जर्मनी की ‘थ्यिसनक्रुप एजी’ पूरी दुनिया में सक्रिय एक बहुमुखी कंपनी है. उसका इतिहास जर्मनी के औद्योगीकरण का इतिहास है. 19वीं और 20वीं सदी के जर्मनी की औद्योगिक नीति ही नहीं, गृह और विदेशनीति भी उसके प्रभावों से मुक्त नहीं कही जा सकती. इसका वर्तमान नाम ‘थ्यिसनक्रुप एजी’ 1999 में ‘थ्यिसन एजी’ और ‘फ्रीड्रिश क्रुप एजी’ नाम की दो अलग-अलग इस्पात (स्टील) कंपनियों के विलय से बना है. 39 अरब यूरो के वार्षिक कारोबार वाली इस कंपनी के लिए विश्व-भर में क़रीब एक लाख 55 हज़ार लोग काम करते हैं.

थ्यिसनक्रुप का वर्तमान भीमकाय स्वरूप पिछले लगभग 130 वर्षों के दौरान हुए अनेक विलयों की देन है. लेकिन, इस बीच इस बहुमुखी कंसर्न की स्टील डिविज़न की हालत अच्छी नहीं चल रही है. उसे अमेरिका और ब्राज़ील में घाटे में चल रहे अपने कारख़ाने बेच देने पड़े हैं. ऐसे में उसे इस्पात के कारोबारी किसी ऐसे बड़े निवेशक की तलाश थी, जो जर्मनी और यूरोप के अन्य देशों में डगमग चल रहे उसके इस्पात कारखानों में पैसा लगाने को तैयार हो.

टाटा ग्रुप की दिलचस्पी

भारत के टाटा ग्रुप ने इसमें दिलचस्पी दिखायी. उसके साथ डेढ़ साल से चल रही बातचीत के बाद, 20 सितंबर 2017 को, थ्यिसनक्रुप ने ऐलान किया कि 2018 के आखिर से पहले ही इन दोनों कंपनियों के इस्पात कारोबार के विलय से एक साझी यूरोपीय इस्पात कंपनी की स्थापना होगी. दोनों के पास इस नयी साझी कंपनी के 50-50 प्रतिशत शेयर होंगे. टाटा स्टील के प्रमुख नटराजन चंद्रशेखरन ने 20 सितंबर की इस सहमति को एक बड़ी उपलब्धि बताया था. इससे पहले टाटा ग्रुप इस विलय को लेकर हालांकि टालमटोल करता दिख रहा था.

साझी कंपनी कैसे चलेगी, इससे जुड़े सारे मामले थ्यिसनक्रुप और टाटा ग्रुप आपसी वार्ताओं द्वारा, 2018 की शुरुआत में सुलझा लेना चाहते हैं, दोनों 2018 के अंत से पहले अंतिम सहमति पर हस्ताक्षर करने के इच्छुक हैं. यह साझी कंपनी भारत के ही लक्ष्मीपति मित्तल की ‘आर्सेलोर-मित्तल’ के बाद यूरोप की दूसरी सबसे बड़ी इस्पात कंपनी होगी. टाटा स्टील अकेले ही संसार की 10वीं सबसे बड़ी इस्पात कंपनी है.

चार हज़ार नौकरियां दांव पर

थ्यिसनक्रुप और टाटा ग्रुप के इस्पात कारोबार के एक हो जाने से विभिन्न मदों पर होने वाले ख़र्चों में 40 से 60 करोड़ यूरो वार्षिक की बचत होने और 15 अरब यूरो तक की बिक्री-आय होने का अनुमान है. इस एकीकरण का एक दूसरा पक्ष यह है कि इससे चार हज़ार लोगों को अपनी नौकरियों से हाथ धोना पड़ सकता है. इस डर से जर्मनी के अलग-अलग शहरों में स्थित थ्यिसनक्रुप के कारखानों और उसके कार्यालयों के 27 हज़ार कर्मचारी, सितंबर महीने से ही, इस विलय के विरोध में प्रदर्शन आदि कर रहे हैं. नयी साझी कंपनी में थ्यिसनक्रुप और टाटा ग्रुप के कुल मिलाकर लगभग 48 हज़ार कर्मचारी होंगे. उसका मुख्यालय जर्मनी के एसन नगर से हटा कर नीदरलैंड (हॉलैंड) के सबसे बड़े शहर एम्सटरडम ले जाया जायेगा.

थ्यिसनक्रुप के कर्मचारी देश की धातुकर्मी (मेटल वर्कर) ट्रेड यूनियन ‘आईजी मेटाल’ में संगठित हैं. इस यूनियन की मांग है कि थ्यिसनक्रुप और टाटा, कम से कम एक दशक के लिए, कर्मचारियों की नौकरियों, उत्पादन इकाइयों, संयंत्रों आदि को उनके वर्तमान स्थानों पर बनाये रखने और समुचित निवेश की सुरक्षा प्रदान करें. इस गारंटी के बिना किसी भी प्रकार के विलय को स्वीकार नहीं किया जायेगा.

