हिंदुस्तान की पाकिस्तान और चीन से कभी नहीं छनी. वो छलनी ही नहीं मिली जो यह काम कर पाती! इसलिए जब ये दोनों पड़ोसी मुल्क कुछ ऐसा करते हैं कि खुद ही आलोचना के भागी बन जाते हैं तब भी ज्यादातर हिंदुस्तानियों का सीना गर्व से चौड़ा हो जाता है. अमेरिका से हो न हो, पाकिस्तान और चीन से हम आगे हैं, यह कह-जानकर हमें रातों को नींद गहरी आती है और हमारी देशभक्ति का सबसे जल्दी जुबां से बाहर निकल आने वाला सबूत इन देशों को कोसना होता है. फिल्मों की बात कर लीजिए तो हमें फख्र है कि हम पाकिस्तान से बेहतर फिल्में बनाते हैं और चीन जैसे कम्युनिस्ट कंट्री में जब हमारी घनघोर देसी फिल्म ‘दंगल’ सफलता के झंडे गाड़ती है, तो हमें उच्च कोटि की अनुभूति होती है. हजार पहलाज निहलानियों को अपने सेंसर बोर्ड में समाहित करने वाले चीन से बेहतर भी हम अपने सेंसर बोर्ड को मानते हैं.

लेकिन पिछले कुछ समय से हो ये रहा है, कि खासतौर पर फिल्मों के प्रदर्शन को लेकर हम भी पाकिस्तान और चीन जितने कट्टर बनते जा रहे हैं. साल 2016 में हमें ‘पाकिस्तानी’ फवाद खान की वजह से ‘ऐ दिल है मुश्किल’ के प्रदर्शन पर ऐतराज था, पंजाब की असलियत दिखाने की वजह से ‘उड़ता पंजाब’ पर ऐतराज था. हंसल मेहता की ‘अलीगढ़’ को यू/ए सर्टिफिकेट देकर सबके लिए प्रदर्शित करने पर ऐतराज था, नवाज की ‘हरामखोर’ पर इसलिए ऐतराज था क्योंकि वो एक टीचर और छात्र के रिश्ते को दिखाती है.

इसके बाद बीते साल ‘लिपिस्टिक अंडर माय बुर्का’ पर जमकर ऐतराज हुआ क्योंकि वो ‘लेडी ओरिएंटिड’ थी, और जब अगस्त में प्रसून जोशी के आने के बाद ऐतराज होना थोड़ा कम हुआ तो सारी कमियों को पूरा करते हुए कुछ महीनों बाद अब ‘पद्मावती’ पर घनघोर ऐतराज हो रहा है. रानी पद्मावती राष्ट्रमाता हो गई हैं और हमारे दिवालियेपन पर पहले से शर्मसार राष्ट्रपिता महात्मा गांधी के पास इतनी भी गर्दन और नहीं बची कि वे हताशा में सर थोड़ा और झुका सकें.

कमर्शियल फिल्मों के दायरे में आने वाली इन सभी फिल्मों के प्रदर्शन में सिर्फ और सिर्फ राजनीतिक वजहों से दिक्कतें आई हैं. ‘ऐ दिल है मुश्किल’ को महाराष्ट्र नवनिर्माण सेना ने परेशान किया तो ‘उड़ता पंजाब’ को पंजाब सरकार से लेकर केंद्र सरकार तक ने. समलैंगिकता को लेकर भाजपा का रुख स्पष्ट है इसलिए ‘अलीगढ़’ को लेकर सेंसर बोर्ड ने बहुत हल्ला मचाया. ‘लिपिस्टिक अंडर माय बुर्का’ पर भी इसी राजनीति की छाया पड़ी और ‘पद्मावती’ पर तो साफ तौर पर चुनाव से पहले तुष्टिकरण की राजनीति ने आगजनी वाले स्तर का हमला बोला है. इसीलिए डर लगना वाजिब है कि कहीं हम फिल्मों के मामले में ही सही, किसी दिन पाकिस्तान और चीन की तरह इतने कट्टर न बन जाएं कि फिल्मों पर बेसाख्ता बैन लगाने लग जाएं. इन देशों की तरह राजनीति इतनी न हावी हो जाए कि हर तरह की कला का गला घोंट दिया जाए. अभी तो फिर भी कट्टर विरोधों के बावजूद, प्रतिरोध के लंबे दिनों के बाद, फिल्में अपने मौलिक रूप में अंतत: रिलीज हो रही हैं (‘उड़ता पंजाब’ और ‘लिपिस्टिक अंडर माय बुर्का’ उदाहरण हैं) लेकिन कल को क्या पता क्या ही हो जाए...?

