आप किसी रचना को या पुस्तक या लेखक को कैसे पढ़ते हैं यह इस पर निर्भर करता है कि आप कब और कहां पढ़ते हैं. बहुत से लोग समय काटने के लिए पढ़ते हैं और जितनी अवधि तक वे ख़ाली हैं उस दौरान पढ़ना उन्हें पूरा करना होता है. इसमें बुनियादी काम पढ़ना नहीं समय काटना है. उनसे यह उम्मीद नहीं की जा सकती कि वे पढ़ने के सुख के लिए पढ़ रहे होंगे. ऐसे लोग होते हैं जो अपनी दृष्टि और विचार के सत्यापन, उसकी एक बार फिर पुष्टि के लिए पढ़ते हैं: उनसे भी यह उम्मीद नहीं की जा सकती कि उन्हें ऐसी पुष्टि के अलावा पढ़ने से कोई सुख मिलता होगा. ऐसे भी होते हैं जिनके पास समय कम होता है- आजकल सभी अक्सर बेवजह इतने व्यस्त रहते हैं- और वे हड़बड़ी में पढ़ते हैं: पढ़ तो लेते हैं लेकिन उन्हें भी पढ़ने का सुख पाने का अवकाश नहीं मिल पाता. ऊपर बतायी गयी सभी कोटियों के लोग, सौभाग्य से, पढ़ते तो हैं पर उनमें से अधिकांश उससे वह विशिष्ट सुख नहीं पाते हैं जो सिर्फ़ समझ और धीरज, समय और संवेदना के साथ पढ़ने से मिल सकता है.

फिर भी, यह अच्छी बात है कि ऐसे लोग साहित्य, ज़्यादातर उसका लोकप्रिय हिस्सा ही पढ़ते हैं. पढ़ने का सुख भाषा का सुख है- वह मिलता ही तब है जब आप भाषा के प्रति सजग हों और किसी गहरे अर्थ में अपने को भाषा को सौंप दें. हर बड़ा लेखक या कृति अपनी भाषा के लिए जाना-जानी जाता-जाती है. प्रेमचन्द की भाषा प्रसाद की भाषा से अलग थी. दोनों ने महत्वपूर्ण गद्य लिखा. हजारी प्रसाद द्विवेदी की औपन्यासिक भाषा रेणु की भाषा से अलग थी. दोनों ही महत्वपूर्ण हैं. साहित्य में भाषा की संप्रेषणीयता का कोई एक रूप न होता है, न होना चाहिए. अगर ‘बाणभट्ट की आत्मकथा’ की कादम्बरी-भाषा आपको विस्मय से भर देती है तो ‘मैला आंचल’ की भाषा आपको आश्चर्यजनक रूप से स्पन्दित करती है. आप अपने सामान्य जीवन में भले इन दोनों भाषाओं से दूर हों, वे आप तक पहुंचती हैं और भाषा की आपकी दुनिया का अभूतपूर्व विस्तार रखती हैं और उसके भूगोल में ऐसे समय, लोग, अनुभव, भावनाएं आदि ला देती हैं कि आप जाने-अनजाने अधिक सजग, अधिक संवेदनशील हो जाते हैं. पढ़ना, ठीक से पढ़ना, भाषा का सुख लेते हुए पढ़ना, अपने को कहीं न कहीं बदलने जैसा है, भले आप शायद जानकर ऐसा नहीं करते.

हमारे समय की विडम्बना यह है कि पढ़ने का सुख पानेवालों की संस्था आनुपातिक रूप से घट रही है. एक तो पढ़ने का समय देखने के समय से अपदस्थ हो रहा है और दूसरे हर कुछ बना-बनाया फ़ास्ट फ़ूड की तरह तैयार मिल जाए ऐसी मानसिकता व्याप गयी है जो साहित्य पढ़ने में लगनेवाले प्रयत्न और अध्यवसाय से क़तई मेल नहीं खाती. कई बार यह सोचकर प्रीतिकर विस्मय होता है कि इस स्थिति में भी अच्छा साहित्य लिखना घटा नहीं है. भले निराशा का वह एक सभ्यतापरक कर्तव्य है जो पहले की ही तरह अल्पसंख्यक बना हुआ है. ज़िम्मेदारी, सजगता और सचाई से, साहस और कल्पना से लिखना अपनी सभ्यता के उपक्रम को सक्रिय करना, कुछ आगे बढ़ाना है.

