बीती 26 नवंबर को देश ने मुंबई हमले की नौवीं बरसी मनाई. 2008 में हुए इस हमले को याद कर न सिर्फ़ भारत बल्कि दुनियाभर के लोग आज भी भावुक हो जाते हैं क्योंकि इसमें कई विदेशी नागरिक भी मारे गए थे. मुंबई समेत पूरे देश के लिए वह बहुत कठिन समय था. यह बताए जाने के बाद कि इस हमले में पाकिस्तान का हाथ है, लोग बस बदला चाहते थे. तत्कालीन मनमोहन सिंह सरकार ज़बरदस्त दबाव में थी. हालांकि उसने किसी भी सैन्य विकल्प का चुनाव नहीं किया.

इसी को लेकर बीती 27 नवंबर को एक अंग्रेज़ी चैनल से बात करते हुए पूर्व एयरचीफ़ मार्शल फ़ली होमी मेजर का कहना था कि 26/11 हमले के दो दिन बाद मनमोहन सिंह सरकार ने तीनों सेनाओं के प्रमुखों से बात की थी. इस मुलाक़ात का एजेंडा यह तय करना था कि मुंबई हमलों के बाद पाकिस्तान को किस तरह जवाब दिया जाए. चैनल से बात करते हुए फ़ली होमी मेजर ने कहा कि भारतीय वायु सेना किसी भी हमले के लिए तैयार थी, लेकिन इसे लेकर कुछ हुआ नहीं.

पूर्व एयरचीफ़ मार्शल ने पूरी सावधानी से अपनी बात कही, लेकिन सोशल मीडिया पर उनकी बात को इस तरह प्रचारित किया गया है जिससे संदेश यह जा रहा है कि यूपीए सरकार चाहती ही नहीं थी कि मुंबई हमलों का सैन्य कार्रवाई से जवाब दिया जाए. यह कितना सही है, यह जानने के लिए उस समय के घटनाक्रम, घरेलू और अंतरराष्ट्रीय परिस्थितियों और ऐसी किसी कार्रवाई के संभावित प्रभावों को समझना ज़रूरी है.

त्रिशूल/फ़ेसबुक
त्रिशूल/फ़ेसबुक

मुंबई हमलों के बाद पूर्व विदेश सचिव और राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार शिवशंकर मेनन पाकिस्तान पर तुरंत हमला करने के पक्ष में थे. लेकिन सरकार में शीर्ष स्तर पर हुई बातचीत और जांच-पड़ताल के बाद उन्होंने माना कि पाकिस्तान स्थित आतंकी कैंपों पर हमला करना उचित क़दम नहीं होता. उन्होंने दूसरे विकल्पों का चुनाव करना बेहतर माना. अपनी किताब ‘चॉइसेज़ : इनसाइनड द मेकिंग ऑफ़ इंडियाज़ फ़ॉरेन पॉलिसी’ में उन्होंने इस विषय पर चर्चा की है. किताब में मेनन लिखते हैं कि मुंबई हमले के बाद पाकिस्तान पर हमला करने के बजाय भारत दूसरे तरीक़ों से जवाब देकर बदला ले सकता था.

मुंबई हमलों में पाकिस्तान के शामिल होने की बात भारत शुरू से कहता रहा है. शिवशंकर मेनन लिखते हैं कि अगर भारत पाकिस्तान पर हमला कर देता तो आतंकी हमले में पाकिस्तान की आधिकारिक भूमिका वाला पक्ष छिप जाता. किताब में एक जगह उन्होंने लिखा है, ‘जहां तक दुनिया की बात है (पाकिस्तान पर हमला करने की वजह से), उसके लिए यह (मुंबई हमला) भारत-पाकिस्तान के झगड़े का बस एक और मामला बनकर रह जाता.’ मेनन बताते हैं कि मुंबई हमलों के बाद यह साफ़ था कि इसके पीछे पाकिस्तानी सेना का हाथ है, लेकिन संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद (यूएनएससी) ने राजनीति करते हुए हमलावर (पाकिस्तान) और पीड़ित (भारत) से एक जैसा व्यवहार किया और युद्धविराम की बात थोप दी.

