गुजरात में कांग्रेस के जीतने की कितनी संभावना है?

जितनी मेरे पार्टी अध्यक्ष बनने के बाद सोशल मीडिया में मेरे प्रचलित नाम के बदल जाने की है! अब्ब्ब...मेरा मतलब है कि कांग्रेस गुजरात में चुनाव जीतने जा रही है.

आप पार्टी अध्यक्ष की कुर्सी पर कब बैठ रहे हैं?

वो हमारी पुश्तैनी घरेलू कुर्सी है, मैं जब मर्जी उस पर बैठूं या खड़े हो जाऊं या उससे उतर जाऊं, या न भी बैठूं. क्या फर्क पड़ने वाला है. ओऽओ... मेरे कहने का अर्थ सिर्फ इतना है कि उस कुर्सी पर बैठने से पहले मेरे ऊपर अपनी योग्यता को साबित करने का उतना ही दबाव है जितना हिंदी फिल्मों में शादी से पहले हीरो के ऊपर होता है.

क्या मतलब?

मतलब यह कि आपने कोई न कोई ऐसी हिंदी फिल्म जरूर देखी होगी जिसमें हीरोइन का पिता हीरो से कहता है कि उसकी बेटी से शादी करनी है तो पहले इतना कमाकर दिखाओ या अलाना-फलाना जैसा बनकर दिखाओ. हालांकि यह योग्यता प्रदर्शन एक नौटंकी से ज्यादा कुछ होता नहीं है. वैसे ही, जैसे मेरी... अब्ब्ब... मतलब कि हमारी पार्टी अध्यक्ष पद के लिए चुनाव! अऽअ...मेरे कहने का अर्थ यह है कि यह तो फिल्म के शुरू में ही तय होता है कि अंत में हीरोइन की शादी उसी हीरो से ही होनी है, फिर भी उसके ऊपर अपनी योग्यता को साबित करने का एक झूठा सा दबाव तो होता ही है. मेरे साथ भी वैसा ही है.

पार्टी अध्यक्ष पद के लिए अपनी योग्यता साबित करने का आपके ऊपर कैसा दबाव है?

बस, एक बार मेरे प्रचार के बावजूद पार्टी जीत जाए!...ओह, मतलब कि पार्टी का प्रदर्शन पहले से सुधर जाए और क्या!

अच्छा यह बताइये, कांग्रेस में कभी भी गांधी परिवार से अलग कोई पार्टी अध्यक्ष क्यों नहीं बनता. क्या एक ही परिवार से अध्यक्ष बनना पार्टी के आंतरिक लोकतंत्र के लिए खतरा नहीं है?

आतंरिक लोकतंत्र! (कुछ पल की चुप्पी) कुछ सुना-सुना सा तो लग रहा है... मैं मम्मी से पूछ के बताता हूं. अऽअ...मेरा मतलब है कि देश का लोकतंत्र बचाना हमारी प्राथमिकता है. उसके लिए यदि हमें पार्टी के आंतरिक लोकतंत्र का गला भी घोटना पड़े तो हम पीछे नहीं हटेंगे.

लेकिन पार्टी के महाराष्ट्र इकाई के सचिव शहजाद पूनावाला ने आरोप लगाया है कि यहनिर्वाचन नहीं, बल्कि चयन है और चुनावी प्रक्रिया महज दिखावा है. इस बारे में आप क्या कहेंगे?

(कुछ सोचते हुए) निर्वाचन, चयन और चुनाव... इन तीनों में कोई फर्क है क्या!

गुजरात में पार्टी के प्रदेश अध्यक्ष भरत सिंह सोलंकी चुनाव क्यों नहीं लड़ रहे हैं?

इसमें कौन-सी बड़ी बात है, मैं भी तो नहीं लड़ रहा वहां चुनाव!...ओह, मैं कहना चाहता हूं किसी एक के चुनाव न लड़ने से क्या फर्क पड़ता है. जो बाकी लोग चुनाव लड़ रहे हैं, हम उन्हें ही जिता लें तो उतना ही बहुत होगा.

लेकिन क्या प्रदेश अध्यक्ष का चुनाव न लड़ना, राज्य में पार्टी संगठन के लिए निराशाजनक नहीं है?

पिछले कुछ सालों से निराशाजनक प्रदर्शन को लेकर हमारी पार्टी भीतर से बहुत मजबूत हो चुकी है. जब कांग्रेस मेरे इतने सालों के प्रदर्शन को बर्दाश्त कर सकती है तो फिर बाकी की तो बात ही क्या है! अब्ब्ब...मेरे कहने का अर्थ है कि यह फैसला पार्टी के हित को ध्यान में रखकर ही किया गया है.

सुना है कि आजकल गुजरात चुनाव प्रचार के दौरान आप अक्सर किसी न किसी स्थानीय मंदिर में दर्शन के लिए जाते रहते हैं. क्या इसकी कोई खास वजह है?

