पोप फ्रांसिस आखिरकार म्यांमार में रोहिंग्या शब्द का उच्चारण नहीं कर पाए. चार दिनों की म्यांमार यात्रा के दौरान एक बार भी वे उस समुदाय का नाम नहीं ले सके जिसके बारे में वे एकाधिक बार अपने स्थान वेटिकन से बोल चुके हैं. उन्होंने पिछले साल कम से कम दो बार ईसाइयों को रोहिंग्या मुसलमानों के लिए प्रार्थना करने को कहा था. लेकिन पिछले मंगलवार को जब वे म्यांमार की नेता नांग सांग सू की से मिले तो एक बार भी उन्होंने रोहिंग्याओं का उल्लेख नहीं किया.

इसी तरह का सिलसिला उन्होंने उसके ठीक बाद बांग्लादेश की अपनी यात्रा में भी जारी रखा. यहां उन्होंने अंतरराष्ट्रीय समुदाय से म्यांमार के रखायिन प्रदेश से बांग्लादेश में आए मजबूर लोगों की मदद करने की अपील तो की, इसकी राजनीतिक वजह की ओर इशारा भी किया लेकिन रोहिंग्या शब्द वे यहां भी नहीं बोल पाए.

पोप की इस असमर्थता को लेकर रोहिंग्या समुदाय में निराशा और क्षोभ है. पोप की बहुप्रतीक्षित म्यांमार यात्रा से उनको यह उम्मीद थी कि इसकी वजह से उनके बारे में नए सिरे से और गंभीरता से चर्चा शुरू हो सकती है. लेकिन पोप फ्रांसिस ने मात्र विस्थापित समुदाय कहकर उनके प्रति जो अपनी सहानुभूति जताई, उससे उन सबकी उम्मीदों को एक झटका लगा है.

इसकी आशंका हालांकि पहले से थी. म्यांमार की राजधानी नेपिडो के बिशप कार्डिनल चार्ल्स मॉंग बो ने पोप की यात्रा के पहले उनसे अनुरोध किया था कि वे विस्थापन के बारे में या जातीय उत्पीड़न के विषय में भी बात तो करें लेकिन रोहिंग्या कहे बिना. उनका कहना यह था कि म्यांमार के आज के हालात ऐसे हैं कि यदि पोप ने इससे अलग कुछ किया तो उस देश के तकरीबन सात लाख ईसाई समुदाय की सुरक्षा को खतरा पैदा हो जाएगा. वहां के एक कट्टर बौद्ध समूह ने भी चेतावनी दी थी कि यदि पोप ने रोहिंग्या शब्द का उच्चारण किया तो उसका जवाब दिया जाएगा. इस समूह का कहना था कि वे इस्लाम के बारे में बोल सकते हैं लेकिन रोहिंग्या और दहशतगर्दों के बारे में कोई भी वक्तव्य अस्वीकार्य होगा.

संयुक्त राष्ट्र संघ यह कह चुका है कि रोहिंग्या समुदाय के साथ जो हो रहा है, वह नस्लकुशी की तरह है. म्यांमार से इस समुदाय के उत्पीड़ित लोग अपनी जान की हिफाजत के लिए बरसों से भारत और बांग्लादेश और दूसरे देशों में पनाह लेते रहे हैं. लेकिन म्यांमार के सेना-प्रमुख ने पोप को बताया कि उनके देश में धर्म के आधार पर किसी तरह का भेदभाव नहीं है, उत्पीड़न की तो बात ही अलग है.

यह आशा थी कि फौजी हुकूमत से बहादुरी से जिंदगी भर लड़ने वाली आंग सान सू की तो ज़रूर ही इस समुदाय के साथ खड़ी हो पाएंगी. आखिर उन्हें हमारे ज़माने की गांधी कहा गया था. लेकिन अंत में उन्होंने यही साबित किया कि वे बौद्ध समुदाय की ही नेता हैं. उनमें अपने समुदाय को यह बताने का साहस नहीं है कि उसके भीतर एक हिंसक समूह है जो रोहिंग्यायों के विरुद्ध घृणा फैला रहा है ताकि उनके खिलाफ हिंसा को जायज़ ठहराया जा सके.

