दो दशक से भी ज्यादा वक्त से गुजरात पर भारतीय जनता पार्टी की मजबूत पकड़ रही है. लेकिन इस बार यह कमजोर होती दिख रही है. और इसके पीछे सबसे बड़ी वजह हैं तीन युवा चेहरे जो अपने-अपने समुदायों की अगुवाई कर रहे हैं. हार्दिक पटेल- पाटीदारों के नेता, अल्पेश ठाकोर- पिछड़े वर्गों के अगुवा और जिग्नेश मेवानी- दलितों के पैरोकार. इन तीनों ने गुजरात की सियासत की आबो-हवा बदल दी है. वह भी कुछ इस तरह कि भाजपा को चुनाव जीतने के लिए एड़ी-चोटी का जोर लगाना पड़ रहा है.

लेकिन इस सबके बीच एक और समुदाय है जो शायद गुजरात के अन्य सभी समुदायों से ज्यादा पीड़ित है और उतना ही गुस्से में भी. यह है मुस्लिम समुदाय. 2012 के एक अध्ययन (सेंटर फॉर रिसर्च एंड डिबेट्स इन डेवलपमेंट पॉलिसी) में अबुसालेह शरीफ और बीएल जोशी लिखते हैं, ‘ऊंचे वर्गों के हिंदुओं के मुकाबले शहरी मुस्लिमों में गरीबी 800 फीसदी अधिक है. हिंदू ओबीसी (अन्य पिछड़ी जातियां) और दलित-आदिवासियों की तुलना में मुस्लिमों में गरीबी 50 प्रतिशत ज्यादा है. जबकि ग्रामीण मुस्लिमों में उच्च वर्गों के हिंदुओं के मुकाबले 200 फीसदी ज्यादा गरीबी है.’

गुजरात की कुल आबादी में मुसलमान 10 प्रतिशत के आसपास हैं. इनमें से करीब 60 फीसदी शहरों में रहते हैं. बहुत दूर की बात नहीं है जब यह समुदाय राज्य के उत्पादन और संगठित क्षेत्र में बड़ी ताकत हुआ करता था. तमाम कामगारों की फौज़ में लगभग 13 फीसदी हिस्सा इसी समुदाय का हुआ करता था. आज करीब 53 फीसद मुस्लिम अपना ख़ुद का रोजगार करते हैं या फिर ऐसे काम-धंधों में लगे हैं जिनमें शरीफ और जोशी के मुताबिक बीते दो दशक में न के बराबर ही आमदनी बढ़ी है. इनकी यह दशा इस तथ्य के बावजूद है कि गुजरात में इनकी आबादी दलितों से कुछ ज्यादा तथा असरदार पटेलों से कुछ ही कम है. यानी इनके पास पर्याप्त संख्याबल है कि ये अपना आंदोलन खड़ा कर सकें. दबाव समूह बना सकें. लेकिन ऐसा अब तक तो नहीं हो पाया. और न ही मुस्लिम समुदाय के बीच से हार्दिक, अल्पेश, जिग्नेश जैसा कोई नेता ही निकल पाया. आख़िर क्या कारण हैं इसके?

धीरे-धीरे किनारे होते गए

इसमें कोई संदेह नहीं कि किसी भी आंदोलन की सफलता के लिए भरपूर वित्तीय संसाधनाें की ज़रूरत होती है. इस मामले में मुसलमानों की तुलना में गुजरात के पटेल लाभ की स्थिति में हैं. हालांकि दलितों की स्थिति ऐसी नहीं है. मुस्लिमों में कई समृद्ध व्यापारी वर्ग भी शामिल हैं जैसे- बोहरा, खोजा और मेमन. ये समुदाय किसी आंदोलन को खड़ा करने लायक वित्तीय समर्थन दे ही सकते हैं. लेकिन उनमें भय बैठा हुआ है. और उनका भय काफ़ी हद तक सही भी है कि उन्हें सीधे तौर पर निशाना बनाया जा सकता है.