शिवशंकर मेनन के मुताबिक़ भारत और पाकिस्तान की दुश्मनी को लेकर अन्य देशों की प्रतिक्रिया हमेशा शांति रखने और दोनों देशों को ज़िम्मेदार बताने की रही है. वे लिखते हैं, ‘पाकिस्तान यही चाहता था. हमले के दौरान उसकी पहली प्रतिक्रिया यही थी कि वह भारत को युद्ध करने से रोकने के लिए अमेरिका और ब्रिटेन से चर्चा करेगा.’

किताब में शिवशंकर मेनन ने यह दलील भी दी है कि भारत के हमला करने की सूरत में पूरा पाकिस्तान एक होकर अपनी सेना के पीछे खड़ा हो जाता जो उस समय घरेलू विवादों और भारत को लेकर अपनी नीति के लिए पहले से बदनामी का सामना कर रही थी. उस समय पाकिस्तान में आसिफ़ अली ज़रदारी के नेतृत्व वाली सरकार थी जो बेमन से केवल चुने हुए आतंकी समूहों पर कार्रवाई कर रही थी. सरकार से हुई बातचीत के बाद शिवशंकर मेनन का मानना था कि अगर भारत पाकिस्तान पर हमला कर देता तो तत्कालीन पाकिस्तानी सरकार कमज़ोर हो जाती. वह जनता द्वारा चुनी गई सरकार थी जिसके भारत से संबंध पाकिस्तानी सेना की अपेक्षा थोड़े बेहतर थे. मेनन के मुताबिक़ पाकिस्तानी सेना चाहती थी कि भारत हमला करे ताकि वह अपनी घरेलू स्थिति मज़बूत कर सके जो जनरल परवेज़ मुशर्रफ़ के जाने के बाद कमज़ोर हो गई थी.

वहीं, आतंकी संगठन लश्कर-ए-तैयबा के चुनिंदा ठिकानों को निशाना बनाए जाने को लेकर शिवशंकर मेनन लिखते हैं कि पाकिस्तान के क़ब्ज़े वाले कश्मीर में लश्कर के कैंपों पर हमला करने की उपयोगिता सीमित होती और इसका आतंकी संगठन पर कोई ख़ास प्रभाव नहीं पड़ता. इसके लिए वे अमेरिका का उदाहरण देते हैं. अमेरिका ने केन्या और तंज़ानिया स्थित अपने दूतावासों पर हमला होने के बाद अगस्त 1998 में आतंकी संगठन अल-क़ायदा पर कई मिसाइल हमले किए थे, लेकिन उसकी इस कार्रवाई से कोई ख़ास फ़र्क़ नहीं पड़ा. मेनन की यह बात महत्वपूर्ण है क्योंकि पिछले साल उड़ी हमले के बाद सेना द्वारा सर्जिकल स्ट्राइक किए जाने से भी उसके कैंपों पर होने वाले आतंकी हमलों में कोई ख़ास कमी देखने को नहीं मिली है.

शिवशंकर मेनन की यह बात भी महत्वपूर्ण है कि लश्कर ने अपने कैंप स्कूलों और अस्पतालों के नज़दीक लगाए थे. वहीं, फ़ली होमी मेजर का कहना है कि इन कैंपों की लोकेशन जल्दी-जल्दी बदलती रहती है. उनके मुताबिक़ भारतीय वायु सेना के हमलों में नागरिकों को ख़ासा नुक़सान हो सकता था. शिवशंकर मेनन अपनी किताब में लिखते हैं, ‘अगर भारत की कार्रवाई से कोई नागरिक हताहत नहीं भी होता, तब भी आईएसआई यह आरोप लगा ही देती.’ मेनन के मुताबिक ऐसे सीमित हमले के चलते लश्कर को मिलने वाले आधिकारिक और सामाजिक समर्थन में कमी नहीं आती. इसके अलावा सीधे युद्ध करना भी भारतीय अर्थव्यवस्था के लिहाज़ से सही क़दम नहीं होता. इसमें काफ़ी ख़र्च आता और देश की अर्थव्यवस्था के विकास में बाधा आती.

