दुनिया के लगभग हर खेल में कभी न कभी यह वक्त आता है जब उसके कई श्रेष्ठ खिलाड़ियों को लेकर महान और महानतम की बहस छिड़ जाती है. यह बहस फ़ुटबाल या क्रिकेट जैसे खेलों में ज्यादा देखने को मिलती है. पेले, माराडोना, सचिन और लारा जैसे कई समय-समय पर इस बहस के विषय रहे हैं. इसी तरह अब ऐसी ही एक बहस भारतीय ऑफ स्पिनर रविचंद्रन अश्विन को लेकर भी शुरू हो गई है. बीते सोमवार को श्रीलंका के खिलाफ नागपुर टेस्ट मैच में सबसे तेजी से 300 विकेट लेने की उपलब्धि हासिल करने के बाद भी अश्विन को कई क्रिकेट विशेषज्ञ न तो दुनिया के और न ही भारत के सर्वकालिक महानतम स्पिनरों की सूची में जगह दे रहे हैं.

रविचंद्रन अश्विन को लेकर इस बहस को समझने के लिए उन दिग्गजों के बारे में जानना जरूरी है जिन्हें भारत और दुनिया के सर्वकालिक महानतम स्पिनरों में शुमार किया जाता है. क्रिकेट खेलने वाले देशों में भारतीय स्पिनरों की चर्चा 1960 के दशक में होनी शुरू हुई थी. इस समय भारतीय स्पिन चौकड़ी जिसमें बिशन सिंह बेदी, ईरापल्ली प्रसन्ना, भगवत चंद्रशेखर और श्रीनिवास वेंकट राघवन शामिल थे, दुनिया भर के बल्लेबाजों के लिए पहेली बन गए थे. कहा जाता है कि उस समय भारत दौरे पर आने वाली टीमें महीनों पहले से इन पर होमवर्क करना शुरू कर दिया करती थीं. एक लेख में वरिष्ठ पत्रकार प्रभाष जोशी लिखते हैं, ‘आजाद भारत में यह स्पिन चौकड़ी किसी ब्रह्मास्त्र से कम नहीं थी...इन स्पिन गोलंदाजों का खौफ बिलकुल वैसा ही हुआ करता था जैसा वेस्टइंडीज के तेज आक्रमण का.’

इस चौकड़ी में सबसे ख़ास थे ‘सरदार ऑफ स्पिन’ के नाम से मशहूर बिशन सिंह बेदी. जानकारों की मानें तो उस समय बेदी भारतीय टीम के लिए उतने ही महत्वपूर्ण थे जितना ऑस्ट्रेलियाई टीम के लिए तेज गेंदबाज डेनिस लिली. इन चारों भारतीय स्पिनरों की एक बड़ी उपलब्धि यह भी है कि इन्हीं के समय में भारत ने विदेशी पिचों पर जीत का स्वाद चखना शुरू किया था. आंकड़ों से अलग ये अपने खूबसूरत गेंदबाजी एक्शन और बेजोड़ तकनीक को लेकर भी खासे चर्चा में रहते थे.

इसकी अगली पीढ़ी में स्पिन गेंदबाजी की जिम्मेदारी अनिल कुंबले और हरभजन सिंह के हाथों में आई. महानतम लेग स्पिनर माने जाने वाले अनिल कुंबले की सबसे ख़ास बात उनका साधारण बॉलिंग एक्शन और ज्यादातर मौकों पर गेंद को बिना ज्यादा टर्न कराए विकेट लेना माना जाता है. ऐसी क्षमताओं में भी कुंबले का 619 विकेट हासिल कर लेना किसी बड़ी उपलब्धि से कम नहीं है. हालांकि, कुंबले ने अधिकांश मैच अपनी गेंदबाजी के दम पर जितवाए लेकिन उन्हें उतनी सराहना नहीं मिली जितनी मिलनी चाहिए थी. इसका एक कारण उनके समय में कई दिग्गज बल्लेबाजों का टीम में होना भी माना जाता है.

