चार खंडों में बंटी नवाजुद्दीन सिद्दीकी की आत्मकथा ‘एन ऑर्डिनरी लाइफ’ में 20 अध्याय हैं. लेकिन सिर्फ एक ऐसा है जिसकी वजह से यह किताब आप कभी पढ़ नहीं सकेंगे. मात्र साढ़े छह पेज लंबे ‘रिलेशनशिप्स’ शीर्षक वाले इस चैप्टर में नवाज ने अपने प्रेम-प्रसंगों का जिक्र किया है और नाम लेकर किया है. लेकिन जैसा कि सबको पता है कि यह हरकत दुनिया को गवारा नहीं हुई कि नवाज ने प्रेमिकाओं का नाम लिया और खुद को श्रेष्ठ दिखाने की ऐंठन में उनका चरित्र हनन तक किया. बात इतनी बढ़ गई कि 209 पन्नों की आत्मकथा में से लोगों को सिर्फ प्रेम-प्रसंग याद रहे और अब तक जिस अभिनेता से उन्होंने सिर्फ इसलिए प्रेम किया था, कि अंतहीन से लगते संघर्षों से पार पाकर उसने हमें अपने अभिनय से चमत्कृत कर दिया था, अब उसी नवाज के जीवन और जीवन-संघर्षों में किसी की रुचि नहीं रही.

इसलिए, अब जब विवाद ठंडा पड़ चुका है, किताब बाजार से वापस ली जा चुकी है, चलिए उस आत्मकथा को फिर टटोलते हैं जिसमें कुछ त्रुटियों के बावजूद काफी कुछ अनमोल था, लेकिन वक्त रहते जिसका मोल समझा नहीं गया.

भाग 1 - बचपन, बुढ़ाना और बेफिक्री

नवाज को चिलचिलाती धूप और गर्मी से बेहद चिढ़ है. बचपन उनका जिस उत्तर प्रदेश के बुढ़ाना गांव में बीता वहां उनके ही शब्दों में इतनी तेज गर्मी पड़ती थी कि जैसे ‘सूरज में आग लग गई हो’. इसलिए इस आत्मकथा में आप उनके कहे बगैर कई जगह महसूस करते हैं कि आज के सुविधा संपन्न सितारे को एयर कंडीशनिंग (एसी) से बहुत गहरा लगाव है!

खैर, किताब के पन्नों में अंत तक दर्ज है कि बुढ़ाना ने ही नवाज को गढ़ा और आज वे जितने काबिल हैं उसका ज्यादातर श्रेय इसी गांव में बीते बचपन और वहां मिले अनोखे किरदारों को जाता है. यह भी कि इसी गांव ने उनके अंदर कमियां भी भरीं और महिलाओं को बराबरी की इज्जत देना उन्होंने बहुत बाद में मुंबई में सीखा, तब जब उनके बेटी हुई. इससे पहले वाले नवाज को वे खुद गांव का गंवार कहते हैं (विलेज पम्प्किन) जिसे महिलाओं से बात करने की तमीज नहीं थी, झिझक थी और जिसके लिए महिलाओं के जीवन में होने का सीमित उद्देश्य होता था. किताब के जिन-जिन पन्नों पर नवाज अपनी इस तरह की कमियों और गलतियों को स्वीकारते हैं, आप उनकी बेबाकी और ईमानदारी के मुरीद हो जाते हैं. हमारे आसपास ही ऐसे लोगों की भरमार है जो पितृसत्तात्मक समाज के तंग रास्तों पर चलकर मुंबई-दिल्ली जैसे बड़े शहरों में आते हैं और अपनी मानसिकता में बदलाव ला पाते हैं. इसलिए नवाज की यह आत्मस्वीकृति स्वीकारी जानी चाहिए थी, न कि विवादों की भेंट चढ़ाकर एक ऐसे ट्रेंड में तब्दील कर दी जानी चाहिए थी जिसका अनुसरण कर गांव, कस्बों और छोटे शहरों से निकले युवक सफलता हासिल करने के बाद अपने अतीत की लीपापोती करना ही बेहतर समझें.

