कुछ दिनों से यह चर्चा चल रही है कि वरुण गांधी कांग्रेस में शामिल हो सकते हैं. वरुण अभी उत्तर प्रदेश के सुलतानपुर से लोकसभा सांसद हैं. राजनाथ सिंह जब भाजपा अध्यक्ष थे तो उनकी टीम में वरुण गांधी राष्ट्रीय महासचिव थे. लेकिन अमित शाह की टीम में उनके लिए जगह नहीं बन पाई. न ही उन्हें प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने सरकार में ही कोई जिम्मेदारी दी. उनकी मां मेनका गांधी मोदी सरकार में कैबिनेट हैं लेकिन वरुण गांधी की सरकार और पार्टी दोनों में ही किसी भी तरह की कोई हैसियत नहीं है.

इस साल हुए उत्तर प्रदेश के विधानसभा चुनाव से पहले पार्टी में इस तरह की चर्चा जरूर चली थी कि अखिलेश यादव का मुकाबला करने के लिए भाजपा को वरुण गांधी को आगे करना चाहिए लेकिन पार्टी ने ऐसा भी नहीं किया. सच तो यह है कि उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनावों में वरुण की भूमिका बेहद सीमित रही. जाहिर है कि अपनी इस स्थिति से कोई भी नेता व्यथित होगा. वरुण गांधी भी हैं. कुछ मौकों पर मोदी सरकार को लेकर थोड़ा कड़ा रुख भी उन्होंने अख्तियार किया है. इस पृष्ठभूमि में यह कहा जा रहा है कि वे कांग्रेस की ओर रुख कर सकते हैं और अपने चचेरे भाई राहुल गांधी के नेतृत्व में कांग्रेस को नए सिरे से 2019 के मुकाबले के लिए खड़ा करने के काम में जुट सकते हैं. लेकिन राजनीतिक परिस्थितियों और गांधी परिवार के पहले के मतभेदों को ध्यान में रखें तो वरुण का कांग्रेस में जाना उतना आसान भी नहीं है. हालांकि, राजनीति में ऐसी किसी भी संभावना को खारिज भी नहीं किया जा सकता लेकिन कम से कम पांच ऐसी वजहें तो दिखती ही हैं, जिनके आधार पर कहा जा सकता है कि भाजपाई वरुण का कांग्रेसी होना बेहद मुश्किल हैः

सोनिया-मेनका की अदावत

यह कहना अभी जल्दबाजी होगी कि सोनिया गांधी और मेनका गांधी अपने आपसी संबंधों की पुरानी कड़वाहट को भुलाने के लिए तैयार हैं. सोनिया बीमार भले हैं लेकिन राहुल गांधी और कांग्रेस के निर्णय में उनकी अहम भूमिका है. मेनका तो उनसे भी अधिक सक्रिय हैं. सोनिया गांधी की शादी राजीव गांधी से 1968 में हुई. इसमें इंदिरा गांधी की सहमति थी. लेकिन संजय गांधी और मेनका गांधी की 1974 में हुई शादी कई तरह के विवादों में रही. माना जाता है कि खुद इंदिरा इसके पक्ष में नहीं थीं. सोनिया इंदिरा की प्रिय बहू रहीं जबकि मेनका को लेकर नौबत यहां तक आ पहुंची कि इंदिरा गांधी ने उन्हें अपने घर से निकाल दिया. कहा जाता है कि मेनका अपने अपमान और खुद से नेहरु-गांधी विरासत छिन जाने के लिए लिए सोनिया को भी जिम्मेदार मानती हैं. उनका मानना है कि इंदिरा गांधी की राजनीतिक विरासत के असली हकदार संजय गांधी थे और उनके न होने पर वे खुद और उनके बाद वरुण गांधी. ऐसे में दोनों अपने बच्चों को पुरानी अदावत भूलकर एक होने को कहें, इसकी संभावना कम ही नजर आती है.

वरुण की छवि

वरुण गांधी ने राजनीति में अपनी छवि हमेशा से कट्टर हिंदुत्व वाले नेता की बनाई है. उनकी राजनीतिक शैली में उनके पिता संजय गांधी की आक्रामकता तो रही है लेकिन भाजपा में होने की वजह से उन्होंने इसमें हिंदुत्ववादी आक्रामकता को भी मिला दिया. इसके उलट कांग्रेस की राजनीति मध्य मार्गी रही है. अभी भी राहुल गांधी जिस तरह की राजनीति पार्टी को खड़ा करने की कोशिश कर रहे हैं उसमें राजनीतिक उदारवादिता और नरम हिंदुत्व का मेल दिखता है. इस वजह से एक तरफ राहुल गांधी सभी वर्गों को साथ लेकर चलने की बात भी कर रहे हैं तो दूसरी तरफ लगातार मंदिरों में माथा भी टेक रहे हैं. वरुण गांधी की छवि इसके खिलाफ जाती है.