चर्चित पत्रिका इकनॉमिक एंड पॉलिटिकल वीकली में भारतीय सांख्यिकी संस्थान के अभिरूप सरकार तर्क देते हैं कि मुस्लिमों में बढ़ती समृद्धता की वजह से ही उनके कई वर्ग दंगों के दौरान भी चुपचाप बैठे रहे. वे दो शोधार्थियों- अनिर्बान मित्रा और देबराज राय के अध्ययन का हवाला देते हैं. इसमें दोनों ने अनुमान लगाया है कि 1984 से 1998 के दौरान पूरे देश में हुए तमाम दंगों में लगभग 15,224 लोग मारे गए. इनमें 30 फ़ीसदी गुजरात से थे. यही नहीं इसी समयावधि में मुस्लिमों में प्रतिव्यक्ति खर्च करने की क्षमता भी बढ़ी और साथ-साथ में हिंदू-मुस्लिम संघर्ष भी.

सरकार लिखते हैं, ‘मित्रा और राय के विश्लेषण का सावधानी से अध्ययन करने पर यह भरोसा होता है कि गुजरात के मुस्लिमों की समृद्धता की वजह से भी उन्हें दंगों (2002) के दौरान निशाना बनाया गया.’ अपनी संपत्ति को लूट से और परिवार को हमले से बचाने के लिए धनी-मानी मुस्लिम परिवार अपने समुदाय की बस्तियों की तरफ पलायन कर गए. यह चलन अहमदाबाद से शुरू हुआ जो किसी भी दंगे के समय सबसे पहले सुलग उठता है. खास तौर पर 1969 और 1985 के दंगे इसकी मिसाल हैं. फिर 1989 से 1992 तक भारतीय जनता पार्टी के राम मंदिर आंदोलन के दौरान समुदाय का यह बस्तीकरण पूरे गुजरात में देखा गया और 2002 के दंगों के समय पर यह लगभग पूर्ण हो गया. यानी वे पूरी तरह अपनी बस्तियों में आकर सिमट गए.

इस बस्तीकरण ने मुस्लिमों को आम सार्वजनिक मंचों से लगभग नदारद कर दिया. खास तौर पर उन जगहों से जहां राजनीतिक पटकथाएं लिखी जाती हैं और फिर प्रभावशाली तरीके से उन्हें अमल में लाया जाता है. शायद यह एक बड़ी वजह है कि इस समुदाय का गुस्सा या असंतोष होने के बावजूद कहीं नजर नहीं आता क्योंकि वह अपनी बस्तियों तक ही सिमटा हुआ है. क्योंकि कोई विरोध नतीजा देने लायक तभी हाेता है जब वह नजर आता है.

अहमदाबाद का जमालपुर इलाका. फोटो क्रेडिट : सैम पंथकी/एएफपी
अहमदाबाद का जमालपुर इलाका. फोटो क्रेडिट : सैम पंथकी/एएफपी

निशाना बनाए जाने का डर

फिर भी बदलते भारत में यह आश्चर्य की ही बात है कि युवा मुस्लिम अपनी बस्तियों से बाहर नहीं निकलना चाहते. उनमें राजनीतिक रूप से अपना प्रभाव बढ़ाने की कोई ललक नजर नहीं आती. यह देखकर ऐसा लगता है कि सालों-साल से अपनी बस्तियों में सिमटे रहने के बाद जैसे वे अपनी बस्ती की संस्कृति में ही पूरी तरह रम गए हों. हालांकि सामाजिक कार्यकर्ता डॉक्टर हनीफ़ लकड़ावाला कहते हैं, ‘यह धारणा पूरी तरह सही नहीं है. मैं ऐसे कई मुस्लिम युवाओं से मिला हूं जो राजनीतिक रूप से आगे आने के लिए उतावले हैं. इनमें से दो तो उभर भी रहे हैं.’