विरोध प्रदर्शनों का तांता

यूनियन द्वारा आयोजित प्रदर्शनों के क्रम में अब तक का एक सबसे बड़ा प्रदर्शन 23 नवंबर को राइनलैंड पैलैटिनेट राज्य के अंडरनाख़ में हुआ. इस प्रदर्शन में जर्मनी की श्रम एवं समाजकल्याण मंत्री और सोशल डेमोक्रैटिक पार्टी (एसपीडी) के संसदीय दल की नेता अंद्रेया नालेस ने भी प्रदर्शनकारी श्रमिकों के साथ कंधा मिला कर मार्च किया. थ्यिसनक्रुप के प्रबंधकों की आलोचना करते हुए उन्होंने कहा कि वे महीनों से बता नहीं रहे हैं कि उनके जर्मन कर्मचारियों की नौकरियों का क्या होगा. ‘थ्यिसनक्रुप स्टील यूरोप’ के पर्यवेक्षक मंडल (बोर्ड ऑफ़ सुपरवाइज़र्स) के उपाध्यक्ष ने भी इस प्रदर्शन में भाग लेते हुए कहा, ‘मुझे तो नहीं लगता है कि यह (विलय) हो पायेगा. आज की तारीख़ में हम विलय का अनुमोदन नहीं कर सकते.’

‘थ्यिसनक्रुप स्टील’ के प्रमुख हाइनरिश हीज़िंगर अकेले ही टाटा स्टील के साथ विलय के सबसे उत्साही पैरोकार रहे हैं और अब भी हैं. पिछले कुछ वर्षों के घाटे के बाद सितंबर 2016 से सितंबर 2017 के बीच थ्यिसनक्रुप स्टील ने एक अरब 90 करोड़ यूरो का लाभ कमाया है, किंतु, हीज़िंगर मानते हैं कि ऐसा कुछ ख़ास अनुकूल परिस्थियों के कारण हुआ है. जर्मनी के सार्वजनिक टेलीविज़न चैनल ‘एआरडी’ के साथ एक इंटरव्यू में हीज़िंगर ने कहा, ‘हम इस भुलावे में नहीं रहना चाहते कि ऐसा बार-बार होगा. इस्पात उद्योग की ढांचागत समस्याएं दूर नहीं हुई हैं.’

‘साथी होने पर बोझ बंट जायेगा’

इस इंटरव्यू में अपने आलोचकों से हीज़िंगर का कहना था कि टाटा के साथ साझे प्रयास में ऐसा कोई क़दम नहीं उठाया जायेगा, जो वैसे भी नहीं उठाया गया होता. उन्होंने कहा, ‘इस समय हमें जो बोझ (अकेले) उठाना पड़ रहा है, वह एक साथी के होने पर बंट जायेगा, न कि बढ़ जायेगा.’ हीज़िंगर ने बताया कि विलय से जिन लगभग चार हज़ार लोगों की नौकरियां जायेंगी, वे दोनों पक्षों के लोग होंगे. उनका 50-50 प्रतिशत बोझ दोनों पक्षों को उठाना होगा और भविष्य में दसियों हज़ार कार्यस्थानों को बचाने के लिए यह छंटनी शुरू में ही करनी पड़ेगी.

यहां यह बताना ज़रूरी है कि जब भी कोई एक कंपनी किसी दूसरी कंपनी को ख़रीद लेती है या दो कंपनियों का विलय होता है, तब तथाकथित ‘सिनर्जी-इफ़ेक्ट’ (सहक्रिया-प्रभाव) के कारण हमेशा कुछ ऐसे लोगों की छंटनी होती है, जो एक ही जैसे काम के लिए दोनों ओर होते हैं, उन में से जो अधिक उम्र के हैं, जिनकी कार्यकुशलता में कुछ कमी है या जिन्हें नये ढांचे में खपाया नहीं जा सकता, उन पर ख़र्च होने वाले वेतन को बचाने के विचार से उनकी छुट्टी कर दी जाती है. विलय या अधिग्रहण केवल अपना विस्तार करने के लिए ही नहीं, ख़र्च घटाने, उत्पादकता बढ़ाने और साथ ही अधिक से अधिक लाभ कमाने के उद्देश्य से होते हैं. ऐसे में कुछ न कुछ श्रमिक या कर्मचारी हमेशा दो पाटों के बीच पिसते हैं, इसीलिए वे विलय या अधिग्रहण का प्रायः विरोध ही करते हैं.

