किसी भी बहुसांस्कृतिक समाज में मंदिर-मस्जिद या यात्रा और हज का राजनीतिक उपयोग करना खतरनाक हो सकता है. आज के हमारे राजनेता भले ही इसे समझ पाने की स्थिति में न हों, लेकिन जब भारत एक बहुसांस्कृतिक राष्ट्र के रूप में उभर ही रहा था, तबके लोग ऐसे मामलों पर बहुत समझ-बूझ से काम ले रहे थे. जबकि यह दौर खुद गलतियां करके सीखने का था. हमारे पास इन दुविधाओं से उबरने का कोई ठोस राजनीतिक मॉडल नहीं था. तब तक कोई ठोस संविधान भी अस्तित्व में नहीं आया था. फिर भी ऐसे धार्मिक प्रतीकों के राजनीतिक इस्तेमाल के प्रति हमारे राष्ट्र-निर्माता बहुत सजग और संवेदनशील थे.

अब सोमनाथ मंदिर को ही लीजए. आज इसपर नेहरू औऱ पटेल की भूमिका को लेकर बहस की जा रही है. लेकिन वास्तव में यह बहस नेहरू और पटेल से पीछे जाकर महात्मा गांधी की समझदारी से जुड़ती है. भारत जब विभाजन और दंगों के त्रासद दौर से गुजर रहा था, उसी समय सोमनाथ मंदिर के जीर्णोद्धार का मसला सामने लाया गया. मानवीय त्रासदियों के दौर में भी लोग प्रतीकों की राजनीति में कैसे फंसते-फंसाते हैं, सोमनाथ मंदिर इसका एक उदाहरण है.

बहरहाल, 1947 में सांवलदास गांधी के नेतृत्व में जूनागढ़ में एक अस्थायी सरकार बनी थी और उसने सोमनाथ मंदिर के जीर्णोद्धार के लिए 50 हज़ार रुपये देने का फैसला किया था. इसी तरह जामनगर ने एक लाख रुपये देने का वादा किया था. किसी ने महात्मा गांधी को ये सारी बातें पत्र में लिखकर भेजीं. जाहिर है यह हलचल ऐसे वक्त में शुरू की गई थी जब हिंदूवादी संगठनों और मुस्लिमवादी संगठनों के बीच राजनीतिक घमासान मचा हुआ था और कौमी एकता के दुश्मन ऐसी किसी भी कार्रवाई का राजनीतिक फायदा उठा सकते थे. इसका फायदा सीधे-सीधे उन लोगों को मिल सकता था जो भारत को केवल हिंदुओं के देश के रूप में प्रस्तुत करने का प्रयास कर रहे थे या द्विराष्ट्र सिद्धांत के समर्थक थे.

गांधी को यह बात समझते देर नहीं लगी. इस पत्र का हवाला देते हुए, 28 नवंबर, 1947 को उन्होंने कहा, ‘सरदारजी आज जब मेरे पास यहां आए, तो मैंने उनसे पूछा कि सरदार होकर क्या तुम वहां ऐसी हुकूमत बनाओगे जो हिंदू धर्म के लिए अपने खजाने में से जितने चाहे पैसे निकालकर दे दे. हुकूमत तो सब लोगों के लिए बनाई गई है. अंग्रेजी में तो उसके लिए ‘सेकुलर’ शब्द है, यानी वह कोई धार्मिक सरकार नहीं है, या ऐसा कहो कि वह किसी एक धर्म की सरकार नहीं है. तब वह यह तो कर नहीं सकती कि चलो हिंदुओं के लिए इतना पैसा निकालकर दे दें, सिखों के लिए इतना और मुसलमानों के लिए इतना. हमारे पास तो एक ही चीज है और वह यह कि सबलोग हिंदी हैं. धर्म तो अलग-अलग व्यक्ति का अलग-अलग रह सकता है. मेरे पास मेरा धर्म है और आपके पास आपका.’

गांधी ने आगे कहा, ‘एक औऱ भाई ने लिखा है एक पर्चे में, और अच्छा लिखा है. वह कहते हैं कि अगर जूनागढ़ की हूकूमत सोमनाथ के जीर्णोद्धार के लिए पैसा देती है या यहां की मध्यवर्ती हुकूमत कुछ देती है, तो यह एक बड़ा अधर्म होगा. मैं मानता हूं कि उन्होंने बिल्कुल ठीक लिखा है. तब मैंने सरदारजी से पूछा कि क्या ऐसी ही बात है? उन्होंने कहा कि मेरे जिंदा रहते हुए यह बननेवाली बात नहीं है. सोमनाथ के जीर्णोद्धार के लिए जूनागढ़ की तिजोरी से एक कौड़ी नहीं जा सकती. जब मेरे हाथ से यह नहीं होगा तो सांवलदास बेचारा क्या करनेवाला है? सोमनाथ के लिए हिंदू काफी पड़े हैं जो पैसा दे सकते हैं. अगर वे कंजूस बन जाते हैं, और पैसा नहीं देते हैं तो वह ऐसे ही पड़ा रहेगा. डेढ़ लाख तो हो गया है और जाम साहब ने उसके लिए एक लाख रुपया दे दिया है. रुपये का इंतजाम तो हो जाएगा.’

