प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी गुजरात विधानसभा चुनाव में भाजपा के सबसे बड़े स्टार प्रचारक हैं. वे जमकर रैलियां कर रहे हैं और इन रैलियों में अपने भाषणों के दौरान वे नेहरू-गांधी परिवार पर ज़बरदस्त हमले कर रहे हैं. इसी सिलसिले में वे बुधवार को मोरबी में थे. वहां एक रैली को संबोधित करते हुए उन्होंने राहुल गांधी और उनकी दादी व पूर्व प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी को निशाने पर लिया. 38 साल पहले मोरबी में मच्छू बांध के टूटने की बेहद दुर्भाग्यपूर्ण घटना का ज़िक्र करते हुए प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने कहा कि जब इंदिरा गांधी मोरबी के हालात देखने आई थीं तो उस समय उन्होंने नाक पर रूमाल रखा हुआ था. प्रधानमंत्री ने कहा कि वे उस समय मोरबी में थे और बचाव कार्य में मदद कर रहे थे.

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क्या हुआ था?
11 अगस्त, 1979 को मोरबी स्थित मच्छू बांध टूट गया था. बताया जाता है कि कुछ ही मिनटों में पूरा शहर पानी में डूब गया था. एक हज़ार से ज़्यादा लोग मारे गए. संपत्तियों का भारी नुक़सान हुआ. जानवरों की भी बड़ी संख्या में मौत हुई थी. गुजरात और मोरबी के लिए यह भारी संकट का समय था.

16 अगस्त, 1979 को तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी मोरबी आई थीं. उनके इस दौरे की एक तस्वीर चित्रलेखा नाम की गुजराती पत्रिका के 27 अगस्त, 1979 के अंक के कवर पेज पर छपी थी. पेज पर दो तस्वीरें थीं. ऊपर की तस्वीर में इंदिरा गांधी थीं और नीचे की तस्वीर में एक रेहड़ी पर रखे शव के साथ कुछ लोग दिखाए गए थे.

चित्रलेखा पत्रिका
चित्रलेखा पत्रिका

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने अपने भाषण में इंदिरा गांधी की इसी तस्वीर का ज़िक्र किया था. प्रतिद्वंद्वी पार्टी की एक बहुत बड़ी नेता के बारे में उन्होंने जो कहा उससे संदेश गया कि एक तरफ़ राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (आरएसएस) के लोग मच्छू बांध टूटने के बाद मोरबी में बदतर हो चुके हालात को संभालने में लगे हुए थे, और दूसरी तरफ़ देश की प्रधानमंत्री और कांग्रेस की सबसे बड़ी नेता मुंह ढक कर सहानुभूति दिखाने आई थीं.

मच्छू बांध के टूटने से जुड़ी जानकारी मिलने के बाद प्रधानमंत्री मोदी की ‘रूमाल’ वाली बात ग़ैर-ज़रूरी लगती है. सवाल है कि क्या राहत कार्य में लगे संघ के सदस्य और अन्य लोग मुंह ढके बिना ही कार्य कर रहे थे. चित्रलेखा पत्रिका की दूसरी तस्वीर में शव के साथ जो लोग दिख रहे हैं उन सभी ने नाक पर कपड़ा रखा हुआ है. कुछ मीडिया रिपोर्टों में इन्हें संघ के लोग बताया गया है.

इंडिया टुडे पत्रिका की 15 सितंबर, 1979 को प्रकाशित हुई एक रिपोर्ट से पता चल जाता है कि बचाव कार्य में लगे लोग और इंदिरा गांधी ने मुंह क्यों ढका हुआ था. रिपोर्ट में लिखा है, ‘विनाशकारी बाढ़ आने के एक हफ़्ते बाद से भी ज़्यादा समय तक मोरबी एक भुतहा शहर की तरह दिखता था. टूटी गलियों में मलबों के ढेर थे. शवों को मलबों के नीचे से घसीट कर निकाला जा रहा था ताकि उन्हें शहर के बाहर निपटाया जा सके...जानवरों के फूल चुके शव और इंसानों के अंग ट्रकों में फेंके जा रहे थे. 11 अगस्त को आई बाढ़ के आठ दिन बाद भी शहर में सड़े मांस की बदबू फैली हुई थी.’

रिपोर्ट पढ़ने के बाद अंदाज़ा हो जाता है कि उस समय मोरबी में मौजूद ज़िंदा लोग मुंह ढक कर ही रह पा रहे होंगे. ऐसे माहौल में सामान्य तरीक़े से नहीं रहा जा सकता. रिपोर्ट में तत्कालीन राज्य सरकार, प्रशासन और नेताओं के रवैये की ख़ासी आलोचना की गई है. यह भी बताया गया है कि कैसे इंदिरा गांधी के मोरबी पहुंचने पर वहां चल रहा राहत कार्य आठ घंटे तक रुका रहा. लेकिन कहीं भी इस बात का ज़िक्र नहीं है कि वे नाक पर रूमाल रख कर मोरबी का हाल देखने आई थीं. यह कोई अनोखी बात भी नहीं है क्योंकि जिस तरह के हालात वहां थे उनमें दुर्गंध के साथ-साथ महामारियां फैलने का भी ख़तरा था. ऐसे में नाक पर कपड़ा रखने की वजह बहुत स्पष्ट और नाक़ाबिल-ए-ऐतराज़ दिखती है.