चीन की हालत देखिए. उसका फिल्म बाजार इतना बड़ा है कि अमेरिका भी खुद को खूब झुकाकर उसके दरवाजे से प्रवेश करने में हिचकिचाता नहीं. लेकिन फिर भी चालीस हजार सिनेमाघरों और अथाह सरकारी मदद के बावजूद चीन की खुद की फिल्म इंडस्ट्री कायदे का सिनेमा कम रच पाती है. ‘दंगल’ की चीन में महासफलता के बहाने लिखे हमारे इस लेख के द्वारा भी आप उस देश के सिनेमा से जुड़ी राजनीति को बेहतर समझ सकते है, जो हमेशा से बाहरी मुल्कों की फिल्में सेंसर व बैन करता रहा है क्योंकि वो उसकी सरकार और राजनीति को सूट नहीं करतीं, और खुद अपनी कई चीनी फिल्मों का भी प्रदर्शन इसी वजह से नहीं होने देता.

2016 में हॉलीवुड फिल्म ‘घोस्टबस्टर्स’ को चीन ने अपने यहां रिलीज करने से सिर्फ इसलिए मना कर दिया क्योंकि इस मजाकिया फिल्म में भूत-प्रेत मौजूद थे और इस तरह का ‘अंधविश्वास’ चीन की नास्तिक कम्युनिस्ट सरकार की विचारधारा से मेल नहीं खाता है! रसल क्रो की 2014 में आई ‘नोआ’ भी मेनलैंड चाइना में प्रतिबंधित हुई क्योंकि बाइबल में वर्णित नोआ की कथा कहने वाली यह फिल्म जरूरत से ज्यादा धर्म की पैरवी करती थी और एक बार फिर से चीन की कम्युनिस्ट सरकार की विचारधारा को यह पसंद नहीं था. 2011 में चीन की सरकार ने ‘टाइम ट्रैवल’ की कहानी कहने वाली फिल्मों तक पर बैन लगा दिया क्योंकि ऐसा करके कई हॉलीवुड तथा चीनी फिल्में-धारावाहिक प्राचीन चीन में पहुंच जाया करते थे और न सिर्फ उस वक्त की संस्कृति से खिलवाड़ करते बल्कि चीन के इतिहास का सम्मान किए बिना ही वर्तमान में वापस लौट आते थे!

चीन सरकार ने ताइवान की पैदाइश वाले ‘अपने’ निर्देशक आंगली की भी तब तो खूब सराहना की जब 2005 में उन्हें सर्वश्रेष्ठ निर्देशक का ऑस्कर पुरस्कार मिला, लेकिन जिस फिल्म के लिए यह मिला उस ‘ब्रोकबैक माउंटेन’ को कभी चाइना में रिलीज नहीं होने दिया. सिर्फ इसलिए क्योंकि नायकों द्वारा समलैंगिक मोहब्बत के चित्रण से चीन की सरकार को परेशानी थी.

इतना ही नहीं, इसके बाद जब आंग ली ने 2007 में ‘लस्ट, कॉशन’ नाम की सराही गई इरोटिक थ्रिलर बनाई तो अमेरिका में रिलीज होने के बाद इसके कई उत्तेजक दृश्यों को काटकर चीन में रिलीज तो होने दिया गया, लेकिन फिल्म में बेहद उम्दा काम करने वाली इसकी चीनी नायिका को सरकार ने अगले तीन साल तक के लिए बैन कर दिया. उत्तेजक दृश्यों में काम करने की सजा सिर्फ इस अभिनेत्री तांग वेई को मिली और एक अंदरूनी सरकारी आदेश के बाद फिल्मों के अलावा टेलीविजन और विज्ञापनों तक में उन्हें काम नहीं करने दिया गया. उनकी आगे की जिंदगी की कहानी यहां पढ़कर आप द्रवित हो सकते हैं.