ग्वालियर में

ग्वालियर के निजी विश्वविद्यालय आईटीएम विश्वविद्यालय में इस बार डी.लिट् की मानद उपाधि ग्रहण करने जाने का सुयोग हुआ. वह मेरे साथ सामाजिक कार्यकर्ता अरुणा राय, वैज्ञानिक डॉ रघुनाथ अनन्त माशेलकर और डॉ एएस किरण कुमार, फ़िल्मकार गोविन्द निहलानी को भी दी गयी. मैंने असहमति के सम्मान के रूप में, अरुणा जी ने राजस्थान की ‘हमारा पैसा हमारा हिसाब’ अभियान की राजस्थानी महिलाओं की ओर से इसे स्वीकार किया.

एक नयी पहल इस विश्वविद्यालय ने यह की कि दीक्षान्त समारोह के पहले एक अकादेमिक परिसंवाद आयोजित किया जिसमें हम सबसे बीस-बीस मिनट ‘प्रेरक वक्तव्य’ देने को कहा गया. इस आयोजन में हज़ारों छात्र लगभग तीन घंटे बिना कोई बेचैनी दिखाये मौजूद रहे.

मैंने यह कहने की कोशिश की कि तकनीक, विज्ञान और प्रबन्धन के पाठ्यक्रम अक्सर छात्रों को बहुत सारा ज्ञान और उसे व्यवस्थित रूप से कैसे उपयोग में लाना इसका हुनर और जानकारी तो दे देते हैं पर दुनिया कैसी है, समाज और लोग कैसे हैं, संस्कृति आदि कैसे हैं इसका एहसास उन्हें नहीं करा पाते जो कि साहित्य और कलाओं के माध्यम से ही संभव है. एकाग्रता अच्छी चीज़ है पर भारतीय सभ्यता में केन्द्रीयता एकवचन की नहीं हमेशा बहुवचन की रही है. वह ज्ञान अधूरा है जो हमें प्रश्नवाचक न बनाये. राजनीति से हमें षड्यन्त्र और तिकड़म नहीं, यह सीखना चाहिये कि कैसे व्यापा जाता है. धर्म से आस्था सीखना चाहिये पर दूसरों की आस्था या अनास्था का सम्मान करना भी सीखना चाहिये. मीडिया से सच को छिपाना या झूठ को रात-दिन दुहराना नहीं, कभी-कभी हिम्मत कर सच बोलना सीखना चाहिये. साहित्य यही सीख देता है कि दुनिया, मनुष्य का समय और समाज, सचाई आदि सभी बहुल हैं और असल में कोई ‘दूसरे’ नहीं होते: हम ही वे हैं, वे ही हम हैं. साहित्य सच की परमता पर भरोसा नहीं करता: साहित्य अपने पर सन्देह करने का अनोखा अनुशासन है.

इस पर थोड़ा इसरार (ज़ोर देना) ज़रूरी है कि हमें अपने सपनों के टुच्चेपन से मुक्त होना चाहिए. सपना बड़ा होना चाहिये और वही सपना देखना उचित और ज़रूरी है जो दूसरों के लिए देखा गया हो. बिना सपने के सच भी संभव नहीं: एक अर्थ में सारे सब पहले सपने के रूप में ही जन्मे-कल्पित हुए थे. यही बात प्रार्थना पर भी लागू होती है: प्रार्थना वही फलीभूत होती है जो दूसरों के लिए की गयी है.

मैंने इस बात पर खेद व्यक्त किया कि इन दिनों पढ़े-लिखे लोग भारतीय समाज का अन्तःकरण बनने से निजी या वर्गगत स्वार्थों के कारण मुंह चुरा रहे हैं. जो साहस, सृजनात्मकता, प्रश्नवाचकता और नैतिक बोध और ज़िम्मेदारी को छात्र में प्रबुद्ध और टिकाऊ न करे, उस शिक्षा का अन्ततः कोई अर्थ नहीं है!

