इधर मैं कई आयोजनों में इसलिए बुलाया जाने लगा हूं कि असहमति को लेकर मेरी एक सार्वजनिक छवि अनजाने-अनचाहे बन गयी है. अक्सर आयोजक मुझे इसलिए नहीं बुलाते कि मैं लेखक हूं बल्कि इसलिए कि मैं हमारे समय में घटती असहमति के बारे में आवाज़ उठाने वाला एक मुखर व्यक्ति हूं. उसके साथ एक लेखक भी हूं तो ‘कोई हर्ज नहीं’ का भाव रहता है. उनमें से ज़्यादातर को इसका पता नहीं कि लेखक हूं इसीलिए असहमति का पक्षधर हूं.

मैंने इधर कुछ महीने पहले ‘इंडिया डिसेंट्स’ नामक एक पुस्तक संपादित की है जिसमें भारत की परम्परा और आधुनिक समय में असहमति के उदाहरण संकलित किये गये हैं. मीडिया की मुख्य धारा ने इस पुस्तक को नज़रअन्दाज़ किया है पर वह अच्छी बिकी है और उसका किंचित् परिवर्द्धित रीप्रिंट अभी-अभी निकला है. कुछ बदनामी उससे भी बढ़ी होगी. तीसरे अंग्रेज़ी की बढ़ती व्याप्ति और वर्चस्व के समय में मैं ठीक-ठाक अंग्रेज़ी में बोल सकता हूं, इस वजह से भी मुझे कई जगह बुला लिया जाता है. टाइम्स लिटफ़ेस्ट में ‘लोकतंत्र और असहमति’ पर तमिल लेखक मुरुगन, अंग्रेज़ी पत्रकार एन राम के साथ मैं भी आमंत्रित था.

मैंने यह कहने की कोशिश की कि असहमति की घटती जगह न सिर्फ़ लोकतंत्र और भारतीय संविधान की मूल दृष्टि पर प्रहार है बल्कि लम्बी भारतीय परम्परा पर भी. भारत में आस्था के क्षेत्र में असहमति से कम से कम तीन धर्म बौद्ध, जैन और सिख उपजे हैं. मैंने यह भी याद दिलाया है कि भारतीय अंग्रेज़ी साहित्य से कुछ अलग बीसवीं शताब्दी का अधिकांश भारतीय साहित्य असहमति का उत्पाद है. स्वतंत्रता संग्राम के दौरान और स्वतंत्रता पाने और लोकतंत्र की स्थापना के बाद भी साहित्य मुख्यतः व्यवस्था-विरोधी रहा है. राज्य ने जब-तब इस असहमति को दबाने, हाशिये पर फेंकने आदि की चेष्टा की है पर वह इस मूल चरित्र को पालतू नहीं कर पाया.

इन दिनों यह प्रयत्न बहुत आक्रामक और जब-तब हत्यारा तक हो रहा है. दुर्भाग्य यह है कि राज्य के अलावा समाज के कई समुदाय आक्रामक ढंग से साहित्य और कलाओं की अभिव्यक्ति की स्वंत्रता को बाधित करने में लगे हैं और उन्हें राज्य आंख मूंदकर या सक्रिय रूप से मुखर होकर उत्साहित कर रहा है. मुरुगन के विरुद्ध उनके समुदाय की कार्रवाई और बिना देखे ‘पद्मिनी’ फ़िल्म पर एक समुदाय के उकसाने पर कई भाजपा राज्य सरकारों द्वारा प्रतिबन्ध इसके दुखद उदाहरण हैं. खाने-पीने, अपनी रुचि के कपड़े पहनने आदि पर लगातार कुछ संगठन हमले कर रहे हैं. उन पर राज्य कोई कार्रवाई नहीं कर रहा है. लोकतंत्र के एक महत्वपूर्ण हिस्से को चुना गया लोकतंत्र दाब रहा है, यह लोकतांत्रिक दुर्भाग्य है.

मैंने इस बात पर खेद व्यक्त किया कि देश में लाखों शिक्षक, वैज्ञानिक, अन्य बुद्धिजीवी लोगों का बड़ा तबक़ा है जो इन चुप्पियों और कटौतियों पर इन स्थलों पर मुखर-सक्रिय होने से बच रहा है, जबकि ऐसे समयों में बुद्धि के कुछ नैतिक कर्तव्य होते हैं. एक समाजचिन्तक ने हमें ‘कायरता का गणतंत्र’ कहा है और यह स्थिति ऐसा हो रहा है ज़ाहिर कर रही है.