एक अंग्रेजी न्यूज़ वेबसाइट से जुड़े खेल पत्रकार प्रवीण सुदेवन कहते हैं कि इसके बावजूद अनिल कुंबले के करियर में कई ऐसी असाधारण घटनाएं हैं जिन्हें कोई भुलाए नहीं भूल सकता. 2002 में सेंट जोंस टेस्ट में जब कुंबले ने टूटे हुए जबड़े के साथ ब्रायन लारा जैसे दिग्गज खिलाड़ी का विकेट लिया तो वह पल मानो कह रहा हो कि किसी भी परिस्थिति में उन पर विश्वास किया जा सकता है. इसके अलावा पाकिस्तान के खिलाफ फिरोज शाह कोटला में एक पारी में दस विकेट लेना किसी बहुत बड़े आश्चर्य से कम नहीं था.

अगर हरभजन सिंह की बात करें तो उन्होंने भी अपने प्रदर्शन से जो छाप लोगों के दिमाग पर छोड़ी, वह अमिट है. उदाहरण के तौर पर 2001 में कोलकाता टेस्ट में ऑस्ट्रेलिया के खिलाफ ली गई उनकी हैट्रिक क्रिकेट का एक अविस्मरणीय अध्याय है. इसके अलावा उसी सीरीज में मैथ्यू हेडन, जस्टिन लेंगर, एडम गिलक्रिस्ट और रिकी पोंटिंग जैसी दिग्गजों वाली टीम के खिलाफ 32 विकेट लेना भी एक अदभुत कारनामा ही था. एक दौर ऐसा भी था जब टर्बनेटर के नाम से मशहूर इस खिलाड़ी ने दुनिया की हर पिच पर अपनी गेंदबाजी से बल्लेबाजों को परेशान किया था. तब उन्हें लेकर यह भविष्यवाणी कई बार की गई कि वे महान मुथैया मुरलीधरन के करीब तक पहुंचने की क्षमता रखते हैं.

भारत के इन सभी स्पिनरों की अगर उनके समकक्षों से तुलना करें तो ये आंकड़ों में कइयों से पीछे भी नजर आते हैं. लेकिन, इसके बावजूद इन सभी को महानतम की श्रेणी में शुमार किया जाता है. साफ़ है कि इसके पीछे की वजह इनके द्वारा जुटाए गए आंकड़े ही नहीं बल्कि वे कारनामे भी हैं जिन्होंने भारतीय क्रिकेट को न सिर्फ एक नई दिशा दी, बल्कि दुनियाभर में भारत का लोहा भी मनवाया. अगर अंतरराष्ट्रीय स्तर पर देखें तो ऐसा ही कुछ काम पाकिस्तानी गेंदबाजों अब्दुल कादिर और सकलैन मुश्ताक, इंग्लैंड के जिम लेकर, ऑस्ट्रेलिया के शेन वार्न और श्रीलंका के मुथैया मुरलीधरन ने किए हैं.

अश्विन की खूबी

अब तक अपने छोटे से करियर में रविचंद्रन अश्विन ने जो उपलब्धियां हासिल की हैं वे दुनिया के कई महानतम गेंदबाज भी हासिल नहीं कर पाए. अश्विन सबसे तेजी से 50 टेस्ट विकेट लेने वालों में चौथे, 100 विकेट लेने वालों में तीसरे और सबसे तेज 200 टेस्ट विकेट लेने वाले दुनिया के दूसरे गेंदबाज हैं. हाल ही में उन्होंने सबसे तेज 300 विकेट लेकर इस मामले में सभी को पीछे छोड़ दिया.

भारत के महान बल्लेबाज सचिन तेंदुलकर एक साक्षात्कार में कहते हैं, ‘पिछले कुछ सालों में आपने देखा होगा कि अश्विन अब वैसा नहीं है जैसा वह शुरुआत में था, उसने अपनी गेंदबाजी में लगातार प्रयोग किए हैं और गेंदबाजी का स्तर उठाया है, अब वह एक कम्पलीट गेंदबाज जैसा दिखता है.’ तेंदुलकर की यह बात सही भी नजर आती है, अपने प्रयोगों के दम पर ही आज अश्विन की गेंदबाजी में जितने वेरिएशन नजर आते हैं, वे वर्तमान में किसी भी दूसरे गेंदबाज के पास नहीं हैं. आज अश्विन के तरकश में सामान्य ऑफ-ब्रेक के अलावा आर्म बॉल, कैरम बॉल, लेग-ब्रेक, गुगली और दूसरा जैसे हथियार भी हैं.