स्वास्थ्य और शिक्षा के क्षेत्र में काम करने वाले डॉक्टर लकड़ावाला दरअसल शमशाद पठान अैर मुजाहिद नफीस की बात कर रहे हैं. पठान 37 साल के हैं. पेशे से वकील और सामाजिक कार्यकर्ता भी. नरोडा पाटिया और नरोडा ग्राम के दंगा पीड़ितों के हक़ में उन्होंने आवाज उठाई है और ने उन्हें न्याय दिलाने के लिए संघर्ष कर रहे हैं. पिछले साल उना में दलितों पर हुए अत्याचार के बाद जो राज्यव्यापी दलित आंदोलन हुआ था उसमें भी उन्होंने सक्रिय भूमिका निभाई थी. बल्कि दलित नेता जिग्नेश मेवानी के साथ वे आंदोलन के मुस्लिम चेहरे के रूप में उभरे. दलित-मुस्लिम एकता की वक़ालत की. लेकिन मीडिया ने उन पर ज्यादा ध्यान नहीं दिया. उनका बस नाममात्र का ही जिक्र हुआ. पठान कहते भी हैं, ‘हिंदुस्तानी मीडिया की ख़ासियत है कि वह मुस्लिम नेतृत्व को तवज़्ज़ो देना पसंद ही नहीं करता.’ और नेता के तौर पर स्थापित होने के लिए मीडिया की सुर्ख़ियों में आना तो जरूरी है ही. हार्दिक, मेवानी और ठाकोर के मामलों से ही यह बात साफ है.

वहीं नफ़ीस 35 साल के हैं और पठान की तुलना में थोड़े किस्मत वाले भी. कम से कम राज्य स्तर के मीडिया में उन्हें बीते सितंबर में काफी जगह मिली. उस वक़्त उनके एमसीसी (अल्पसंख्यक समन्वय समिति) नाम के संगठन ने राज्य के सभी जिलों के कलेक्टरों को अपनी आठ सूत्रीय मांगों के संबंध में ज्ञापन सौंपा था. इस ज्ञापन में कुछ ऐसी मांगें शामिल थीं जिनके बारे में इससे पहले कम से कम गुजरात में तो किसी के लिए सोचना भी मुश्किल था. इनमें एक मांग यह थी कि अल्पसंख्यकों के लिए अलग से मंत्रालय बनाया जाए. और दूसरी यह कि अल्पसंख्यक समुदाय के कल्याण के लिए अलग से बजट आवंटित किया जाए.

बताते हैं कि इस आंदोलन के लिए नफ़ीस ने एक साल तक तैयारी की. लेकिन इस दौरान उन्हें तमाम मुश्किलों का भी सामना करना पड़ा जिन्होंने उन्हें अहसास दिलाया कि मुस्लिमों के लिए राजनीतिक तौर पर आगे बढ़ना क्यों दुष्कर है. मिसाल के तौर पर आंदोलन की तैयारी के दौरान दसियों बार तो ख़ुफ़िया ब्यूरो (आईबी) के लोग ही उनसे पूछताछ कर गए. यह जानने के लिए उनके आंदोलन का एजेंडा क्या है, इसके लिए पैसा कहां से आ रहा है आदि. नफ़ीस पूछते हैं, ‘ऐसे माहौल में अपने समुदाय की मांगें सामने रखने के लिए राजनीति में आने की सोच भी कौन सकता है?’

इसी तरह पठान बताते हैं कि उनके माता-पिता हमेशा इस डर से परेशान रहते हैं कि उनके बच्चों को निशाना बनाया जा सकता है. उनके ख़िलाफ़ बेवजह मुक़दमे दर्ज़ किए जा सकते हैं. और यह भय अगर है तो कोई बढ़ाचढ़ाकर की जा रही बात नहीं है. कानूनी सलाहकार सूफ़ी अनवर हुसैन शेख़ का ही एक उदाहरण है. वे महज़ 25 साल के थे जब 2002 में दंगाइयों ने वड़ोदरा में उनका घर जला दिया. इसके बाद वे अहमदाबाद आ गए और यहां दंगा पीड़ितों के लिए लगाए गए शिविरों में काम करने लगे. लेकिन उनके ख़िलाफ़ सरकारी अमले ने एक के बाद एक चार मुक़दमे दर्ज़ कर दिए. इनमें धोखाधड़ी और जबरन वसूली के मामले भी शामिल हैं.