अति की हिंसा, न्यूडिटी और भाषा को वजह बताकर ‘डैडपूल’ (2016) और ‘डैंगो अनचेन्ड’ (2012) जैसी कई ख्याति प्राप्त हॉलीवुड फिल्में को भी चीन में रिलीज नहीं किया गया. साथ ही मार्टिन स्कॉरसेजी की बहुप्रशंसित ‘द डिपार्टिड’ को यह वजह बताकर प्रतिबंधित किया गया कि उसमें चीनी मूल के व्यक्ति को विलेन दिखाया गया है और चाइनीज मिलिट्री के बारे में एक-दो जगह आपत्तिजनक बातें कही गई हैं. ‘अवतार’ का भी 2डी वर्जन नहीं रिलीज किया गया क्योंकि चीन को अंदेशा था कि कहीं ताकतवर सत्ता के खिलाफ अल्पसंख्यक कबीलियाई विद्रोह की यह कहानी उसके नागरिकों पर बुरा प्रभाव न डाल दे!

अपनी खुद की फिल्मों को लेकर भी राष्ट्रवादी चीन का यही रवैया रहा है. 1994 में मैंडरिन भाषा में बनी स्थानीय ‘टू लिव’ ने उस वर्ष के कान फिल्म फेस्टिवल में दूसरा सबसे प्रतिष्ठित पुरस्कार ग्रॉन्ड प्री जीता था लेकिन चीन ने अपनी ही फिल्म को अपनी धरती पर बैन कर दिया. माओ की सांस्कृतिक क्रांति (1966-1976) के दौरान एक परिवार द्वारा झेली गईं त्रासदियों का इस फिल्म में बारीक चित्रण था और तब की मौजूदा कम्युनिस्ट सरकार के बर्दाश्त के बाहर की ये बात थी. सांस्कृतिक क्रांति पर आलोचनात्मक रुख रखना आज भी चीनी निर्देशकों के लिए निषेध है और 1993 में बनी प्रतिबंधित ‘द ब्लू काइट’ को भी उस दौर के यथार्थवादी चित्रण के लिए याद किया जाता है.

‘टू लिव’ की ही तरह 2013 में आई ‘अ टच ऑफ सिन’ को भी कान फिल्म फेस्टिवल में सर्वश्रेष्ठ स्क्रीनप्ले का पुरस्कार मिला था, और आज भी रॉटन टोमेटोज पर इसे 93 प्रतिशत की फ्रैश रेटिंग हासिल है. अंतरराष्ट्रीय स्तर पर बेहद सराही गई इस फिल्म को बनने से पहले तो निर्माण की सरकारी अनुमति मिल गई लेकिन जब रिलीज होने से पहले ये अंतरराष्ट्रीय फिल्म समारोहों में प्रदर्शन के लिए पहुंची, और दर्शकों ने चीन में व्याप्त राजनीतिक भ्रष्टाचार और सामाजिक असमानता की थीम्स को बेहद सराहा, तो चीन सरकार ने इस पर ताउम्र के लिए बैन लगा दिया.

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हल्की-फुल्की कॉमेडी करने वाली एनीमेशन फिल्मों का भी चीन में अच्छा-खासा कारोबार है. लेकिन जब इसी साल, जून 2017 में, एक चीनी निर्देशक ने इस विधा का उपयोग कर पैसों के पीछे भागते आधुनिक चीनी समाज की सच्चाई दिखाने वाली ‘हैव अ नाइस डे’ नामक गैंगस्टर कैपर फिल्म बनाई तो न सिर्फ उसे चाइना में बैन कर दिया गया बल्कि फ्रांस के एक स्थापित फिल्म फेस्टिवल तक में बीजिंग ने खुद दखल देकर उसे प्रदर्शित नहीं होने दिया. क्योंकि, पहले चीन सरकार से अपनी फिल्म पर ठप्पा लगवाओ, उसी के बाद विश्व में कहीं दिखाओ– यह चीन का फिल्म एंथम है!

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अब पाकिस्तान आइए. वैसे तो यहां धड़ल्ले से हिंदुस्तानी फिल्में लोटपोट कर देने वाली वजहें देकर बैन होती रहती हैं, और धार्मिक भावनाएं आहत करने की वजह देकर ‘द विंसी कोड’ व ‘नोआ’ जैसी हॉलीवुड फिल्में भी बैन हो जाती हैं. लेकिन पाकिस्तान की खुद की फिल्मों को बैन करने के पीछे की सोच भी बिलकुल चीन जितनी तंग है. इसी वजह से हाल में माहिरा खान अभिनीत ‘वरना’ को पाकिस्तानी सेंसर बोर्ड ने बड़ी जद्दोजहद के बाद पास किया. वजह सिर्फ इतनी रही कि यह फिल्म समाज के प्रतिष्ठित लोगों से बलात्कार का बदला लेने वाली एक मजबूत महिला की कहानी तफसील से कहती है, जिसमें क्रूर नेता भी शामिल हैं, और इस संवेदनशील विषय की वजह से पाकिस्तानी सेंसर बोर्ड को भावनाओं के आहत हो जाने का खतरा सता रहा था.

