इस साल अप्रैल में नीति आयोग की बैठक में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने सभी मुख्यमंत्रियों से कहा था कि वे वित्त वर्ष को कैंलेंडर वर्ष यानी मार्च के स्थान पर जनवरी से शुरू करने पर सहमति बनाएं. प्रधानमंत्री का तर्क था कि इससे वित्तीय संसाधनों का अधिकतम उपयोग करना संभव हो पाएगा. सरकारी सूत्रों ने तब दावा किया था कि 2018 या 2019 से इस बदलाव पर अमल हो जाएगा. पर जीएसटी लागू होने के बाद यह प्रस्ताव खटाई में पड़ता दिखाई देने लगा. बताया गया कि सरकार नहीं चाहती है कि लोगों को एक साथ इतने बदलावों से गुजरना पड़े. इस बीच वित्त मंत्रालय के सूत्रों का कहना है कि अगर अगली दो तिमाहियों में भी अर्थव्यवस्था के हालात ठीक रहे तो लोकसभा चुनाव के पहले यह बदलाव किया जा सकता है. बीती तिमाही में पहली बार पांच तिमाहियों के बाद देश की विकास दर में वृद्धि दर्ज की गई है. अब यह पिछली तिमाही के 5.7 फीसदी के मुकाबले 6.3 पर पहुंच गई है.

वित्त मंत्रालय के एक अधिकारी सत्याग्रह को बताते हैं कि वित्त वर्ष का समय बदलने पर अभी विचार चल रहा है और सही वक्त आने पर इस पर फैसला लिया जाएगा. इस अधिकारी ने आगे कहा कि असल में सरकार अभी जीएसटी और नोटबंदी से पैदा हुई चुनौतियों के दूर होने का इंतजार कर रही है. इनके अनुसार केंद्र सरकार को मौजूदा वित्त वर्ष की दूसरी छमाही में अर्थव्यवस्था के रफ्तार पकड़ने की उम्मीद है. उसका यह भी मानना है कि मार्च-अप्रैल तक जीएसटी से जुड़ी समस्याएं भी लगभग खत्म हो सकती हैं. इसके बाद 2019 से वित्त और कैलेंडर वर्ष को चीन सहित दुनिया के आधे से ज्यादा देशों की तरह हमारे देश में भी एक किया जा सकता है.

लेकिन चुनावी साल से ठीक पहले एक और बड़ा आर्थिक बदलाव लाने के पीछे सिर्फ आर्थिक सुधारों को आगे बढ़ाने की मंशा है या इसकी कोई और भी वजह हो सकती है? सूत्र बताते हैं कि इससे मोदी सरकार को कई फायदे मिलने की उम्मीद है: अभी तक लोकसभा चुनाव के ठीक पहले अंतरिम बजट पेश करने का चलन है. इसके बाद जब नई सरकार गठित हो जाती है तो वह जुलाई में एक पूर्ण बजट पेश करती है जोकि सिर्फ आठ महीने का होने की वजह से एक तरह से अधूरा ही होता है. इसके उलट अगर वित्त वर्ष मार्च की जगह जनवरी से हो जाए तो केंद्र सरकार को 2019 का आम बजट नवंबर 2018 में ही पेश करना होगा. इस वजह से 2019 में लोकसभा चुनाव होने पर भी इस बजट के पूर्ण बजट ही होने की संभावना है. क्योंकि तब सात महीने के अंतरिम बजट का कोई मतलब नहीं होगा. यानी कि वित्त वर्ष में बदलाव करने से सरकार को ठीक लोकसभा चुनाव से पहले मतदाताओं को, बजट के जरिये लुभाने का एक बड़ा मौका मिल जाएगा.

वित्त मंत्रालय के अधिकारी बताते हैं कि इसका एक और फायदा यह है कि इससे देश को चुनावी साल में दो-दो बजट पेश करने के झंझट से भी हमेशा के लिए मुक्ति मिल जाएगी. उनका कहना है कि इसका विपक्ष द्वारा विरोध तो होगा लेकिन ऐसा करने की कोई बड़ी वजह नहीं होनी चाहिए. क्योंकि केवल बजट ही ऐसा मौका नहीं है जह कोई केंद्र सरकार महत्वपूर्ण आर्थिक निर्णय ले सकती है. इसके अलावा सूत्रों का कहना है कि वित्त वर्ष में बदलाव होने पर अगली सरकार को भी तो अगले चुनाव से पहले एक पूर्ण बजट पेश करने का मौका मिलने वाला है.

कुछ जानकार मानते हैं कि मोदी सरकार ऐसा इसलिए भी कर सकती है क्योंकि इस बदलाव से उसकी कड़े और लीक से हटकर फैसले लेने की छवि और मजबूत हो सकती है. वहीं कुछ मानते हैं कि जटिल होने के चलते यह बदलाव सरकार के लिए मुश्किलें भी खड़ी कर सकता है लिहाजा अंतिम फैसले से पहले उसे नोटबंदी के उलट पर्याप्त ‘होमवर्क’ कर लेना होगा.