कई अन्य विशेषज्ञ भी मानते हैं कि अश्विन अगर परिपक्व होते जा रहे हैं, तो उसका सबसे बड़ा कारण यह है कि वे खुद अपनी गलतियों को पकड़ते हैं, उन पर काम करते हैं और उनमें सुधार करते हैं. ये लोग कहते हैं कि अश्विन की इसी सोच का नतीजा है कि उन्होंने पिछले दो सालों में कई जरूरी बदलाव करने में सफलता पाई है. इनमें 2015 में अपने एक्शन में किया गया बदलाव भी एक है.

रविचंद्रन अश्विन के सबसे तेजी से 300 विकेट लेने के पीछे की एक वजह यह भी है कि वे किसी भी सीरीज को हल्के में नहीं लेते. उनके कुछ करीबियों की मानें तो 32 वर्षीय यह गेंदबाज हर सीरीज से पहले परिस्थितियों, विपक्षी बल्लेबाजों और खुद की क्षमताओं की अच्छे से समीक्षा करता है और इसके बाद ही अपनी रणनीति तैयार करता है.

अश्विन अभी महानतम की श्रेणी में शामिल क्यों नहीं हो सकते ?

अश्विन का भारत में रिकॉर्ड बेहतरीन है जिसकी गवाही उनके आंकड़े देते ही हैं. उन्होंने अब तक देश में खेले गए 34 टेस्ट मैचों में 22.47 के औसत से कुल 216 विकेट हासिल किए हैं. इनमें उन्होंने 20 बार पांच विकेट भी लिए हैं. लेकिन, अगर विदेशी सरजमीं की बात करें तो उनके आंकड़े वैसे नहीं हैं जैसे भारत में दिखते हैं. विदेशी धरती पर उन्होंने 20 मैच खेले हैं जिनमें उन्हें 31.75 के औसत से केवल 84 विकेट ही मिले हैं. इसमें भी कुछ देशों के खिलाफ उनका प्रदर्शन काफी निराश करने वाला है, जैसे- इंग्लैंड में उन्होंने दो टेस्ट मैचों में केवल तीन विकेट ही हासिल किए, इसी तरह दक्षिण अफ्रीका में खेले गए एक टेस्ट मैच में उन्हें कोई विकेट नहीं मिला.

अश्विन को सर्वकालिक महान क्रिकेटरों की श्रेणी में शामिल न करने वाले दो बातें कहते हैं. इनके मुताबिक अश्विन के साथ अभी तक कोई भी चमत्कारिक या यादगार घटना नहीं जुड़ी है. साथ ही वे अब तक विदेश में भी कुछ हद तक वैसे आंकड़े जुटाने में सफल नहीं हुए हैं जैसे उन्होंने स्वदेश में जुटाए हैं. यही दो कारण हैं जिनके चलते अभी उन्हें सर्वकालिक महान स्पिनरों में शुमार नहीं किया जा रहा है.

पिछले दिनों जब मुथैया मुरलीधरन ने अश्विन को 300 विकेट लेने की बधाई दी थी. तब उन्होंने यह भी कहा था कि अगर यह गेंदबाज केवल टेस्ट क्रिकेट पर ही फोकस करे और चोटों से दूर रहे तो कम से कम चार से पांच साल आराम से खेल सकेगा. ऐसे में अश्विन अपने आंकड़ों को नए शिखर पर पहुंचा सकते हैं. उनमें जिस तरह अपनी गलतियों से सीखने और प्रयोग करने की प्रवत्ति है उसे देखते हुए कई विश्लेषक यह भी मानते हैं कि वे अगले पांच साल में न केवल विदेशी धरती पर अपना रिकॉर्ड बेहतर करेंगे, बल्कि कई अविस्मरणीय कारनामों को भी अंजाम देने में सफल होंगे. और निश्चित ही तब ही सर्वकालिक महानतम होने को लेकर चल रही बहस का अंत भी उनके पक्ष में होगा.