‘वरना’ के निर्देशक शोएब मंसूर (‘खुदा के लिए’ व ‘बोल’ वाले) अगर खुद एक अंतरराष्ट्रीय ख्याति प्राप्त निर्देशक नहीं होते और इस मामले ने पाकिस्तान की सरहद लांघकर वाया सोशल मीडिया दुनियाभर में हलचल नहीं मचाई होती, तो शायद आज भी यह फिल्म पाकिस्तान में रिलीज नहीं हो पाती.

इससे पहले अप्रैल 2016 की बात ले लीजिए, जब पाकिस्तान में एक फिल्म रिलीज हुई ‘मालिक’. इसे सेंसर बोर्ड से पास होने के बावजूद पाकिस्तानी सरकार ने रिलीज के तीन हफ्ते बाद बैन कर दिया. कारण बताया गया कि तालिबान से निपटने में नाकारा साबित होने वाली सरकार का फिल्म में किया गया चित्रण गलत है. इसलिए पाकिस्तान के ‘सूचना एवं प्रसारण मंत्रालय’ ने सीधे दखल देकर तुरंत इस फिल्म का सेंसर सर्टिफिकेट रद्द किया और देशभर के थियेटरों में इसे दिखाने पर पाबंदी लगा दी.

जबकि पाकिस्तान सरकार द्वारा सेंसर बोर्ड के फैसले को अमान्य कर सीधे दखल देने की वजह इस फिल्म में पाकिस्तानी नेताओं का चित्रण था. पाकिस्तान के कई अखबारों ने लिखा कि सिंध प्रांत के एक भूतपूर्व मुख्यमंत्री का किरदार बेहद भ्रष्ट दिखाया गया है और ऐसा यथार्थवादी चित्रण मौजूदा सियासतदानों को रास नहीं आया. साथ ही फिल्म में मुख्यमंत्री को उसका ही सिक्योरिटी गार्ड गोली मार देता है और इससे पंजाब के गवर्नर सलमान तासीर की हत्या वाले हादसे की यादें बेवजह ही ताजा हो जाती हैं.

‘मालिक’ को बैन करने के कुछ दिन बाद ही, इस्लामाबाद में हुए एक फिल्म फेस्टिवल में स्क्रीनिंग के लिए तैयार दो वृत्तचित्रों के प्रदर्शन पर भी एकाएक बैन लग गया. ‘अमंग द बिलीवर्स’ और ‘बिसीज्ड इन क्वेटा’ नामक इन डॉक्यूमेंट्रीज को इस बार पाकिस्तान के सेंसर बोर्ड ने बैन किया क्योंकि उसकी नजर में यह फिल्में पाकिस्तान की गलत छवि पेश कर रही थीं. जहां ‘अमंग द बिलीवर्स’ मदरसों की अंधेर गलियों में धार्मिक कट्टरता को तलाशने वाली पाकिस्तानी डाक्यूमेंट्री थी वहीं ‘बिसीज्ड इन क्वेटा’ ने बलूचिस्तान में हजारा शिया समुदाय द्वारा बरसों से भोगी जा रही हिंसा पर बात की थी. ये दोनों ही वृत्तचित्र अंतरराष्ट्रीय महोत्सवों में पुरस्कार प्राप्त कर चुके थे लेकिन ‘अभिव्यक्ति की आजादी’ का गला घोंटने के सुरूर में मग्न पाकिस्तान सरकार ने बिना कोई वाजिब वजह दिए इनपर पाबंदी लगाने में देर नहीं की.

इतना सब पढ़ने के बाद, क्या आपको नहीं लगता कि पिछले कुछ सालों में हमारे प्यारे हिंदुस्तान में भी फिल्मों को लेकर वही सब हो रहा है जो कई दशकों से पाकिस्तान और चीन जैसे मुल्कों में होता रहा है? क्या हम सिनेमा को लेकर सच में कम सहनशील और ज्यादा कट्टर नहीं होते जा रहे, या ऐसा सोचना सिर्फ दिमागी बुखार की निशानी है? सोचकर बोलिएगा.