युवाओं के बीच

अब यह अपने स्वभाव की बात है कि मैं जब अपने को युवाओं के बीच पाता हूं तो प्रायः उम्र-दराज़ अनुभव नहीं करता. जब युवा था तो ऐसे युवाओं पर केन्द्रित लेखक-समारोह नहीं होते थे. 1957 के साहित्यकार सम्मेलन में इलाहाबाद गया था और उसमें भाग लेनेवाला सबसे युवा लेखक था. ऐसा बाद में अमृत राय के एक लेख से जाना. उसमें तब के कई युवा लेखक थे, शमशेर और मुक्तिबोध भी; श्रीकान्त वर्मा, नरेष मेहता, विजयदेव नारायण साही, दूधनाथ सिंह आदि सभी युवा थे पर उसमें वरिष्ठों की संख्या भी काफ़ी थी. 1970 में पटना में जिस युवा लेखक समारोह में गया था उसमें युवाओं का आधिक्य था. पहली बार इतने युवा समकालीनों से भेंट हुई थी.

2016 से पूरी तरह से युवाओं पर एकाग्र जो दो आयोजन रज़ा फ़ाउण्डेशन ने, कृष्णा सोबती शिवनाथ निधि के साथ, किये हैं वे इस अर्थ में अनूठे हैं और अभूतपूर्व भी कि उनमें सिर्फ युवा लेखक भाग लेते हैं और कुछ वरिष्ठ लेखक उन्हें सुनते हैं. संयोजक के नाते मेरे जैसा वरिष्ठ बातूनी जब-तब हस्तक्षेप करने को विवश हो जाता है पर वाक्संयम से काम लेता हूँ. ऐसा वाक्संयम युवा भी दिखलाते हैं. ‘युवा-17’ में 30 शहरों से 50 से ऊपर युवा लेखक आये जिनमें से अधिकांश दिल्ली से बाहर के थे. इस बार लेखकों का चुनाव भी युवा लेखकों के ही एक पैनल ने किया था. संख्या अधिक है और स्थान और समय की अनिवार्य सीमाएं हैं इसलिए कुछ को ही बुलाया जा सकता है. बहुत सारे छूट जाते हैं.

सही-ग़लत ऐसा आरोप लगता रहा है कि युवा लोग अपने में ही इतने मगन रहते हैं कि अपने से पहले का साहित्य पढ़ने-गुनने की उन्हें फ़ुरसत नहीं मिल पाती. सो इस बार पांच कृतियों ‘असाध्य वीणा’, ‘अंधेरे में’, ‘ज़िन्दगीनामा’, ‘उसका बचपन’, ‘अंतिम अरण्य’ और मलयज की आलोचना पर विचार करने के विषय रखे गये. इनके अलावा ‘अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता’ और ‘स्मृति-विस्मृति’ पर भी बात हुई. हरेक को बोलने के लिए कुल दस मिनट की अवधि निर्धारित की गयी क्योंकि सभी को बोलने का अवसर देना था. प्रायः सभी ने इसका पालन किया. सारी व्यवस्था और सत्र-संयोजन युवाओं ने ही किया.

अच्छी बात यह हुई कि कई युवाओं ने कम से कम अपने लिए निर्धारित कृतियों को पढ़ा और ज़्यादातर ने उनसे प्रतिकृत होकर कुछ की चेष्टा की. चूंकि अभी तक युवा आलोचना की अपनी अवधारणाएं और युक्तियां स्पष्ट और व्यापक नहीं हुई हैं, उनकी अभिव्यकित आलोचना के चालू मुहावरों में अक्सर फंसी रही. यह थोड़ा अटपटा था कि प्रायः किसी ने इन कृतियों को अपने समय की सर्जनात्मकता और उसके सरोकारों से जोड़ने की कोशिश नहीं की. इन कृतियों के बारे में जो धारणाएं और विचार पहले से प्रचलित हैं, कई बार शायद उन्हें जाने बिना, कुछ ने पिष्टपेषण (कही बात को फिर कहना) ही किया. यह भी समझ में आया कि भले युवा रचनाशीलता की भाषा-शैली बदल गयी है, उसकी आलोचना-भाषा उससे पिछड़ी हुई है.

