‘जब देश की बात आती है, तब न सोचा जाता है और न समझा जाता है.’ अगर यह लाइन प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने कही होती तो इस पर ज्यादातर लोगों की प्रतिक्रिया इस सलाह के साथ आती कि जब देश की बात आती है तब ही सबसे ज्यादा सोचने-समझने की जरूरत होती है. लेकिन शुक्र है कि प्रधानमंत्री ने ऐसा कोई बयान नहीं दिया है. यह एक फिल्म का संवाद है जिसमें नरेंद्र मोदी की तरह दिखने वाला एक किरदार यह बात कहता नजर आता है.

‘मोदी का गांव’ शीर्षक से बनी यह फिल्म प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की कार्यशैली पर आधारित है. इसका निर्देशन तुषार अमरीश गोयल ने किया है. फिल्म की दूसरी खास बात है कि इस फिल्म के लेखक और निर्माता सीए सुरेश झा भारतीय जनता पार्टी के सदस्य भी हैं. उनकी यह फिल्म मोदी सरकार के कई चर्चित फैसलों और प्रयासों जैसे – नोटबंदी, सर्जिकल स्ट्राइक, डिजिटल इंडिया और स्वच्छ भारत अभियान को दिखाती है. इन सबके बावजूद फिल्मकार का दावा है कि यह फिल्म काल्पनिक कथा पर आधारित है और वास्तविक लोगों और घटनाओं से केवल प्रेरणा ली गई है!

टीजर देखकर फिल्म की कहानी का अंदाजा कुछ यूं लगता है कि किसी किरदार नागेंद्र जी, जो नरेंद्र मोदी से मिलता-जुलता दिखता है, की सरकार आने के बाद से क्षेत्रीय नेता कुछ परेशानी में हैं. उनकी परेशानी की वजह यह है कि वह पहले की तरह भ्रष्टाचार या मनमानी नहीं कर पा रहे हैं. संभवतः फिल्म यही दिखाने जा रही है कि फिल्म के नायक यानी प्रधानमंत्री नेताओं के इस रवैये से कैसे निपटते हैं. कुछ और दृश्यों में गांवों में बदहाली और अपराध की परिस्थितियां दिखाई देती हैं. इनका कहानी से क्या संबंध है, इसका पता नहीं चलता. मोदीनुमा किरदार नागेंद्र की भूमिका अभिनेता विकास महंते ने निभाई है जो इसके पहले फराह खान की फिल्म हैप्पी न्यू इयर में मोदी के ही कैमियो रोल में नजर आ चुके हैं.

अपने आइडिया और पटकथा से प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और भाजपा के लिए पूरी तरह उपयुक्त होने के बावजूद यह फिल्म करीब दस महीने तक सेंसर बोर्ड में लटकी रही. पिछले हफ्ते इसे सेंसर बोर्ड सर्टिफिकेट हासिल हुआ है और इस वक्त फिल्म के चर्चा में आने की वजह भी यही है. ‘मोदी का गांव’ अाठ दिसंबर को रिलीज होने जा रही है. यहां पर इस बात का भी जिक्र करना जरूरी है कि गुजरात में नौ और 14 दिसंबर को विधानसभा चुनाव होने हैं.

इस फिल्म की रिलीज से जुड़ी एक दिलचस्प बात यह है कि इसके निर्माता सुरेश झा सेंसर बोर्ड के पूर्व अध्यक्ष पहलाज निहलानी से अब तक बेहद खफा हैं. एक अखबार से बातचीत के दौरान वे निहलानी के रवैये पर हैरानी जताते हुए कहते हैं कि ‘भाजपा सरकार द्वारा नियुक्त सेंसर बोर्ड अध्यक्ष मोदी पर बनी फिल्म को लेकर इतना नकारात्मक रवैया कैसे अपना सकते हैं.’ हालांकि फिल्म को सर्टिफिकेट निहलानी के जाने के लंबे समय बाद दिया गया है इसलिए स्पष्ट तौर फिल्म के अटकने के कारणों के बारे में कुछ कह पाना मुश्किल है. लेकिन इस पूरे घटनाक्रम से सेंसर बोर्ड की नीयत पर संशय जरूर होता है.

यहां एक सवाल उठता है कि क्या बोर्ड फिल्म को सर्टिफिकेट देने के लिए सही वक्त का इंतजार कर रहा था और उसके हिसाब से गुजरात विधानसभा चुनावों का समय इस फिल्म के लिए सबसे सही समय था! अगर ऐसा है तो सेंसर बोर्ड द्वारा पेश यह उदाहरण अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता को बाधित करने का ही नहीं, अनैतिक तरीके से जनमत को प्रभावित करने का उदाहरण भी कहलाएगा.

चलते-चलते, चुटकी लेते हुए यह भी कहा जा सकता है कि भाजपा या भाजपा समर्थक मौका पड़ने पर अपने-पराए का भेद छोड़कर सामने वाले का इस्तेमाल करना जानते हैं. अगर ऐसा नहीं होता तो भाजपा समर्थक सेंसर बोर्ड अध्यक्ष, भाजपा सदस्य फिल्म निर्माता की फिल्म इतने लंबे वक्त के लिए भला क्यों अटकाता!

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