12 दिसंबर, 1947 को फिर से महात्मा गांधी ने प्रार्थना सभा में यही बात दोहराते हुए कहा, ‘सरदार ने कहा है कि इस मंदिर का जीर्णोद्धार किया जाए, लेकिन उन्होंने यह कह दिया है कि जूनागढ़ की तिजोरी या यहां की हुकूमत की तिजोरी से पैसा नहीं निकलेगा. मैं कहता हूं कि यह ठीक है. लेकिन लोग कहते हैं कि क्यों न निकले, मैं इसके बारे में ज्यादा कहना नहीं चाहता. लेकिन इतना तो कहूंगा कि अगर इसके वास्ते पैसा निकले, तो सबके लिए पैसा निकले. तो यह बड़ी बात हो जाएगी.’

ध्यान रहे कि भारतीय मुसलमानों के बीच भी ऐसे तत्व बैठे थे जो इस मुद्दे का सांप्रदायिक फायदा उठाने की कोशिश कर रहे थे. उन्हीं में से किसी ने एक प्रमुख उर्दू पत्रिका में सोमनाथ के मुद्दे पर सांप्रदायिक भावना भड़कानेवाला एक शेर लिखा. 25 दिसंबर, 1947 को महात्मा गांधी ने दो-टूक शब्दों में उसकी निंदा करते हुए कहा- ‘एक उर्दू मैगजीन में मैंने एक शेर देखा. वह मुझे चुभा. उसमें कहा है- “आज तो सबकी जबान पर सोमनाथ है. जूनागढ़ वगैरह का बदला लेने के लिए गजनी से किसी नए गजनवी को आना होगा.” यह बहुत बुरा है. यूनियन के किसी मुसलमान की कलम से यह ऐसी चीज नहीं निकलनी चाहिए. एक तरफ से मित्रभाव और वफादारी की बातें और दूसरी तरफ से यह. मैं तो यहां यूनियन के मुसलमानों की हिफाजत के लिए जीवन की बाजी लगाकर बैठा हूं. मैं तो यही करूंगा, क्योंकि मुझे बुराई का बदला भलाई से देना है. आज लोगों को यह सुनाया जाए कि ताकि आप ऐसी चीजों से बहक न जाएं.‘

गांधी ने आगे कहा, ‘गजनवी ने जो किया था बहुत बुरा किया था. इस्लाम में जो बुराइयां हुई हैं, उन्हें मुसलमानों को समझना और कबूल करना चाहिए. कश्मीर, पटियाला वगैरह के हिन्दू-सिख राजाओं को उनके यहां जो बुराई हुई हो उसे कबूल कर लेना चाहिए. यूनियन में बैठकर मुसलमान अगर अपने लड़ाकों को सिखाएं कि गजनवी को आना है, तो उसका मतलब यह हुआ कि हिंदुस्तान को और हिंदुओं को खा जाओ. इसे कोई बर्दाश्त करनेवाला नहीं. दोनों आपस में मिलकर चाहे कुछ भी कर लें. अगर यह शरारत भरा शेर किसी महत्वपूर्ण मैगजीन में न छपा होता, तो मैं उसका जिक्र भी न करता.’

यह शेर अलीगढ़ मुस्लिम विश्वविद्यालय से प्रकाशित ‘अलीगढ़ उर्दू मैगजीन’ में छपा था. इसका शीर्षक था ‘महमूद गजनवी’. जब वहां के कुलपति नवाब मुहम्मद इस्माइल खां का ध्यान इस ओर दिलाया गया, तो उन्होंने इस भूल के लिए क्षमा-याचना पत्र भेजा था.

यह उस दौर की कहानी है जब भारत के हिंदू-मुसलमान एक साथ मिलकर एक नए बहुलतावादी और सेकुलर राष्ट्र की नींव रख रहे थे. और गांधी जैसे निडर और सत्यवादी लोग बिना किसी हिचक के दोनों तरफ के सांप्रदायिक लोगों को दो-टूक शब्दों में कौमी एकता का सलीका सिखा रहे थे. आज के दौर में वे होते तो देखते कि आज खुद भारत की सरकारें और राजनीतिक दल जोड़ने की बजाए तोड़ने की तुच्छ और प्रतीकात्मक राजनीति करने में ज्यादा दिलचस्पी ले रही हैं. और मुद्दा वही घिसा-पिटा मंदिर-मस्जिद और यात्रा-हज, गुरुद्वारा और चर्च.