे कांग्रेस उनके समुदाय के खिलाफ किसी दुश्मन की मानिंद उतर आई थी.

विश्लेषक बताते हैं कि भरतसिंह सोलंकी के चुनाव लड़ने की स्थिति में भाजपा यह माहौल बना रही थी कि कांग्रेस के जीतने जाने पर वे ही पार्टी की तरफ से मुख्यमंत्री पद के प्रमुख दावेदार होंगे. इस तरह सोलंकी को निशाना बनाते हुए भाजपा पाटीदारों की कांग्रेस विरोधी भावना को जमकर भुना रही थी. लेकिन अब जब भरतसिंह सोलंकी ने चुनाव न लड़ने की घोषणा कर दी है तो जानकारों के मुताबिक भाजपा का यह प्रमुख दांव पूरी तरह नाकाम भले न हो लेकिन हल्का जरूर पड़ गया है. हां, यह अलग चर्चा का विषय जरूर है कि यदि गुजरात में कांग्रेस बहुमत साबित करने में सफल रहती है तो क्या भरतसिंह सोलंकी उसकी तरफ से मुख्यमंत्री पद के दावेदार होंगे या नहीं.