‘मुझे लगता है मेरी पीठ से दो छोटे-छोटे तितली के जैसे पंख निकल रहे हैं.’ सिमरन फिल्म का यह इकलौता संवाद पहली बार नौकरी पर जाने वाली लड़कियों की भावनाओं को भली तरह से बता देता है. यूं तो नौकरी मिलना या किसी काम-धंधे पर लगना किसी को भी आत्मनिर्भर और खुद पर भरोसा करने वाला बना देता है, लेकिन हम लड़कियों के मामले में ऐसा होने का मतलब अक्सर इससे कहीं बड़ा और अलग होता है. हिंदुस्तानी समाज के हिसाब से देखें तो लड़कों की परवरिश ही इस तरह से की जाती है कि वे पैसा कमाने लायक बन जाएं, फिर भले ही इस तैयारी में उन्हें गीला तौलिया टांगने का शऊर भी न आए. लेकिन लड़कियों के मामले में यह बात एकदम उल्टी हो जाती है. उन्हें बाकी सबकुछ पहले आना चाहिए और अगर पैसा कमाना भी आ गया तो यह उनकी विशिष्ट योग्यता है.

पहली नौकरी लड़कियों को जो अनगिनत उपहार देती है उनमें ढेर सारे आत्मविश्वास के साथ, जिंदगी में विकल्पों की उपलब्धता, रिश्तों में सकारात्मक बदलाव और खुद की या दूसरों की नजर में अपने लिए इज्जत शामिल है. नौकरी से होने वाले इस तरह के बदलाव लड़की के दिमाग में एक तरह की गूंज पैदा करते हैं, जो कहती है - ‘अब मैं दुनिया का कोई भी काम कर सकती हूं.’ इन कामों में अपनी मर्जी की जगह पर रहना, मनमाने कपड़े पहनना तो शामिल है ही, यह भी शामिल है कि अब मैं अपने अपनों के लिए भी कुछ भी कर सकती हूं. इन सब बातों को मिला-जुलाकर कहें तो एक नौकरी हमें जिंदगी के दो सबसे अनमोल तोहफे देती है. ऐसे तोहफे जिनके लिए हममें से ज्यादातर बचपन से तरस रही होती हैं - आजादी और सम्मान

आजादी लड़कियों के मामले में बहुत विवादित शब्द रहा है और नौकरी मिलते ही हममें से कइयों को पहली बार इस चीज का स्वाद मिलता है. हमारी टीवी-फिल्मों और कुछ हद तक असल जिंदगी में भी लड़कियों की आजादी को सिगरेट, शराब, छोटे कपड़े पहनने और शादी ना करने से जोड़कर देखा जाता रहा है. ये सब लड़कियों का चुनाव होते हुए भी, वे ही ऐसा करने के लिए लिए पूरी तरह से दोषी कैसे ठहराई जा सकती हैं! एक लंबे वक्त तक ये मत करो-वो मत करो सुनने के बाद लड़कियां हर वह काम कर लेना चाहती हैं, जिसके लिए मनाही हो. बावजूद इसके, शायद ही कोई लड़की होगी जो सोचती हो कि पहली सैलरी से ढेर सारी शराब पियूंगी. कपड़े पहनने के मामले में भी यह बात बिल्कुल इसी तरह लागू की जा सकती है.

भारतीय समाज में ज्यादातर लड़कियां सामान्य से अलग परवरिश पाती है. सीधे-सीधे कहें तो सिर्फ शादी करने के लिए तैयार की जाती हैं. ऐसे में नौकरी उन्हें घर और किचन से निकलकर बाहर की दुनिया देखने की आजादी देती है. पहली बार नौकरी पर जाते हुए वे यह महसूस करना शुरू करती हैं कि अब उन्हें क्या करना है, यह वे खुद भी तय कर सकती हैं. सबसे पहले तो यह कि वे शादी करना चाहती हैं या नहीं. अगर हां तो किससे और कब? यह बात सबसे ज्यादा राहत देने वाली होती है. नौकरी ढूंढ़ते हुए लड़कियां सबसे पहले इसी चिंता से आजादी पा लेना चाहती हैं. यह बात स्पष्ट तौर पर वे कह भले न कह पाएं लेकिन मन के कोने में कहीं यह रहती जरूर है.

आजादी के बाद दूसरी जरूरी चीज है, सम्मान. इसका पता भी हममें से ज्यादातर लड़कियों को बहुत हद तक पहली नौकरी करने के दौरान ही चलता है. अहमदाबाद में एक निजी कंपनी में बतौर क्वालिटी अश्योरेंस इंजीनियर काम कर रही विद्या कुशवाहा, अपने डेजिग्नेशन का जिक्र करते हुए बताती हैं कि ‘मेरे बारे में लोग कहते थे, इसे कुछ नहीं आता है. मेरा काम ऐसा है कि मैं ओके लिखकर ना दूं तो कोई प्रोडक्ट आगे नहीं जा सकता. मैं हमेशा बहुत से लोगों के मुंह बंद कर देना चाहती थी. पहली नौकरी से मैं यही चाहती थी. अब मुझे बहुत मजा आता है अब जब मेरी बुराई करने वाले लोग मुझे आंखे फाड़कर देखते हैं तो.’ 25 साल की विद्या आगे बताती हैं कि ‘परिवार में सबसे छोटा होने के चलते ऐसा कभी नहीं था कि मेरी कोई इच्छा अधूरी रह गई हो लेकिन फिर भी अब जब मैं नौकरी कर रही हूं तो कहीं ज्यादा सम्मानित और आत्मविश्वास से भरा महसूस करती हूं.’