पुनर्विचार की असम्भावना

जिस मुक्तिबोध ने अपने जीवनकाल में प्रकाशित अपनी एकमात्र साहित्यिक पुस्तक को ‘कामायनी एक पुनर्विचार’ नाम दिया था और ऐसा पुनर्विचार ‘कामायनी’ के प्रकाशन के कुल बीस वर्ष बाद किया था, उन्हीं मुक्तिबोध पर उनकी मृत्यु और उनके पहले कविता संग्रह के 53 वर्ष बाद हिन्दी साहित्य-समाज पुनर्विचार के लिए तैयार नहीं दीखता, कम से कम उसका एक बड़ा और प्रभावशाली वाम अंग. यह ज़ाहिर हुआ रायपुर में उनकी जन्मशती पर आयोजित ‘अंधेरे में अन्तःकरण’ समारोह में, जहां कुछ वामपन्थी मित्रों ने इस पर कुछ समय लगाया कि मुक्तिबोध को उनकी मार्क्सवादी विचार-निष्ठा से अलगाने की कोशिश हो रही है जो ग़लत है. यह भी कहा गया कि किसी लेखक की मार्क्सवादी निष्ठा का अतिक्रमण लक्षित किया जाता है पर दूसरों की अपनी-अपनी विचारधारा अतिक्रमण या अभाव की चर्चा नहीं होती.

इन प्रत्यारोपों को कुछ बारीकी में देखने की ज़रूरत है. मार्क्सवाद बीसवीं शताब्दी में एक बेहद प्रभावशाली विचारधारा रही है और उससे भटकाव के लिए लेखक दंडित तक किये गये हैं. वह हिन्दी में भी बहुत प्रभावशाली विचारधारा रही है, अब तक है. स्वयं मार्क्सवादी पुरोधा राम विलास शर्मा ने मुक्तिबोध को अस्तित्ववादी घोषित करते हुए, एक पुस्तक लिखकर, ध्वस्‍त करने की चेष्टा की थी, भले वे सफल नहीं हुए. इधर कुछ और विजेन्द्र जैसे मार्क्सवादी मुक्तिबोध-ध्वंस में लगे हुए हैं. इसके बरक्स यह तथ्य अनदेखा नहीं किया जा सकता कि मुक्तिबोध पर गंभीरता से अनेक गै़रमार्क्सवादियों जैसे निर्मल वर्मा, कुंवर नारायण, कृष्णा सोबती, रमेशचन्द्र शाह, मलयज और मैंने लिखा है. उनकी कीर्ति में इसका भी योगदान है. यह भी कहा जा सकता है कि मुक्तिबोध की बेहतर समझ के लिए उनके मार्क्सवादी और गै़रमार्क्सवादी पाठ दोनों ही ज़रूरी और सहायक हैं.

ग़ैरमार्क्सवादी पाठ में उनकी मार्क्सवादी निष्ठा को नकारा नहीं गया है. कुछ में उसकी सीमाओं का भले उल्लेख हो, पर उन्हें उससे अलगाने की कोशिश नहीं है. जहां एक दूसरे लेखकों की विचारधारा का संबंध है, रघुवीर सहाय ने शायद ही अपने को कभी समाजवादी घोषित किया हो और उनकी कविता पर समाजवादी रूप में विचार कम ही हुआ है. श्रीकान्त वर्मा सत्तारूढ़ कांग्रेस के महामंत्री तक थे पर उन्होंने स्वयं ‘मगध’ लिखकर सत्ता की अन्ततः विफलता का काव्य लिखकर उस निष्ठा का प्रत्याख्यान किया. कोई भी बड़ा लेखक स्वयं अपनी विचारदृष्टि के बाड़े को तोड़ता है: मुक्तिबोध और शमशेर दोनों ने ऐसा किया और वे बड़े हैं. इस अतिक्रमण से उनकी मार्क्सवादी निष्ठा न तो लांछित होती है और न ही अप्रासंगिक हो जाती है. मैंने तो शुरू में ही इसी आयोजन में एक बार फिर कहा कि मुक्तिबोध का अन्तःकरण पर आग्रह स्वयं मार्क्सवाद का आध्यात्मिक विस्तार है जो कि, मेरी गै़रमार्क्सवादी नज़र में, वह है क्योंकि उस समय दुनिया में कोई मार्क्सवादी अन्तःकरण का मुद्दा उठा ही नहीं रहा था.