नवाज, रितुपर्णा चटर्जी के साथ मिलकर लिखी अपनी इस किताब की शुरुआत– जिसके और बेहतर लिखे जाने की बहुत गुंजाइश थी – यह बताकर करते हैं कि उनकी मशहूर रक्तरंजित आंखें पैदाइश के वक्त से हैं. इसके बाद वे अपने बचपन की यादों में खो जाते हैं और खूबसूरती से ग्रामीण जीवन का खाका खींचते हैं. यह भी बताते हैं कि भले ही उनके गरीब पिता जमींदार परिवार से थे लेकिन उनकी दादी दलित थीं और इस वजह से उन्हें इतना चिढ़ाया गया है कि बाकी कारणों के अलावा इस वजह से भी वे बुढ़ाना छोड़ देना चाहते थे.

किताब के इसी खंड में उनकी शुरुआती एकतरफा मोहब्बतों का भी जिक्र है और कई ऐसी घटनाएं हैं जो पाठक को सीधे ‘गैंग्स ऑफ वासेपुर’ और ‘हरामखोर’ जैसी उनकी कई फिल्मों की याद दिला देती हैं. लेकिन किताब के इस हिस्से में नैरेटिव फ्लो की कमी है क्योंकि कई किस्से बिखरे हुए हैं. आपस में कम जुड़े हैं, और इसलिए किसी गहरी लिखी आत्मकथा की तरह न होकर (जैसे नसीरुद्दीन शाह की ‘एंड देन वन डे’) 10 अध्याय वाला यह भाग ज्यादा पठनीय नहीं बन पाता.

भाग दो – जवानी के दिन और तीन जुदा शहरों से नवाज को जोड़ता थियेटर

नवाज ने अभिनय करने की शुरुआत गुजरात के बड़ोदरा शहर आकर की. लेकिन जवान होते वक्त खुद को लेकर उन्होंने कोई बड़े सपने नहीं देखे थे. इतनी सी चाहत थी कि कॉलेज में कैमिस्ट्री पढ़ने के बाद वे माइक्रोबायोलॉजी में डिग्री लेकर पैथोलॉजिस्ट बन जाएं, बस. इस आम चाहत को उन्होंने पूरा भी किया और हरिद्वार से डिग्री लेने के बाद बड़ोदरा की एक पैट्रोकैमिकल फैक्ट्री में कैमिस्ट बन गए. लेकिन मन रम नहीं रहा था और पता था नहीं कि जीवन में करना क्या है. इसी बीच एक सहकर्मी द्वारा सुझाए जाने के बाद नवाज ने एक ड्रामा कोर्स में दाखिला ले लिया. दिनभर वे फैक्ट्री में नौकरी करते और शाम को प्ले देखते-करते. सारे प्ले गुजराती में होते थे और चूंकि नवाज को वह आती नहीं थी इसलिए अपनी छोटी-मोटी भूमिकाओं के लिए वे रट्टा लगा लिया करते.

इन्हीं नाटकों के दौरान एक बार किसी ने सुझाया – यहां नवाज खासतौर पर जिक्र करते हैं कि उनकी जिंदगी के ज्यादातर अहम फैसले इसी तरह किसी दूसरे के सुझावों पर लिए जाते रहे हैं – कि चूंकि उनकी हिंदी अच्छी है इसलिए उन्हें दिल्ली जाकर एनएसडी में दाखिला लेना चाहिए. लेकिन एनएसडी में दाखिले की शर्त पहले से 12 अच्छे प्ले किए हुए होना होती है और नवाज को थियेटर का अ भी नहीं आता था. इसलिए किसी और के सुझाव पर (एक बार फिर!) नवाज ने लखनऊ की भारतेंदु नाट्य अकादेमी में दाखिला ले लिया.