थोड़ा हितोपदेश भी मैंने किया. युवा अपने समय, समाज, आत्म, सचाई को खुली आंखें देखें और साथ-साथ वैकल्पिक सचाई की संभावना का सपना भी: आंखें हमें सिर्फ़ सचाई देखने भर के लिए नहीं सपना देखने के लिए भी मिली हैं. साहित्य संसार और भाषा के अनुराग से उपजता है. भाषा को बदलना चाहिये पर उसकी मर्यादाओं का भंग उचित नहीं है. अपने साहित्य के सच को दूसरे सचों का, भले वे कितने ही लोकप्रिय या आतंककारी क्यों न हों, उपनिवेश नहीं बनने देना चाहिये. साहित्य में कोई सच परम नहीं होता: सभी सच वेध्य होते हैं. यह याद रखना चाहिये कि जीवन साहित्य से बड़ा है और राजनीति-आर्थिकी-धर्म आदि से भी बड़ा है. समकालीनता के आतंक में हम यह न भूलें कि साहित्य में हम बहुसमयता की सुविधा पाते हैं. हमसे पहले बड़े लेखक हुए हैं और बिना पुरखों के हम संभव ही नहीं हो सकते.

कुंवर नारायण

यह सोचकर मन में गहरी कृतज्ञता जागती है कि इस असभ्य और अभद्र समय में हमारे बीच इतने दशकों तक कुंवर नारायण नाम का एक सभ्य लेखक था: अपने समय में भी कुंवरजी बिरले थे- दुर्भाग्य है कि साहित्य में भी ऐसे लोग बहुत कम होते रहे हैं. कुंवर जी सभ्य इस अर्थ में भी थे कि उनके बुनियादी सरोकारों में सभ्यता-चिन्ता और सभ्यता-समीक्षा शामिल थीं. वे मानवीय अस्तित्व, मानवीय स्थिति और मानवीय नियति, मानवीय नश्वरता, मानवीय संप्रेषण से लगातार अपने सृजन और विचार में सम्बद्ध रहे. वे आम ज़िन्दगी और रोज़मर्रा के अनुभवों और स्थितियों से लेकर औपनिषदिक और बौद्ध अभिप्रायों तक को समेटकर अपना काव्य-वितान रचते थे.

उनकी ‘विवेक-वेदना’ को मुक्तिबोध ने बहुत पहले पहचाना था और कुंवर जी अपने समय, समाज और संबंधों में बढ़ती गन्दगी के बरक्स जीवन और साहित्य में बहुत साफ़-सुथरे, शालीन और सौम्य बने रहे. एक तरह की सम्यकता उनके जीवन और लेखन में अचूक ढंग से व्याप्त रही. उनके जैसे निराकांक्षी और सुसंस्कृत लेखक हिन्दी में कम ही रहे हैं. वे बहुत पढ़े-लिखे लेखक थे पर उन्होंने इसका जतन रखा कि उनके ज्ञान और बुद्धि दूसरों पर या स्वयं उनके सृजन और सामान्य व्यवहार में कभी बोझ न बने.

कुंवर जी की रुचि का वितान भी विशाल था. साहित्य, दर्शन, संगीत, सिनेमा, नृत्य, ललित कला आदि सभी उसमें शामिल थे. इन क्षेत्रों के कई दिग्गजों जैसे फ़िल्मकार सत्यजीत राय, संगीतकार उस्ताद अमीर ख़ां और पंडित जसराज, ओड़िसी नृत्यांगना संयुक्ता पाणिग्रही आदि हिन्दी में रचनाकारों द्वारा लिखी गयी आलोचना की जो समृद्ध परम्परा है उसमें कुंवर जी की आलोचना की उजली जगह है. वह साहित्य के अलावा सिनेमा, संगीत आदि तक फैली हुई है.

कुंवर जी लगभग अजातशत्रु थे, कम से कम साहित्य-कला समाज में. उनकी भलमनसाहत और सहज मददगारी के कई क़िस्से बहुतों के पास हैं. इस भड़काऊ-दिखाऊ समय में वे चुपचाप बहुतों की मदद करते रहे. यह अकारण नहीं है कि उनके लिए साहित्य-समाज में जो आदर और सद्भाव है उसमें हर रंग के लेखक और पाठक शामिल हैं.