संपत्ति की राजनीति

शेख के मुताबिक मुस्लिम नेतृत्व के उभार के रास्ते में सबसे बड़ी बाधा ‘गुजरात अशांत क्षेत्र अधिनियम’ है. इसके तहत पूरे राज्य में ऐसे क्षेत्र चिन्हित किए गए हैं जिन्हें अशांत माना जाता है. यानी वे सांप्रदायिक रूप से संवदेनशील समझे जाते हैं. अहमदाबाद में ही करीब 40 फ़ीसदी इलाका ‘अशांत क्षेत्र’ माना जाता है. इन इलाकों में किसी भी किस्म की संपत्ति की ख़रीद-फरोख़्त से पहले जिला कलेकटरों से इजाज़त लेनी पड़ती है. यह कानून सबसे पहले राज्य की माधवसिंह सोलंकी की सरकार में अध्यादेश के तौर पर लाया गया था. फिर 1991 में इसे राज्य विधानसभा ने भी पारित कर दिया. साल 2009 में जब नरेंद्र मोदी मुख्यमंत्री थे तो इस कानून में संशोधन किया गया. इसके जरिए जिला कलेक्टरों को यह अधिकार दे दिया गया वे खुद संज्ञान लेकर या किसी शिकायत के आधार पर अशांत क्षेत्र में किसी की भी संपत्ति की ख़रीद-फ़रोख़्त की जांच कर सकते हैं. उस पर हर्ज़ाना लगा सकते हैं. उसे जब्त भी कर सकते हैं.

चूंकि 2002 के दंगों के दौरान करीब-करीब पूरी मुस्लिम आबादी अपने समुदाय की बस्तियों में आकर ही सिमट गई थी जिन्हें पहले ही से कानूनन ‘अशांत क्षेत्र’ के तौर पर चिन्हित किया जा चुका था. लिहाज़ा अब इन बस्तियों में किसी के लिए भी अपनी संपत्ति को बेचना या नई खरीदना मुश्किल हो रहा है. अगर कोई इस सिलसिले में जिला कलेक्टरों के पास अर्ज़ी लगाता भी है तो वह लंबे समय तक लंबित ही रहती है. सो मज़बूरन लोगों को इधर-उधर के रास्ते निकालने पड़ते हैं. जैसे कि वे कोई फ्लैट खरीदते हैं तो उसे किराए की संपत्ति के तौर पर दस्तावेज़ में दिखाते हैं.

माना जाता है कि यह कानून मुस्लिमों के सिर पर तलवार सरीखा लटकता रहता है. खास तौर पर उनके जो राजनीतिक रूप से सक्रित होने का मंसूबा बांधते हैं. ऐसी किसी हलचल की भनक लगते ही इस कानून के जरिए संबंधित शख़्स की संपत्तियों की जांच शुरू कर दी जाती है. शेख़ कहते हैं, ‘इस डर से समृद्ध मुस्लिम भी किसी राजनीतिक आंदोलन को सीधे समर्थन देने से हिचकते हैं. दूसरे शब्दों में कहें तो इस कानून ने मुस्लिम नागरिकों की सरकार पर निर्भरता बढ़ाई है और उनके बीच नए नेतृत्व के उभार की संभावना को चोट पहुंचाई है.’

इसके अलावा जैसा कि शेख़ बताते हैं, ‘मुस्लिम बहुत विधानसभा क्षेत्रों का स्वरूप भी बदल दिया गया है. चुनाव क्षेत्रों के परिसीमन की प्रक्रिया के दौरान ऐसे कई चुनाव क्षेत्र तो लगभग खत्म ही हो गए हैं. उदाहरण के लिए अहमदाबाद की दरयापुर और कालूपुर विधानसभा सीटें. ये पहले मुस्लिम बहुत थीं. लेकिन परिसीमन के बाद इनका बड़ा इलाका दूसरी सीटों के साथ जोड़ दिया गया और इससे इनमें मुस्लिमों के वोट तुलनात्मक रूप से कम हो गए. यही हाल जमालपुर का भी हुआ जिसका बड़ा हिस्सा खड़िया सीट के साथ शामिल कर लिया गया. यानी इस परिसीमन प्रक्रिया ने भी मुस्लिम नेतृत्व के न उभर पाने में बड़ी भूमिका अदा की है.’