अगले डेढ़ साल जवान नवाज ने लखनऊ में बिताए और तबीयत से थियेटर सीखा. किताब में भी उन्होंने तबीयत से ही थियेटर में अभिनय करने के उसूलों पर चर्चा की है और ऐसी महीन व गहन बातें लिखी हैं जो एक्टरों के हजार साक्षात्कारों में भी मिलना असंभव है. यही इस किताब की पूंजियों में एक पूंजी है, कि वो जब मौका मिलता है, अभिनय पर विस्तार से बात करती है.

हालांकि इस हिस्से में यह बात जरूर अखरती है कि डेढ़ साल लखनऊ में रहने के बावजूद वे इस नवाबी शहर का दिलचस्प खाका नहीं खींच पाते (आपको विनोद मेहता की लाजवाब ‘लखनऊ बॉय’ याद आती है). सिर्फ अपनी जीवन-यात्रा का विवरण भर देते हैं और आसपास का कुछ नहीं बताते. गुजरात के बड़ोदरा में रहने के दौरान भी अपने संघर्षों के बारे में विस्तार से नहीं लिखते और उस वक्त की बेहतर जानकारी किताब से ज्यादा उन साक्षात्कारों में मिलती है जो नवाज के उदय के वक्त आज से पांच साल पहले प्रकाशित हुए थे.

लखनऊ के तुरंत बाद ही नवाज के जीवन में दिल्ली जीने का वक्त आया. थियेटर में अनुभवहीन नहीं रहे नवाज को एनएसडी में एडमीशन मिला, लेकिन भारतेंदु नाट्य अकादेमी का कोर्स खत्म होने के एक साल बाद. इस बीच नवाज ने दिल्ली में ही एक थियेटर ग्रुप जॉइन कर लिया जहां शाम को वे अभिनय सीखते और दिन में पेट भरने के लिए नौकरी करते. नौकरी खिलौने की दुकान के बाहर खड़े रहने वाले वॉचमैन की थी जिसे ज्यादातर वक्त धूप में खड़े रहने का आदेश था, और जिसे नवाज ने तकरीबन एक साल तक माना.

26 साल की उम्र में एनएसडी में प्रवेश पाने वाले नवाज इस संस्था के बारे में कहते हैं कि अभिनय नामक क्राफ्ट के बारे में सबकुछ उन्होंने यहीं सीखा और आज भी यहां अनेक ऐसे एक्टर तैयार हो रहे हैं जो उनसे बेहतर हैं. लेकिन ऐसा कहने के तुरंत बाद नवाज अपनी किताब में प्रेम पाने की कोशिशों और जवानी की मटरगश्तियों पर ज्यादा फोकस करने में व्यस्त हो गए और तीन साल उन्होंने जिस संस्था में गुजारे उसका सतही विवरणभर पेश किया. यहां तुरंत ही अमरीश पुरी साहब की हिंदी में अनुवादित आत्मकथा ‘जीवन का रंगमंच’ याद आती है जिसमें पुरी साहब ने फिल्मों में आने से पहले रंगमंच पर गुजारे अपने वक्त का महीन विवरण पेश किया था. व्यक्तिगत जीवन से ज्यादा अभिनय पर गहरी बातें की थीं और इसी वजह से वो आत्मकथा अत्यंत पठनीय हुई थी.

नवाज ऐसा नहीं करते, न जाने क्यों! लेकिन आगे चलकर जब तीसरे भाग में मुंबई में किए संघर्षों का महीन ब्योरा खींचते हैं, आप स्तब्ध रह जाते हैं.

