पद्मावती फिल्म पर उठा विवाद थमने का नाम नहीं ले रहा. मामला अब इस हद तक बढ़ चुका है कि बीते दिनों इसके चलते एक व्यक्ति की हत्या की घटना भी सामने आ चुकी है. जयपुर के नाहरगढ़ किले में एक युवक का शव लटका मिला. वहीं एक धमकी भरा संदेश भी लिखा था - ‘हम सिर्फ़ पुतले नहीं लटकाते. ‘पद्मावती’ का विरोध.’ हैरानी की बात यह है कि इस घटना के बाद भी शासन-प्रशासन उस तरह से हरकत में आता नहीं दिख रहा जैसा उसे इस विवाद की शुरुआत में ही आ जाना चाहिए था.

नाहरगढ़ में हुई घटना का पद्मावती फिल्म पर उठे विवाद से वास्तव में कोई संबंध है या नहीं, इसकी जांच जारी है. लेकिन यह कहा जा सकता है कि इस विवाद में काफी लंबे समय से लगातार ऐसी हत्याओं की पृष्ठभूमि तैयार हो रही है. कभी कोई ठाकुर नेता इस फिल्म से जुड़े कलाकारों की हत्या करने के लिए पांच करोड़ रु का इनाम घोषित कर रहा है तो कभी कोई भाजपा नेता इनाम की राशि को दोगुना बढ़ा रहा है. राजपूतों के कई स्वघोषित प्रतिनिधि फ़िल्मी कलाकारों की हत्या की खुलेआम धमकी दे रहे हैं, वे बाकायदा राष्ट्रीय समाचार चैनलों पर आकर तलवार लहरा रहे हैं और कानून व्यवस्था को धता बताते हुए यह तक ललकार रहे हैं कि सरकार में हिम्मत है तो उन्हें गिरफ्तार करे.

इस तरह की धमकी देना सीधे-सीधे भारतीय दंड संहिता के अनुसार एक गंभीर अपराध है. ये धमकियां सिर्फ उकसावे में कही गई बातें भर नहीं हैं.   

इस सब के बावजूद इन तमाम लोगों में से किसी एक को भी अब तक गिरफ्तार नहीं किया गया है. ऐसी स्थिति में सवाल उठ सकता है कि क्या देश में वास्तव में कानून का शासन है? यह सवाल इसलिए भी प्रासंगिक है कि इस तरह की धमकी देना सीधे-सीधे भारतीय दंड संहिता के अनुसार एक गंभीर अपराध है. ये धमकियां सिर्फ उकसावे में कही गई बातें भर नहीं हैं. भाजपा नेता सूरज पाल अम्मू ने तो बाकायदा मीडिया के सामने यह बात खुलेआम कही है कि दीपिका पादुकोण और संजय लीला भंसाली का सर काटने वाले व्यक्ति को वे दस करोड़ का इनाम देंगे और उसके परिवार की जरूरतों का भी ध्यान रखा जाएगा.

इस तरह के बयान देना साफ तौर से हत्या की खुलेआम फिरौती देना है. इसके बावजूद भी वे अब तक गिरफ्तार नहीं हुए हैं. यह जरूर है कि पार्टी की तरफ से कारण बताओ नोटिस मिलने के बाद बुधवार को उन्होंने हरियाणा में भाजपा के मुख्य मीडिया संयोजक पद से इस्तीफा दे दिया. हालांकि इसका ऐलान करते हुए भी उनके चेहरे पर अपने कहे के लिए कोई खेद का भाव नहीं दिख रहा था.