राजनीतिक दलों की उदासीनता भी जिम्मेदार

राजनीतिक दल भी स्वतंत्र मुस्लिम नेतृत्व को प्रोत्सहित करने में ज्यादा दिलचस्पी नहीं लेते. पठान कहते हैं, ‘ऐसा नेतृत्व समुदाय को राजनीतिक दलों के ख़िलाफ़ भी खड़ा कर सकता है.’ वैसे समुदाय के नेता के साथ कुछ और चीजें भी जुड़ी होती हैं. मसलन- वह मुख्य धारा की पार्टियों से मोलभाव कर सकता है. रैलियां कर सकता है. मौका आने पर समर्थन भी वापस ले सकता है. हार्दिक जैसे नेता इसी रणनीति पर चलते हुए उभरे हैं.

लेकिन मुस्लिमों के पास यह लाभदायक स्थिति नहीं है. इसकी वजह है गुजरात का राजनीतिक ध्रुवीकरण. गुजरात राजनीतिक तौर पर दो पार्टियों के बीच ही बंटा है- कांग्रेस और भाजपा. हिंदुत्ववादी विचारधारा की वजह से मुस्लिमों के लिए भाजपा बेहतर विकल्प नहीं है. और कांग्रेस यह मानती है कि मुस्लिम तो उसे वोट देंगे इसलिए वह उनकी तरफ ध्यान नहीं देती. इसके बजाय वह हिंदू मतदाताओं को भाजपा के खाते से अपनी तरफ खींचने में लगी है. राहुल गांधी का गुजरात के मंदिरों में जाकर माथा टेकना उसकी इसी कोशिश की मिसाल माना जा रहा है. लकड़ावाला इस पर सवाल भी करते हैं, ‘क्या यह कांग्रेस की नरम हिंदुत्व की नीति नहीं है? मुझे राहुल गांधी के मंदिर जाने से कोई दिक्कत नहीं है. लेकिन क्या वे किसी सूफ़ी संत की दरग़ाह पर नहीं जा सकते थे?’

इसका जवाब शेख देते हैं. वे कहते हैं, ‘कांग्रेस के उपाध्यक्ष ऐसा नहीं कर सकते. क्योंकि कांग्रेस की सफलता का अब तक जो खाम फॉर्मूला (क्षत्रिय, आदिवासी, हरिजन, मुस्लिम) था वह ‘खाप’ (क्षत्रिय, आदिवासी, हरिजन, पटेल) में बदल चुका है. कांग्रेस के नेता माधवसिंह सोलंकी ने 1980 के दशक में खाम फॉर्मूला बनाया था. इससे पार्टी को सत्ता में आने में मदद मिली. लेकिन इस बार सत्ता में वापसी के लिए कांग्रेस ने एम फॉर मुस्लिम की जगह पी फॉर पटेल कर लिया है. और आश्चर्य है कि कांग्रेस के उदारवादी नेता मुस्लिमों के प्रति उपेक्षापूर्ण पार्टी की नीति पर चुप्पी साधे बैठे हैं.’

हालांकि इससे भी बड़ी बात है कि मुस्लिम समुदाय को भी अपनी इस चुनावी अप्रासंगिकता से कोई फ़र्क़ नहीं पड़ता दिख रहा है. वह तो बस इतनी उम्मीद लगाए बैठा है कि इस बार सत्ता परिवर्तन हो जाए. क्योंकि अगर ऐसा न हुआ तो उसे अगले पांच साल फिर डर के साये में रहना पड़ेगा. वह भी अपनी बस्तियों के दायरे में सिमटकर. हालांकि कांग्रेस से भी वह कोई बड़ी उम्मीद नहीं पाल रहा है पर उसे लगता है कि शायद स्थिति कुछ ठीक हो.