महज 19 साल की प्रार्थना, जो नोएडा के एक नामी मीडिया हाउस में काम करती हैं, बताती हैं - ‘घर वालों से पैसे लेने-मांगने के झंझट का खत्म होना, न सिर्फ आपको कहीं ज्यादा जिम्मेदार और हर मुश्किल से निपटने की हिम्मत देता है बल्कि आप खुद को एक अलग ही नजर से देखना शुरू कर देते हैं.’ प्रार्थना की यह बात इस तथ्य की तरफ इशारा करती है कि ज्यादातर लड़कियां अपनी पहली नौकरी के दौरान ही समझ पाती है कि वे कितनी महत्वपूर्ण हैं. इस दौरान कई लड़कियां यह भी चाहती हैं कि अब जब भी वे अपने परिवार या दोस्तों से मिलें उन्हें डिग्निटी के साथ ट्रीट किया जाए. उनके साथ पहले जैसा ऐसा व्यवहार न किया जाए कि वे किसी से कमतर हैं. या उनकी जिंदगी दूसरों की मोहताज है. ऐसा न होना कई बार गुस्सा दिलाने वाला होता है, लेकिन यह भीतर की मजबूती से निकला जायज गुस्सा है.

पहली नौकरी आपको आजादी और सम्मान से जीने का चस्का लगा देती हैं. यह बात दिल्ली के अशोक नगर में बतौर हाउस हेल्प काम करने वाली संगीता पोद्दार के अनुभव से भी पता चलती है. अपनी पहली नौकरी के बारे में बताते हुए वे कहती हैं – ‘मेरे पति नहीं चाहते थे कि मैं नौकरी करूं इसलिए मैंने उनसे छुपकर एक महीने नौकरी की. महीने भर तो मैं खूब डरती रहती थी लेकिन फिर जब पहली तारीख को मेरे हाथ पर चौदह सौ रुपए रखे गए तो मेरा डर छू हो गया. शाम को मैंने पति को सबकुछ बता दिया तो मुझे आश्चर्य हुआ जब वो मान गए.’ थोड़ी और बातचीत के बाद शादी और आजादी का सवाल करने पर संगीता कहती हैं कि ‘अगर मुझे पता होता कि कम पढ़ी-लिखी होने के बाद भी मैं इज्जत से कमा सकती हूं तो मैं शादी के चक्कर में कभी नहीं पड़ती.’ और आगे वे खिलखिलाते हुए कहती हैं ‘शादी ना करती तो अपने कमाए पैसों पर अकेले ऐश कर रही होती.’

संगीता जैसी ही बात प्रार्थना भी कुछ इन शब्दों में कहती हैं - ‘मैने इतनी मेहनत से पढ़ाई-लिखाई की, नौकरी पाई और अब मैं शादी या रिलेशनशिप के झंझट में पड़ जाऊं. अपनी मेहनत के मजे भी मैं ही लूंगी.’ सामाजिक असुरक्षा या अकेले रह जाने का डर लड़कियों के मन में इतना भर दिया जाता है कि वे शादी के बिना अपनी जिंदगी सोच भी नहीं सकतीं. यह सवाल बार-बार उनके सामने आकर खड़ा होता रहता है कि इससे छुटकारे के लिए आत्मनिर्भर होना जरूरी है. इसलिए नौकरी की चाहत के तार बार-बार आकर शादी करने या न करने से भी जुड़ जाते हैं.

सत्याग्रह में हमारी सहयोगी मनीषा यादव एक संभावनाओं से भरी कलाकार भी हैं (इस लेख का इलस्ट्रेशन भी उन्होंने ही बनाया है). मनीषा का कहना है कि पहली नौकरी खोजने और करने के दौरान उनके दिमाग में यही बात चलती रहती थी कि किसी तरह वे अपने शहर बनारस से दूर रहें. मनीषा ऐसा चाहने की वजह बताते हुए कहती हैं - ‘मैं कला के क्षेत्र में काम करना चाहती थी. पेंटिंग, रंग, ब्रश, कैनवस के लिए बनारस में मौके न के बराबर थे. ऐसे में बाहर निकलने के लिए नौकरी सबसे जरूरी चीज थी.’ जैसे सुपर मॉडल बनने वाली हर लड़की मुंबई-दिल्ली में पैदा नहीं हो सकती, वैसे ही छोटे कस्बे में पैदा होने वाली हर लड़की मास्टरनी नहीं बनना चाहती है. हमारे सपनों का कद भी कई बार नौकरी की हमारी चाह को प्रभावित करता है.

अपने बराबर या उससे ज्यादा अपनों का ख्याल रखना लड़कियां के डीएनए का हिस्सा होता है. प्रार्थना और विद्या इस बात का जिक्र करती हैं कि पहली नौकरी आपको कम उम्र का होते हुए भी करीबियों के लिए पैसों से कुछ करने का मौका दे देती है. पहली बार ऐसा करने की आजादी और इससे दूसरों में उपजा स्नेह, कृतज्ञता या सम्मान का भाव लड़कियों को एक अलग ही तरह की विशिष्टता का अनुभव कराते हैं.

कुल मिलाकर पहली नौकरी हम लड़कियों को सिमरन के उस संवाद, जिसका जिक्र हमने शुरू में किया था, को कुछ इस तरह दोहराने का मौका दे देती है:

हवाएं मुझे रोक नहीं सकते, रास्ते मुझे बांध नहीं सकते, मेरे पीठ पर पंख हैं और मन में हौसला है. मैं कभी भी उड़ सकती हूं.