खेमेबाजी की आशंका

अगर वरुण कांग्रेस में आ भी जाते हैं तो हाल-फिलहाल वे राहुल गांधी के लिए कोई खतरा बनें, इसकी आशंका तो न के बराबर है. लेकिन अगर राहुल लगातार नाकाम होते रहते हैं तो पार्टी के अंदर वरुण गांधी एक नये ताकतवर केंद्र बनकर उभर सकते हैं. पार्टी में अब भी वरुण के पिता संजय गांधी को मानने वालों की कमी नहीं है. ऐसे लोग अभी भले ही अहम पदों पर नहीं हों लेकिन वरुण के कांग्रेस में आने से इन लोगों को एक नई ताकत मिल सकती है. ऐसे में अगर राहुल गांधी अगर थोड़े कमजोर पड़ते हैं तो उस स्थिति में ये सभी वरुण गांधी के पीछे गोलबंद हो सकते हैं. सोनिया गांधी और राहुल गांधी भी इस बात को समझते होंगे. इस वजह से कांग्रेस में वरुण गांधी के शामिल होने की बात ठोस आधार पर खड़ी होने के बजाय अटकलबाजी अधिक लगती है.

वरुण के खिलाफ दर्ज मामले

अगर कांग्रेस प्रियंका गांधी को आक्रामक ढंग से आगे नहीं ला पा रही है तो राजनीतिक जानकार इसकी दो वजहें मानते हैं. पहली तो यह कि प्रियंका गांधी के सामने आते ही राहुल गांधी की स्थिति कमजोर हो सकती है. दूसरी वजह यह बताई जाती है कि प्रियंका गांधी के सक्रिय होते ही उनके पति राॅबर्ट वाड्रा से संबंधित सारे मामलों का इस्तेमाल भाजपा और उसकी सरकारें कांग्रेस को घेरने के लिए कर सकती हैं. यही स्थिति वरुण गांधी की बी है. भड़काऊ भाषण देने का मामला वरुण गांधी के खिलाफ अभी भी चल रहा है. अगर वरुण कांग्रेस में सक्रिय होते हैं तो इस संभावना को खारिज नहीं किया जा सकता है कि भाजपा और उसकी अगुवाई वाली केंद्र और राज्य की सरकारें वरुण के खिलाफ चल रहे इस मामले में आक्रामक हो सकती हैं. ऐसी स्थिति में कांग्रेस को एक गैरजरूरी विवाद में फंसना पड़ेगा. बड़ी मुश्किल से राहुल की अगुवाई में खड़ी हो रही कांग्रेस यह जोखिम ले, इसकी संभावना कम ही दिखती है.

परिवारवाद और संजय गांधी की छाया

वरुण गांधी के कांग्रेस में आते ही भाजपा और दूसरे कांग्रेस विरोधी दलों को कुछ नये और बड़े मुद्दे मिल जाएंगे. भाजपा और खुद प्रधानमंत्री कांग्रेस पर परिवारवाद को लेकर जो हमले करते हैं, वह एक नए स्तर तक पहुंच सकता है. वरुण अगर कांग्रेस में जाते हैं तो उन्हें कोई अहम जिम्मेदारी तो मिलेगी ही. ऐसी स्थिति में भाजपा कह सकती है कि कांग्रेस पूरी तरह से एक वंशवादी पार्टी है. आपातकाल को लेकर अभी भाजपा का हमला इंदिरा गांधी तक ही सीमित रहता है. वह आपातकाल में संजय गांधी की भूमिका को लेकर इसलिए कुछ नहीं बोल पाती क्योंकि उनकी पत्नी मेनका गांधी और बेटे वरुण गांधी भाजपा में ही हैं. लेकिन अगर वरुण कांग्रेस में शामिल होते हैं तो संजय गांधी पर भी भाजपा आक्रामक रुख अपनाने लगेगी. उन्हें आपातकाल के लिए सबसे ज्यादा जिम्मेदार व्यक्ति के पुत्र के तौर पर पेश करेगी. अब जब राहुल गांधी बतौर अध्यक्ष कांग्रेस की कमान संभालने जा रहे हैं, इस बात की संभावना कम है कि वे पार्टी को इन नए विवादों में उलझाने का जोखिम लें. इन विवादों में उलझने से आर्थिक और सामाजिक मुद्दों पर मोदी सरकार को घेरने का उनका एजेंडा पीछे छूट सकता है.