भारत की ख़राब छवि

‘थ्यिसनक्रुप स्टील’ और ‘टाटा स्टील यूरोप’ के विलय को लेकर जर्मन कर्मचारियों के मन में कुछ और आशंकाएं भी हैं. एक तो यही है कि टाटा एक भारतीय कंपनी है. वे पूछते हैं कि भारतीय मैनेजर यदि जर्मनों से बेहतर हो सकते हैं, तो उनका देश ग़़रीबी, बदहाली और भ्रष्टाचार के लिए बदनाम क्यों है? वे पहले अपने देश को चुस्त-दुरुस्त क्यों नहीं करते? कहीं ऐसा न हो कि टाटा के मैनेजर थ्यिसनक्रुप स्टील का भी बंटाधार कर बैठें!

इस आशंका के पीछे मूल कारण यह है कि जर्मन मीडिया ने जनता के मन में भारत के बारे में एक ऐसा देश होने का हौवा बैठा दिया है, जहां केवल व्यापक ग़रीबी और भ्रष्टाचार, दलितों और मुसलमानों के साथ अत्याचार या फिर महिलाओं के साथ बलात्कार का बोलबाला है. इस तरह की टिप्पणियां सोशल मीडिया में ही नहीं, प्रिंट और इलेक्ट्रॉनिक मीडिया में भी होती रहती हैं.

पेंशनों का क्या होगा?

थ्यिसनक्रुप स्टील के कर्मचारियों के मन में अपनी छंटनी की संभावना के समान ही एक और बड़ी आशंका यह है कि उनकी पेंशनों का क्या होगा? टाटा स्टील के प्रमुख नटराजन चंद्रशेखरन के बारे में जर्मन मीडिया का कहना था कि 20 सितंबर वाली सहमति से पहले की वार्ताएं डेढ़ साल तक इसी लिए खिंचती रहीं, क्योंकि नटराजन जर्मन कर्मचारियों की कई अरब यूरो भारी पेंशनों का बोझ अपने सिर पर नहीं लेना चाहते थे.

जर्मनी में सरकारी ही नहीं, ग़ैर-सरकारी कर्मचारियों को भी सेवानिवृत्ति के बाद आजीवन पेंशन मिलने का नियम है. इसके लिए हर कर्मचारी को अपने सकल (ग्रॉस) वेतन के 9.35 प्रतिशत के बराबर और उसके नियोक्ता को भी उतना ही पैसा पेंशन- बीमा कोष के लिए देना पड़ता है. भारत में पेंशन देना अनिवार्य नहीं है, इसलिए नटराजन इस अतिरिक्त बोझ से बचना चाहते थे. यह पता नहीं चल सका है कि इस समस्या का क्या समाधान निकाला गया है.

‘टाटा स्टील यूरोप’ भी डगमग है

टाटा स्टील के पास ब्रिटेन में पहले से ही इस्पात बनाने वाले दो कारख़ाने और उसकी ढलाई व अन्य कामों के कई दूसरे कारख़ाने हैं. उसकी एक शाखा नीदरलैंड में भी है. इन सभी जगहों पर कारोबार उतना अच्छा नहीं चल रहा है, जितना नटराजन चंद्रशेखर चाहते हैं. 2009 में इन दोनों देशों में ‘टाटा स्टील यूरोप’ के कुल मिलाकर साढ़े तीन हज़ार कर्मचारियों की छंटनी करनी पड़ी थी. नवंबर 2012 में 900 लोगों को और अक्टूबर 2015 में 1200 लोगों को एक बार फिर अपनी नौकरी से हाथ धोना पड़ा. 2014 के आरंभ में टाटा स्टील का कर्ज भी बढ़ते-बढ़ते 13 अरब पाउंड हो गया था.

ऐसी स्थिति में नटराजन चंद्रशेखरन थ्यिसनक्रुप स्टील के साथ विलय के लिए यदि तैयार हो गये हैं, तो इसका एक बड़ा कारण यही होना चाहिये कि इस जर्मन इस्पात कंपनी की हालत ‘टाटा स्टील यूरोप’ से कुछ बेहतर ही है. वे और टाटा ग्रुप के दूसरे उच्च पदाधिकारी इस विलय में थ्यिसनक्रुप से अधिक अपनी कंपनी का उद्धार देख रहे हैं,

चीन की चुनौती

यह रणनीति कितना रंग लाती है, यह इस पर निर्भर करेगा कि अपने सस्ते इस्पात से विश्व-बाज़ार को पाट देने वाले चीन की भावी रणनीति क्या होगी. इस समय पूरे विश्व में इस्पात के कुल एक अरब 60 करोड़ टन के बराबर उत्पादन का आधा अकेले चीन में होता है. चीन की कंपनियां सरकारी मूल्य-समर्थन के दम पर, औने-पौने दाम में, अपने इस्पात का निर्यात कर विश्व के अन्य इस्पात उत्पादकों की नाक में दम किये हुये हैं.

थ्यिसनक्रुप-टाटा स्टील यूरोप’ का यदि बिना किसी नयी अड़चन के 2018 के अंत तक जन्म हो भी गया, तो भी जर्मन कर्मचारियों के असंतोष और चीन के सस्ते इस्पात से मिल रही चुनौती बनी ही रहेगी.