अब राममंदिर के कार्ड से तो मैं खेल नहीं सकता, तो क्या स्थानीय मंदिरों से भी न खेलूं! ओह सॉरी...मेरा मतलब कि मैं मंदिरों में आशीर्वाद लेने जाता हूं और क्या!

कहा जा रहा है कि सोमनाथ मंदिर में आपनेगैर हिंदूवाले रजिस्टर में एंट्री की थी. क्या आप खुद को हिंदू नहीं मानते?

मैं व्यापारी नहीं हूं कि धर्म भी उसी शिद्दत से बेचने लगूं जैसे चाय! मैं नेता हूं और सर्वधर्म-समभाव में यकीन रखता हूं. मेरे बाबा पारसी थे, दादी हिंदू और मां ईसाई हैं. सो मेरा कोई एक धर्म नहीं. मेरी दादी काफी स्मार्ट थीं. उन्हें पता था कि इस देश में धर्म के कार्ड हमेशा चलेंगे सो उन्होंने ज्यादा से ज्यादा कार्ड अपने पास रखने की कोशिश की थी.

लेकिन आपने तो कहा है कि आप शिवभक्त हैं.

हां, जबसे मैं महाशिवरात्रि का प्रसाद नियमित लेने लगा हूं, तबसे शिवभक्त बन गया हूं! सालभर में सिर्फ एक क्रिसमस के दिन सेंटा क्लॉज बनता हूं, बाकि समय शिवभक्त बना रहता हूं.

आपको क्या लगता है, हार्दिक पटेल के कांग्रेस को समर्थन देने से पार्टी को दूरगामी फायदा होगा या नुकसान?

देखिये, पार्टी की आंतरिक राय तो यह है कि पार्टी को जितना नुकसान अपने पप्पू से हुआ है उतना पटेल तो क्या, कोई भी नहीं कर सकता! अब्ब्ब...मेरा मतलब कि पार्टी को नुकसान होगा या फायदा, यह भला अभी से कैसे बताया जा सकता है.

कांग्रेस की आज जो खस्ताहालत है, उसका कारण क्या है?

नुकसान का कारण भला खुद अपना आकलन कैसे कर सकता है! ओह, मेरे कहने का अर्थ है कि पहले गुजरात में कांग्रेस को हार...मेरा मतलब कि हरा लेने दीजिये... भाजपा को, उसके बाद नये सिरे से पार्टी की स्थिति की समीक्षा की जाएगी.

आप पहली बार सोशल मीडिया पर इतना ज्यादा छाए हुए हैं. क्या इसकी कोई खास वजह है?

यह आप क्या कह रही हैं. सोशल मीडिया पर ‘पप्पू के जोक्स’ तो बहुत सालों से सबसे ज्यादा छाए हुए हैं! अऽअ...मेरा कहने का मतलब है कि मैं अब सोशल मीडिया में अपने राजनीतिक अवतार में भी लगातार सक्रिय रहने लगा हूं ताकि मोदी जी इसे चाय कि गुमटी न बना दें और जब, जहां, जिसे, जैसा मन किया, चाय छान के न पिलाने लगें.

इस बार चुनावी रैलियों में आप विकास, अर्थव्यवस्था और किसानों के ही मुद्दे ज्यादा उठा रहे हैं. क्या आप ऐसा करते हुए मोदी जी की ही नकल तो नहीं कर रहे?

क्या आपको पता नहीं है कि नकल के लिए भी अकल ही चाहिए! अब्ब्ब...मेरा मतलब यह है कि विकास, अर्थव्यवथा और किसान मोदी जी के नहीं देश के मुद्दे हैं. मैं इन पर नहीं बोलूगा तो फिर कौन बोलेगा.

अच्छा यह बताइये कि क्या आपने भाजपा केचाय पर चर्चाकैंपेन की तर्ज पर ही कॉफी विद कांग्रेसशुरू किया है?

आप चाय और कॉफी की तुलना कैसे कर सकती हैं? चाय को आप बिना छाने नहीं पी सकते और कॉफी छानने की जरूरत ही नहीं होती. मेरे कहने का अर्थ सिर्फ इतना है कि अभी कांग्रेस के इतने बुरे दिन नहीं आए कि वह भाजपा की कॉपी करे.

भाजपा के राज्यसभा सांसद सुब्रमण्यम स्वामी का कहना है, ‘आप खोखली बायानबाजी करके अपनी विश्वसनीयता कम करते हैं.’ इस पर आपका क्या कहना है?

आपको गौर करना चाहिए, वे असल में मुझे कॉम्प्लिमेंट दे रहे हैं. इसका मतलब साफ है कि कम से कम मेरी विश्वसनीयता तो है! कम या ज्यादा तो चलता रहता है.

अच्छा, यह बताइये कि आप शादी कब कर रहे हैं?

सलमान खान से पहले तो बिल्कुल नहीं! वैसे भी आप तो मेरी बैचलर पार्टी में नहीं ही आ सकेंगी, फिर आप इसमें इतनी दिलचस्पी क्यों ले रही हैं? (मुस्कुराते हुए)