शिवशंकर मेनन ने पाकिस्तान पर हमला नहीं करने के कारणों के अलावा यह भी बताया है कि ऐसा न करके भारत को क्या मिला. उन्होंने बताया कि भारत के हमला नहीं करने से अंतरराष्ट्रीय समुदाय मुंबई हमलों की अनदेखी नहीं कर सका. यूएनएससी ने लश्कर-ए-तैयबा के उन वरिष्ठ सदस्यों को आतंकियों की लिस्ट में शामिल किया जो मुंबई हमलों में शामिल थे. मेनन के मुताबिक़ पाकिस्तान को अलग-थलग करते हुए अंतरराष्ट्रीय समुदाय को संगठित करना भारत की बड़ी सफलता रही जो युद्ध या सर्जिकल स्ट्राइक की स्थिति में संभव नहीं होता. सऊदी अरब और खाड़ी देशों से भारत को अभूतपूर्व सहयोग मिला. चीन ने भी आतंकी समूहों से जुड़ीं जानकारियों को लेकर प्रतिक्रिया देना शुरू किया.

शिवशंकर मेनन ने मुंबई हमलों के बाद तत्कालीन यूपीए सरकार के हमला नहीं करने के रुख़ को सही बताने के लिए राजनीतिक कारण भी दिए हैं. उनके मुताबिक मुंबई हमलों ने भारत को एक कर दिया था. अपनी किताब में उन्होंने लिखा है, ‘यह समझते हुए राजनीतिक दलों ने आतंकी हमले और उस पर भारत सरकार की प्रतिक्रिया को कुछ ही महीनों बाद होने वाले आम चुनावों के लिए मुद्दा नहीं बनाया.’

शिवशंकर मेनन ने किताब में जो भी कहा उसके अलावा और भी तथ्य हैं जो इशारा करते हैं कि तत्कालीन सरकार के लिए कोई हवाई हमला करना, सर्जिकल स्ट्राइक या अन्य प्रकार का अभियान चलाना संभव नहीं था. छह मार्च, 2015 को टेलीग्राफ़ में एक रिपोर्ट छपी थी. इसमें बताया गया कि पूर्व प्रधानमंत्री इंद्र कुमार गुजराल की सरकार ने एक नीति के जरिये भारत की ख़ुफ़िया एजेंसी रिसर्च एंड अनालिसिस विंग (रॉ) के पाकिस्तान में चल रहे अभियानों को रोक दिया था. इसका नतीजा यह हुआ कि पाकिस्तानी क्षेत्र में किसी गुप्त हमले को अंजाम देने की भारत की क्षमता ख़त्म हो गई.

इस बात को हफ़िंग्टन पोस्ट की एक रिपोर्ट से जोड़कर भी देखा जा सकता है. इस रिपोर्ट में बताया गया है कि मुंबई हमले के बाद मनमोहन सिंह हवाई हमले को लेकर विचार कर रहे थे, लेकिन उस समय एयरचीफ़ मार्शल ने ही कहा था कि भारत के पास पाकिस्तान के आतंकी कैंपों को लेकर सटीक डिजिटल डेटा नहीं है. वहीं, सेनाध्यक्ष ने कहा कि भारतीय सेना किसी छोटे हमले (सर्जिकल स्ट्राइक) के लिए तैयार नहीं है.

इन तथ्यों को फ़ली होमी के हालिया बयान से जोड़ने पर अंदाज़ा होता है कि सरकार के लिए हमला करने का फ़ैसला आसान नहीं था. पूर्व एयरचीफ़ मार्शल ख़ुद ने कहा है कि बिना सही ख़ुफ़िया जानकारी के ग़लत जगहें निशाना बन सकती थीं. उन्होंने यह भी कहा कि अगर कोई अभियान चलाया जाता तो उसमें सेना का सहयोग महत्वपूर्ण होता जबकि सेनाध्यक्ष ने कहा कि सेना तैयार नहीं थी.

इन तमाम जानकारियों से संकेत मिलता है कि 26/11 हमले के बाद बदले की कार्रवाई को लेकर सरकार में ज़बरदस्त उथल-पुथल थी. कई विकल्पों पर विचार किया गया था और बाद में सैन्य हमले के विकल्प को नहीं चुना गया जिसे सरकार में मौजूद ग़ैर-राजनीतिक लोगों के अलावा अन्य विशेषज्ञों ने भी सही ठहराया था.