भाग 3 – मुंबई के संघर्ष और एक आत्मकथा का आत्म-व्यथा में तब्दील होना

नवाज की आत्मकथा में दो सर्वश्रेष्ठ अध्याय हैं. एक चौथे भाग में आता है जिसमें नवाज अभिनय पर अपना नजरिया और ज्ञान साझा करते हैं - ‘द ड्रामा किंग ऑफ इंडिया’. दूसरा ‘द डार्क नाइट’ तीसरे भाग में है जिसमें मुंबई आकर किए 12 साल लंबे संघर्ष के दौरान भोगे हुए दिनों का तफसील से ब्योरा है. यहां आपको वो नवाज मिलते हैं जो केला और चना खाकर गुजारा करते हैं और जो कुछ वक्त बाद इतने ज्यादा दरिद्र हो जाते हैं कि केला-चना भी उनके लिए महंगा हो जाता है. तब वे और उनके रूममेट विजय राज पारले-जी बिस्कुट और चाय की खुराक पर जीते हैं और नाश्ते, लंच व डिनर में सिर्फ पारले-जी और चाय लेते हैं. (किताब में बहुत बाद में जब नवाज अपनी सफलताओं का जश्न मनाते हैं, लिखते हैं कि आज भी पारले-जी का रैपर देखकर मैं सिहर उठता हूं.)

फिल्मों में काम तलाशने के दौरान के इन दिनों में नवाज के लिए भोजन इतना बहुमूल्य हो गया था कि वे 15 से लेकर 20 किलोमीटर तक रोज पैदल चलकर दोस्तों के यहां जाया करते थे. ताकि कोई उन्हें एक वक्त का खाना खिला दे, और उसके बाद वह विल्स नेवी कट सिगरेट पिला दे जिसके साथ वे कुछ पलों के लिए ही सही, अपने सारे संघर्ष धुएं में उड़ा सकें और उनकी रक्तरंजित आंखें दोबारा सपने देखने के काबिल हो जाएं. खासकर 2005 से लेकर 2007 तक, नवाज बेघर रहे और कई दिन यह भी हुआ कि किसी ने खाना नहीं खिलाया तो तीन-चार दिन तक भूखा रहने के बाद सड़कों पर बेहोश होकर गिर गए. सनद रहे, तब तक वे ‘सरफरोश’, ‘शूल’ से लेकर ‘द बायपास’ और ‘मुन्नाभाई एमबीबीएस’ तक में नजर आ चुके थे.

भाग 4 – अभिनय पर अनमोल विचार

किताब का दूसरा सर्वश्रेष्ठ और सौ फीसद अनमोल बातों से भरा पड़ा अध्याय आखिरी से पहला है –‘द ड्रामा किंग ऑफ इंडिया’. जहां आखिरी अध्याय ‘सक्सेस’ में सफलता का जश्न मनाते-मनाते नवाज कहीं-कहीं बड़बोले और घमंडी भी हो जाते हैं (लेकिन पूरी तरह ये चीजें इसलिए नहीं अखरतीं क्योंकि 12 साल के कठोर संघर्षों के बाद किसी भी इंसान में तल्खी और गुरूर का आ जाना लाजमी है), वहीं आखिरी से दूसरे वाले अध्याय में नवाजुद्दीन, नसीरुद्दीन शाह जैसे अभिनय के गंभीर गुरु की तरह अनंत गहराई में उतरकर इस कला की विवेचना करते हैं.

मैथड एक्टिंग पर अपनी लंबी और अनुभवी राय देते हैं और उससे पहले कहते हैं कि अभिनय में भी वही लय और रवानगी होनी चाहिए जैसी कि सृष्टि में मौजूद है. प्राचीन ‘नाट्य शास्त्र’ को अभिनय की सर्वश्रेष्ठ किताब का दर्जा देते हैं और भाषा आती हो या नहीं, किसी भी फिल्म को सबटाइटल्स के साथ नहीं देखते. उनके अनुसार, ‘अगर मैं पढ़ने बैठ गया तो सिनेमा के जादुई संसार में कैसे खो पाऊंगा?’ एक्टर के मासूम होने की वकालत करते हैं और शहरी लोगों के मासूमियत से दूर हो जाने पर नाखुशी जाहिर करते हैं.