बीते कुछ सालों में देश में ऐसी कई गिरफ्तारियां हुई हैं जिन्हें साफ तौर से गैर-कानूनी कहा जा सकता है. ये गिरफ्तारियां कभी प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी पर कोई टिप्पणी करने के ‘अपराध’ में की गईं तो कभी ममता बनर्जी का कार्टून बनाने के ‘अपराध’ में. कई मौके तो ऐसे भी आए जब फेसबुक पर किसी पोस्ट को लाइक करने के ‘अपराध’ में भी कुछ लोगों को गिरफ्तार कर लिया गया. लेकिन देश के विभिन्न राज्यों की जो पुलिस इतनी मुस्तैद रहती है कि फेसबुक पर एक लाइक करने पर ही किसी को गिरफ्तार कर लेती है, इन दिनों खुलेआम हत्या की धमकी और फिरौती देने वालों को गिरफ्तार करने की हिम्मत नहीं जुटा पा रही.

आम धारणा है कि पुलिस राज्य सरकार के इशारे पर ही काम करने को मजबूर होती है. इसलिए कई मानते हैं कि हत्या की धमकी देने वाले इन लोगों के अब तक गिरफ्तारी से बचे रहने के पीछे यही मुख्य कारण भी माना जा सकता है. चूंकि इनमें से अधिकतर लोग प्रत्यक्ष या परोक्ष रूप से भाजपा से जुड़े हैं और लगभग उन सभी राज्यों में भाजपा की ही सरकार है जहां ये रहते हैं, इसलिए कहा जा सकता है कि इन्हें सत्ता का संरक्षण मिला हो.

देश की कोई भी अदालत इस मामले का स्वतः संज्ञान लेते हुए इन लोगों की गिरफ्तारी के आदेश दे सकती थी जो कानून व्यवस्था की खिल्लियां उड़ाते हुए खुलेआम हत्या की धमकी दे रहे हैं. लेकिन ऐसा भी नहीं हुआ

ऐसे में न्यायपालिका से हस्तक्षेप की एक स्वाभाविक उम्मीद बनती है. कुछ समय पहले ही सुप्रीम कोर्ट ने देशभर के सिनेमा घरों में फिल्म शुरू होने से पहले राष्ट्रगान बजाए जाने के आदेश दिए थे जबकि इस तरह के आदेश देना कहीं से भी न्यायपालिका के कार्यक्षेत्र में नहीं आता. लेकिन पद्मावती मामले में इस तरह की न्यायिक सक्रियता भी कहीं नज़र नहीं आ रही. देश की कोई भी अदालत इस मामले का स्वतः संज्ञान लेते हुए इन लोगों की गिरफ्तारी के आदेश दे सकती थी जो कानून व्यवस्था की खिल्लियां उड़ाते हुए खुलेआम हत्या की धमकी दे रहे हैं. लेकिन ऐसा भी नहीं हुआ.

जयपुर में हुई हालिया हत्या की जांच अभी चल रही है. अगर जांच में यह साबित होता है कि सच में यह हत्या पद्मावती के विरोध के कारण हुई है तो क्या उन तमाम लोगों को भी हत्या का अपराधी नहीं माना जाना चाहिए जो पिछले कई दिनों से लगातार हत्या की धमकियां दे रहे हैं और फिल्म से जुड़े लोगों का गला काटने का इनाम घोषित कर रहे हैं? और अगर यह मान भी लिया जाए कि हालिया हत्या का इन धमकियों से कोई सीधा लेना-देना नहीं है, तब भी इस तरह की धमकियां देना अपने-आप में एक गंभीर अपराध तो है ही.

कानूनन देखा जाए तो इस अपराध के लिए इन लोगों को उसी दिन गिरफ्तार कर लिया जाना चाहिए था जिस दिन इन्होंने ऐसी धमकियां जारी की थी. लेकिन इन लोगों की अब तक भी गिरफ्तारी नहीं हुई है, ये आज भी लोग बेख़ौफ़ घूम रहे हैं और राष्ट्रीय चैनलों पर खुलेआम अपने अपराध को बार-बार दोहराने का दुस्साहस भी कर रहे हैं. क्या ऐसे में यह कहा जा सकता है कि देश में कानून का शासन है? और अगर है तो क्या वह शासन कुछ और हत्याएं हो जाने के इंतज़ार में है?