बिहार में नीतीश कुमार भले ही भारतीय जनता पार्टी के साथ मिलकर सरकार चला रहे हों, लेकिन गुजरात में उनकी पार्टी जनता दल यूनाइटेड (जेडीयू) अकेले 100 सीटों पर चुनाव लड़ने वाली है. अब तक जेडीयू के उम्मीदवारों ने 52 सीटों पर
नामांकन कर दिया है. इसके बावजूद नीतीश कुमार गुजरात में अपने पार्टी के उम्मीदवारों के समर्थन में एक भी चुनावी सभा नहीं करेंगे.

यही वजह है कि जेडीयू के गुजरात में चुनाव लड़ने पर तरह-तरह के सवाल उठाए जा रहे हैं. विपक्षी पार्टियों का आरोप है कि जेडीयू और नीतीश कुमार राज्य में पटेल वोट में बंटवारे की रणनीति पर काम कर रहे हैं. उनका कहना है कि भाजपा से मोहभंग होने की स्थिति में प्रदेश के पटेल मतदाता नीतीश कुमार की पार्टी को तब बिल्कुल वोट नहीं देते जब वे भाजपा के साथ होकर चुनाव लड़ते. लेकिन अकेले चुनाव लड़ने और पटेल उम्मीदवारों के उतारने से भाजपा विरोधी पटेलों में से कुछ वोट जेडीयू को मिल सकते हैं.

हालांकि जेडीयू के महासचिव केसी त्यागी इससे इनकार करते हैं कि उनकी पार्टी का चुनाव में उतरना भाजपा को फायदा पहुंचाने की रणनीति है. उनका कहना है कि गुजरात के पटेल मतदाता खुद को बिहार के कुर्मी मतदाताओं से खुद को जोड़कर देखते हैं. उनके मुताबिक इसके चलते ही जेडीयू प्रदेश में अपनी स्थिति मजबूत करने के लिए चुनाव लड़ रही है.

2012 के विधानसभा चुनावों में भी जेडीयू को गुजरात में एक सीट मिली थी. पिछली बार जेडीयू 55 सीटों पर चुनाव लड़ा था. लेकिन उस चुनाव में जेडीयू की टिकट पर जीते छोटू भाई वसावा अब पार्टी में नहीं हैं. वे जेडीयू के शरद यादव खेमे के साथ हैं और अपनी एक अलग पार्टी बनाकर कांग्रेस के साथ मिलकर चुनाव लड़ रहे हैं.

जेडीयू का गुजरात में चुनाव लड़ना इसलिए भी अटपटा लग रहा है क्योंकि कुछ समय पहले खुद नीतीश कुमार ने यह कहा था कि गुजरात में भाजपा की जीत पक्की है. ऐसे में गुजरात के विपक्षी दल यह सवाल उठा रहे हैं कि अगर खुद नीतीश कुमार को भाजपा की जीत पक्की लग रही है तो फिर उनकी पार्टी क्या गुजरात में हारने के लिए चुनाव लड़ रही है! इस आरोप पर केसी त्यागी कहते हैं, ‘हम अपने चुनाव प्रचार में भाजपा और कांग्रेस दोनों के खिलाफ आक्रामक हैं और हम अपनी जगह बनाने के लिए चुनाव लड़ रहे हैं न कि भाजपा को लाभ पहुंचाने के लिए.’

हालांकि, राजनीतिक विश्लेषकों को जेडीयू का गुजरात चुनाव में इतनी सीटों पर लड़ने का कोई औचित्य नजर नहीं आता क्योंकि प्रदेश में उसके सबसे ताकतवर नेता रहे वसावा अब उसके पास नहीं है और न ही पार्टी के पास प्रदेश में कोई संगठनात्मक ढांचा है. अगर पार्टी अपना आधार मजबूत करने के लिए चुनावों में उतर रही होती तो फिर नीतीश कुमार की चुनावी सभाएं गुजरात में होतीं. लेकिन ऐसा कुछ नहीं हो रहा है.

थोड़ा अतीत में जाएं तो जेडीयू उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनावों को लेकर भी काफी तैयारियां कर रहा था. खुद नीतीश कुमार काफी दिलचस्पी लेकर एक गठजोड़ बनाने की कोशिश कर रहे थे. लेकिन जब ये कोशिशें कामयाब नहीं हुईं तो चुनाव के कुछ समय पहले नीतीश कुमार ने यह घोषणा कर दी कि जेडीयू उत्तर प्रदेश में चुनाव नहीं लड़ेगा.

इस परिप्रेक्ष्य में जेडीयू के गुजरात में चुनाव लड़ने को देखा जाए तो यह अटपटा लगता है कि पार्टी का आधार बढ़ाने के लिए जेडीयू बिहार से सटे उत्तर प्रदेश में चुनाव नहीं लड़ी, लेकिन गुजरात में लड़ रही है. उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनावों से जेडीयू के हटने और गुजरात में चुनाव लड़ने को आपस में जोड़कर देखा जाए तो यह लगता है कि जेडीयू का गुजरात चुनाव लड़ने का निर्णय सिर्फ पार्टी का आधार बढ़ाने के मकसद से नहीं लिया गया.

अगर इस तरह देखा जाए तो विपक्ष के इस आरोप में दम दिखता है कि नीतीश परोक्ष रूप से भाजपा को मदद पहुंचाने के लिए गुजरात में अपने उम्मीदवार उतार रहे हैं. माना जा रहा है कि जेडीयू बड़ी संख्या में पटेल उम्मीदवारों को उतारकर पटेल वोटों में विभाजन करके परोक्ष रूप से भाजपा को मदद पहुंचाने की रणनीति पर काम कर रहा है.

तो फिर नीतीश कुमार चुनाव प्रचार करने क्यों नहीं जा रहे? राजनीतिक जानकारों को इसकी वजह यह समझ में आती है कि अगर नीतीश कुमार चुनाव प्रचार में उतरते हैं तो गुजरात के विपक्षी दल इसे बड़ा मुद्दा बना सकते हैं. नीतीश कुमार का सियासी कद भी काफी बड़ा है और अगर वे गुजरात में जेडीयू के लिए वोट मांगते हैं तो इसे विपक्षी दल नरेंद्र मोदी और भाजपा के खिलाफ एक औजार के तौर पर इस्तेमाल कर सकते हैं. यह स्थिति नरेंद्र मोदी को भी अपने गृह राज्य में असहज बनाती और नीतीश कुमार के लिए भी यह कोई सहज स्थिति नहीं होती.