जैसे पांच दिन तक खाना ना खाकर एक दिन में ही ढेर सारा खाना ठूंसकर खा लेना आपकी हफ्तेभर की भोजन की जरूरत पूरी नहीं कर सकता, उसी तरह शनिवार-इतवार को खूब सोने से बीते पांच दिनों की कम नींद की भरपाई नहीं हो सकती. हालांकि ज्यादातर लोग ऐसा नहीं मानते इसीलिए वे वीकेंड पर दोपहर 11-12 बजे तक सोना पसंद करते हैं. लेकिन ये लोग यह बात जरूर मानेंगे कि इन दो दिनों में घंटों लंबी नींद लेने के बावजूद वे तरोताजा महसूस करने के बजाय थके हुए ही रहते हैं. सिर-पैर के सवाल में इस बार जानते हैं कि ऐसा क्यों होता है.

बहुत ज्यादा सोना या ओवरस्लीपिंग के बाद शरीर ठीक वैसा ही महसूस करता है जैसा काफी मात्रा में शराब पीने के कुछ घंटे बाद यानी हैंगओवर में कर रहा होता है, इसीलिए वैज्ञानिक इसे स्लीपिंग ड्रंकेननेस कहते हैं. शराब पीने से जहां हमारे तंत्रिका तंत्र की कोशिकाएं डैमेज होने के कारण व्यक्ति थकान या सिरदर्द महसूस करता है, वहीं ज्यादा सोने के बाद दिमाग का शरीर को नियंत्रित करने का तरीका गड़बड़ हो जाता है और व्यक्ति हैंगओवर की ही तरह असहज महसूस करता है.

हमारे शरीर की एक लय होती है जिसे सर्कैडियन रिदम या बायोलॉजिकल क्लॉक (जैविक घड़ी) कहते हैं. यह लय सर्कैडियन पेसमेकर से तय होती है. सर्कैडियन पेसमेकर दिमाग के हाइपोथैलेम हिस्से में पाई जाने वाली कोशिकाओं का समूह होता है जो शरीर में भूख, प्यास और पसीने को नियंत्रित करता है. हमारी जैविक घड़ी आंखों पर पड़ने वाली रोशनी से सक्रिय होती है. इसका काम शरीर की कोशिकाओं को दिन या रात की सूचना देना होता है.

वैज्ञानिकों का मानना है कि जैविक घड़ी से मिली इसी सूचना के आधार पर शरीर यह तय करता है कि अब दिन के बचे हुए वक्त में उसे कितनी ऊर्जा का इस्तेमाल करना है. जब आप बहुत ज्यादा सोते हैं तो बायोलॉजिकल क्लॉक अपना काम करना बंद कर देती है या भ्रमित हो जाती है. इसलिए यह शरीर को असली स्थिति से अलग कोई और सूचना भेजना शुरू कर देती है. इसीलिए व्यक्ति सोकर उठने के बाद भी तरोताजा महसूस करने के बजाय थकान या सिरदर्द महसूस कर रहा होता है.

इसे ऐसे भी समझा जा सकता है : मान लीजिए आप बाकी दिनों में सही वक्त पर सोते और जागते हैं और केवल शनिवार के दिन 11 बजे सोकर उठते हैं. ऐसे में आपकी बायोलॉजिकल क्लॉक रोज की तरह सुबह 7 बजे से अपना काम कर रही होती है और आपकी ऊर्जा भी, अपेक्षाकृत कम रेट से ही सही पर खर्च हो रही होती है. इसीलिए उठते ही आप एक साथ उतना थका हुआ महसूस करते हैं जितना 7 से 11 बजे के दौरान जागे होने पर काम करते हुए करते. अगर आप अक्सर ही बहुत सोते हैं या बहुत देर से सोते हैं तो भी आपकी बायोलॉजिकल क्लॉक भ्रमित हो जाती है और व्यक्ति सुस्त नजर आने लगता है. इसके पीछे वैज्ञानिक वजह बताते हैं कि रोज बहुत सोने से शरीर को यह संदेश जाता है कि व्यक्ति को काम करने के लिए ऊर्जा की जरूरत नहीं है. इससे मेटाबॉलिज्म धीमा हो जाता है यानी शरीर में कैलोरी की खपत कम हो जाती है और धीरे-धीरे व्यक्ति मोटापे या इससे जुड़ी बीमारियों का शिकार होने लगता है.

हार्वर्ड यूनिवर्सिटी में हुआ एक शोध बताता है कि 9 से 11 घंटे तक सोने वालों को याद्दाश्त से जुड़ी समस्याएं होने लगती हैं, कुछ अन्य शोध इसे मोटापे, डायबिटीज और उम्र के घटने से जोड़कर भी देखते हैं. कुल मिलाकर वीकेंड पर देर तक सोना न सिर्फ आपके एक दिन को खराब करता है, कुछ कामों को अटकाता है बल्कि आपकी जिंदगी से थोड़ा समय भी कम कर देता है.