यहां नवाज़ थियेटर को अब न पसंद करने की वजह उसका लाउड होना बताते हैं और एक्टरों को सुझाव देते हैं कि उन्हें अपने संवाद कभी नहीं रटने चाहिए. वह दर्दीला किस्सा भी साझा करते हैं जिसमें ‘द लंचबॉक्स’ फिल्म के ‘कैसे हैं सर?’ वाले अपने किरदार के लिए उन्होंने अपने पुराने एक्टर दोस्त मुकेश भट्ट के हाव-भावों और तौर-तरीकों को कॉपी किया था और जब यह किरदार मशहूर हो गया तब इंडस्ट्री के ज्यादातर लोगों ने संघर्षशील मुकेश भट्ट को काम देना तकरीबन बंद कर दिया. क्योंकि उन्हें लगता था कि एक्टिंग करते वक्त मुकेश बार-बार ‘द लंचबॉक्स’ वाले नवाज की नकल करते हैं.

किरदारों में वे कैसे गहरे उतरते हैं, इसपर भी नवाज ने तफसील से लिखा है और ऐसी बारीक जानकारियां टीवी या प्रिंट इंटरव्यूज में नहीं मिला करती. चाहे ‘तलाश’ के किरदार की बात हो या ‘कहानी’ से लेकर ‘मॉम’ की, अपने आसपास मौजूद रहे लोगों से उनके तौर-तरीके लेकर उन्हें स्क्रीन के लिए फिट किरदार में ढालने की रोचक प्रक्रिया को नवाज ने पूरे मन से साझा किया है. बिना संवादों वाले अभिनय को प्राथमिकता दी है और चंद संवादों के दम पर सुपरस्टारडम बरकरार रखने वाले सुपरस्टारों पर जमकर कटाक्ष किया है. इतना विस्तृत और पैना कि कभी-कभी पढ़ते हुए लगता है कि कहीं उनके साथ काम कर चुके शाहरुख या सलमान खान ने इस आत्मकथा को पढ़ लिया होता तो वे नवाज की प्रेमिकाओं से ज्यादा आहत हो गए होते!

इस शब्द से याद आया, कुछ साल पहले तक आहत होने पर विवाद होते थे और विवाद और किताब साथ-साथ पाठकों को पढ़ने को मिलते थे. अब दूसरों के आहत होने पर क्रिएटिव लोग डरने लगे हैं, और अपनी ‘इमेज’ की रक्षा करने के लिए भी आत्मकथाएं वापस लेने लगे हैं. याद आता है कि सआदत हसन मंटो के लेखों को संकलित करने वाली किताब ‘स्टार्स फ्रॉम एनअदर स्काय’ में मंटो ने 40 के दशक की फिल्मी दुनिया के खूब सारे राज मशहूर स्टार्स के नाम ले-लेकर खोले थे और खुशवंत सिंह ने तो अपनी आत्मकथा ‘ट्रुथ, लव एंड अ लिटिल मैलिस’ में हेमा मालिनी के लिए गैरवाजिब शब्द प्रयोग करने से लेकर धर्मेंद्र की रंगीन मिजाजी और ‘सत्यम शिवम सुंदरम्’ वाले राज कपूर के ओबसेशन तक पर खुलकर किस्से कहे थे.

और हम हैं कि ऐसा माहौल बना देते हैं कि लिखने और छापने वाले घबराकर किताबों को बेचना बंद कर देते हैं. गलत बात.

(पेंग्विन रेंडम हाउस इंडिया से अक्टूबर 2017 में प्रकाशित नवाजुद्दीन सिद्दीकी की आत्मकथा ‘एन ऑर्डिनरी लाइफ’ को विवादों के चलते एक हफ्ते में ही वापिस ले लिया गया था.)