निर्देशक : राजीव ढींगरा

लेखक : राजीव ढींगरा, बलविंदर सिंह, रूपिंदर चहल, राजेश चावला

कलाकार : कपिल शर्मा, इशिता दत्ता, कुमुद मिश्रा, मोनिका गिल, इनामुलहक

रेटिंग : 2 / 5

कोई किसी को आखिर कितना पागल बना सकता है! कपिल शर्मा की माने तो ‘फिरंगी’ जितना तो बना ही सकता है. दादी-नानी की कहानियों के स्तर की कथा कहने वाली ‘फिरंगी’ तकरीबन पौने तीन घंटे लंबी है और ढाई घंटे से ज्यादा लंबी फिल्में तो अब गोवारिकर और भंसाली भी नहीं बनाते. बनाना जरूरी भी होता है तो उनके वृहद कैनवास और बरसों तक फैले घटनाक्रम लंबाई को जस्टीफाई करते हैं.

लेकिन कपिल शर्मा की ‘फिरंगी’ नदी किनारे बसे दो छोटे गांवों, एक राजा, एक अंग्रेज और नायक-नायिका के प्रेम की कम बड़ी कहानी है जिसका फैलाव कुछ महीने या ज्यादा से ज्यादा एक साल तक का नजर आता है. इसके बावजूद वो कछुए नहीं कैंचुए की चाल से चलती है और अगर हाथों से स्वेटर बुनने की आदी किसी दर्शक ने यह फिल्म देखी होती तो उसको सिर्फ एक अफसोस होता –‘काश! मैं ऊन के गोले और सलाइयां साथ ले आती. दो ऊनी स्वेटर और एक जोड़ी मोजे तो इस बर्बाद हुए समय में बुन ही गए होते!’

हालांकि फिल्म अपनी शुरुआत में बहुत अच्छी है. आपको विश्वास नहीं होता कि ‘ऐसा कैसे!’ क्योंकि ट्रेलर ऐसी कोई खास उम्मीद दे नहीं पाया था. फिल्म के निर्देशक राजीव ढींगरा और आर्ट डायरेक्टर शबाना खानम मिलकर 1920 का वक्त और जीने के तौर-तरीके खूबसूरती से फिर जीवित करते हैं और गांवों के गोबर में लिपे घरों की खूबसूरती देखते ही बनती है. सिर्फ आंखों से आगे बढ़ने वाले ओल्ड वर्ल्ड रोमांस को भी फिल्म पूरी रूमानियत से दिखाती है और खासकर नायक कपिल शर्मा अपने बुद्धू से लगते किरदार को अंडरप्ले करने की वजह से दिल जीत लेते हैं. कुछ भोले से प्यारे से दृश्य भी कमाल रचे जाते हैं और कभी इश्क होते-होते रजाई पर मोर और मोरनी बनते हैं तो कभी साबुन के प्रयोग से अनजान वाले हिंदुस्तान में सफेद साबुन के सहारे प्रेमी करीब आते हैं. बोले तो, अपने बुद्धू से लगते नायक को स्थापित करते वक्त, उसको प्यार में पड़ते दिखाते वक्त और जब तक वो यह मानता रहता है कि अंग्रेज अच्छे होते हैं, फिल्म आपका मनोरंजन करती है.

लेकिन जैसे ही फिल्म गंभीरता ओढ़ती है, लुढ़कती चली जाती है. इसमें असहयोग आंदोलन का होना, आजादी की चाह रखना और बापू को बेहद प्रेम से याद करना दिल को तबीयत से छूता तो है (खासकर आज के वक्त में), लेकिन गांव वालों की जमीन पर शराब बनाने की फैक्ट्री लगाने की साजिश करने वाले क्रूर राजा और चालाक अंग्रेज को मात देने का खेल रोचकता से नहीं खेला जाता.

एक बुद्धू किरदार से चतुर-सयाने बनते ही कपिल शर्मा भी कम जंचने लगते हैं और उनके होठों पर आज के लिप-बाम की चमक भी नजर आने लगती है. कई सारे दृश्य बेमतलब के लंबे खींचे जाते हैं और एक दृश्य में अगर कुछ लोगों का विंटेज कार से पीछा किया जाता है तो वो सीन तभी ‘कट’ कहकर खत्म किया गया होगा, ऐसा हमें लगता है, जब उस गाड़ी में पेट्रोल खत्म हो गया होगा.

खास तौर पर फिल्म का इंटरवल के बाद वाला हिस्सा वो निर्देशकीय कौशल नहीं दिखा पाता जिसकी वजह से फर्स्ट हाफ का पहला हिस्सा दिलचस्प हुआ था. पटकथा तो इतनी लचर हो जाती है कि हर दो सीन छोड़कर चर्र-चर्र करने लगती है और टीवी धारावाहिकों की आईक्यू के हिसाब से दूसरे भाग में सारे काम होने लगते हैं. फिल्म की लंबाई अगर सिर्फ दो घंटे रखी गई होती, और कपिल शर्मा को पहले भाग के पहले हिस्से की ही तरह इंटरवल के बाद भी पंच लाइनें लगातार मिली होतीं, तो ‘फिरंगी’ की नियति कुछ और ही होती.

नियति बदलती तो 2015 में ‘किस किस को प्यार करूं’ से हमें प्रताड़ना देने वाले कपिल शर्मा को भी एक ईमानदार अभिनेता के तौर पर पुख्ता पहचान मिल पाती. क्योंकि ‘फिरंगी’ के गंभीर होने पर वे जरूर कम फबते हैं, लेकिन अटपटे कभी नहीं लगते और आखिर तक उनसे जुड़ाव बना रहता है. आखिर सामान्य से चेहरे-मोहरे वाले हीरो हमारे यहां होते ही कितने हैं! ऊपर से वे अपने चिरपरिचित अंदाज के विपरीत किरदार को अंडरप्ले करते हैं और फिल्म के शुरुआती हिस्से में तो बेहद जंचते हैं. इशिता दत्ता के साथ प्रेम निवेदन वाले एक सीन में उनकी कंपकपाहट खासतौर पर अलग से महसूस की जा सकती है.

‘फिरंगी’ में सबसे दिलचस्प पात्र लेकिन, राजा इंदरवीर का है जो अय्याशी में डूबा रहता है और आम जनता को अंग्रेजों से ज्यादा परेशान करता है. इसे कुमुद मिश्रा उच्च कोटि की अदायगी से इतना सम्पन्न बना देते हैं कि उसके बिना फिल्म विपन्न भी नजर आ सकती थी. हालांकि अंत आते-आते यह किरदार बॉलीवुड के कई राजा खलनायकों की तरह स्टीरियोटाइप कर दिया जाता है लेकिन सदा चमकीले वस्त्र पहनने वाले इस किरदार में कुमुद मिश्रा ने क्रूरता और मुस्कुराहट का धारदार मिलन करवाया है. अगर अब कभी राजा-महाराजाओं की अय्याशी, अंग्रेजों के सामने झुकने की आदत और झूठे अभिमान पर पैना ब्लैक ह्यूमर रखने वाली फिल्म बने तो उसमें ‘फिरंगी’ वाले कुमुद मिश्रा को जरूर लिया जाना चाहिए. वे कहर ढा देंगे.

वैसे, आज का दौर भी कौन-सा गलत वक्त है ऐसी सच्ची फिल्म बनाने के लिए!