सू की से दुनिया भर के लोगों ने अपील की कि वे इस अत्याचार को उसके सही नाम से पुकारें. लेकिन उन्होंने इसकी अनसुनी की. इस वजह से उनसे नोबेल पुरस्कार वापस लेने का अभियान चलाया गया, ऑक्सफ़ोर्ड यूनिवर्सिटी ने उनका नाम अपनी सम्मान पट्टिका से हटा दिया और वे अपने चाहने वालों की निगाह में कुछ छोटी हो गईं.

पोप से कुछ अधिक उम्मीद थी. इस कारण कि आम तौर पर वे एक दृढ़ नैतिक आवाज़ माने जाते रहे हैं. उन्होंने खुद ईसाई समुदाय के भीतर की कमियों के बारे में हिम्मत से बात की है. उन्होंने पूंजीवाद को सबसे बड़ा आतंकवाद बताया है. पश्चिम और अमरीका की उनके इस्लाम विरोध के लिए आलोचना की है. यह माना जाता है कि पोप फ्रांसिस के कुछ कहने का सांसारिक सत्ता पर असर पड़ता है.

म्यांमार और बांग्लादेश की उनकी यात्रा से स्पष्ट हुआ कि यह सारी आशा निराधार है. धर्म आपमें यह साहस देगा कि आप दुनियावी मजबूरियों की हदों से आज़ाद रह सकें, यह सिर्फ एक उम्मीद है.

पोप और सू की के पक्ष से यह कहा जा सकता है कि जब तनाव बहुत अधिक हो और एक पक्ष किसी एक शब्द से भड़क उठे तो व्यावहारिकता यही है कि उत्तेजना के उस क्षण को गुजर जाने दिया जाए और फिर उनके विवेक को जाग्रत करने का प्रयास किया जाए. अगर बिना रोहिंग्या शब्द कहे उनके हित में काम किया जा सकता है तो क्या बुरा है?

नस्लकुशी ठीक यही तो है! वह जितना भौतिक निशान मिटाना चाहती है, उससे कहीं अधिक उस उपस्थिति के विचार को ही ख़त्म कर देना चाहती है.

वास्तविक साहस की पहचान या परीक्षा तब होती है जब आप उनके खिलाफ खड़े होते हैं जो आपके अपने हैं या आप जिनका हिस्सा हैं. सू की अपने बौद्ध समर्थकों से यह न कह सकीं कि जो वे कर रहे हैं, वह मनुष्यता के विरुद्ध है, कि कोई भी जनतंत्र व्यर्थ है अगर वह किसी समूह के खिलाफ घृणा को स्वीकार करता है. वे कह सकती थीं कि जो रोहिंग्या मुसलमानों के खिलाफ बौद्ध हिंसा को उचित मानते हैं उन्हें खुद आज़ाद होने का हक नहीं! लेकिन वे हिचक गईं. और उन्होंने वह गौरव खो दिया जो सैनिक शासन की मुखालिफत करने के कारण उन्हें मिला था.

पोप म्यांमार के ईसाई समुदाय के अपने बंधुओं को यह न कह पाए कि सच बोलने के लिए नुकसान उठाने को तैयार रहना चाहिए. पोप की कूटनीतिक चुप्पी ने ईसा के संदेश के मुहाफिज और वारिस होने के उनके दावे पर सवाल खड़ा कर दिया है. यह भी इससे साबित हुआ है कि वे भी एक प्रकार के सांसारिक और राजनीतिक नेता हैं जिन्हें सत्ता अनुकूलित करती है. यह भी कि उन्हें आध्यामिकता के लिए आवश्यक साहस का अभी और अभ्यास करना है.

क्या इसके लिए हम उन्हें गांधी को पढ़ने का मशविरा दें जिन्हें उनके समय के बड़े ईसाइयों ने सबसे बड़ा ईसाई कहा था?