बीते मंगलवार को दूरसंचार नियामक संस्था टेलिकॉम रेगुलेटरी अथॉरिटी ऑफ इंडिया (ट्राई) ने नेट न्यूट्रैलिटी (इंटरनेट की निरपेक्षता) पर सिफारिशें जारी की. ट्राई का मानना है कि इंटरनेट के इस्तेमाल और किसी कॉन्टेंट तक उपभोक्ताओं की पहुंच में कोई भेदभाव नहीं होना चािए. साथ ही, उसने इस पर निगरानी रखने के लिए एक संस्था बनाने का भी सुझाव दिया. इसमें दूरसंचार और इंटरनेट सेवा देने वाली कंपनियों के अलावा कॉन्टेंट प्रोवाइडर, सिविल सोसायटी और उपभोक्ताओं के प्रतिनिधियों को शामिल किए जाने की बात कही गई है.

नेट न्यूट्रैलिटी का विचार इंटरनेट डेटा को सभी तरह के इस्तेमाल में बराबरी का दर्जा देने पर आधारित है. यानी इंटरनेट सेवा देने वाली कोई कंपनी किसी खास वेबसाइट या सेवा के लिए इंटरनेट की स्पीड न तो घटा और न ही बढ़ा सकती है. साथ ही, इंटरनेट के कई तरह के इस्तेमाल के लिए अलग-अलग कीमतें भी तय नहीं की जा सकतीं. ट्राई का कहना है कि दूरसंचार कंपनियों पर किसी कंपनी के साथ कॉन्टेंट तक पहुंच के साथ भेदभाव करने वाले समझौते करने पर पाबंदी लगनी चाहिए. इसके अलावा नियामक प्राधिकरण ने इस पाबंदी को सख्ती से लागू करने के लिए दूरसंचार कंपनियों की लाइसेंस शर्तों में बदलाव का समर्थन किया है.

देश में नैट न्यूट्रैलिटी पर बहस साल 2014 में शुरू हुई थी. उस साल फेसबुक ‘फ्री-बेसिक्स’ का प्रस्ताव लेकर आया था. फ्री-बेसिक्स के अंतर्गत उपभोक्ता कुछ वेबसाइटों को फ्री में देख सकते थे लेकिन कुछ के लिए उन्हें डाटा पैक लेना पड़ता. यह प्लान चूंकि नेट न्यट्रैलिटी के खिलाफ जाता है तो इसी आधार पर ट्राई ने इसे खारिज कर दिया था. ताजा सिफारिशों के साथ ट्राई ने अपने पिछले रुख को ही साफ किया है. ट्राई ने 2016 में इस मामले पर सभी पक्षों की राय मांगी थी और 2017 की शुरुआत में साफ कर दिया था कि सर्विस प्रोवाइडर उपभोक्ताओं को कोई वेबसाइट दिखाने के लिए ज्यादा सहूलियत देने या उसे न दिखाने को लेकर कोई भेदभाव नहीं कर सकते.

उधर, ट्राई के इन दिशा-निर्देशों के बीच अमेरिका नेट न्यूट्रैलिटी से पीछे हटने की तैयारी करता दिख रहा है. पूर्व राष्ट्रपति बराक ओबामा के कार्यकाल में नेट न्यूट्रैलिटी सुनिश्चित करने के लिए कुछ नियम-कायदे बनाए गए थे. 14 दिसंबर को अमेरिका का फेडरल कम्युनिकेशंस कमीशन इनको खत्म करने के बारे में फैसला करने जा रहा है.

ट्राई की इन सिफारिशों को इंटरनेट की सबके लिए समान उपलब्धता को लेकर काफी अहम माना जा रहा है. इस बारे में देश के प्रमुख अखबारों ने संपादकीय के जरिए अपने विचार रखने की कोशिश की है. अखबारों ने ट्राई की सिफारिशों का स्वागत करते हुए इंटरनेट के लोकतांत्रिक स्वरूप और इसकी जरूरत पर जोर देने के साथ दूरसंचार कंपनियों की चिंताओं को भी जगह देने की कोशिश की है.

नेट न्यूट्रैलिटी पर द हिंदू का मानना है कि ट्राई की सिफारिशों को लागू किए जाने के बाद इंटरनेट ऐसा मंच बन सकता है जिस तक हर नागरिक की बराबर पहुंच हो. हालांकि, अखबार के मुताबिक इसके साथ सर्विस प्रोवाइडरों की चिंताओं को भी पूरी तरह खारिज नहीं किया जाना चाहिए. उसका मानना है कि देश में इंटरनेट का यह विस्तार जिस बुनियादी ढांचे की बदौलत हुआ, वह निजी कंपनियों द्वारा किए गए निवेश से ही संभव हुआ है. ऐसे में अगर कंपनियों के लिए अपने निवेश पर मुनाफा कमाने की राह में बाधाएं खड़ी की गईं तो इसका नुकसान भी आखिर में नागरिकों को ही उठाना पड़ेगा. ट्राई ने यह फैसला सरकार पर छोड़ दिया है कि किन सेवाओं को ‘विशेष’ दर्जा देना है. यहां विशेष से मतलब उन सेवाओं से है जिनमें नेट न्यूट्रैलिटी लागू नहीं होगी. द हिंदू के मुताबिक इसे देखते हुए आशंका पैदा होती है कि कंपनियां कहीं इस छूट का मनमाना इस्तेमाल न करने लगें. उसका मानना है कि इसे रोकने के लिए भी एक व्यवस्था बनाने की जरूरत होगी.

उधर, द इंडियन एक्सप्रेस ने नेट न्यूट्रैलिटी को लेकर भारत और अमेरिका की आर्थिक स्थिति को ध्यान में रखते हुए अपनी बात रखी है. अखबार अपने संपादकीय में लिखता है कि दोनों देशों के नियामक प्राधिकरणों द्वारा नेट न्यूट्रैलिटी को लेकर अपनाए गए रुख के पीछे यह तथ्य है कि अलग-अलग लोगों के लिए इंटरनेट का मतलब अलग-अलग होता है और अमेरिका जैसे परिपक्व बाजार में अब इस सुविधा को आर्थिक लाभ बटोरने के लिए भी प्रभावी तरीके से इस्तेमाल किया जा सकता है. इसके उलट भारत जैसे विकासशील देशों में जहां स्मार्टफोन क्रांति अभी शुरुआती दौर में है वहां नेट न्यूट्रैलिटी लोगों के लिए काफी अहम साबित हो सकती है. इसके जरिए बड़ी मात्रा में सामाजिक और आर्थिक पूंजी हासिल की जा सकती है.

अमर उजाला ने ट्राई के दिशा-निर्देशों का स्वागत किया है. उसका मानना है कि दूरसंचार कंपनियां लगातार उपभोक्ताओं से विशेष डेटा के बदले अतिरिक्त शुल्क वसूलने के फेर में हैं. बीती 29 नवंबर को प्रकाशित संपादकीय में उसका कहना है कि कंपनियों का यह रवैया इंटरनेट के उस लोकतांत्रिक सिद्धांत के उलट है, जिसके जरिए उस तक सभी की पहुंच बिना बाधा होना चाहिए. इसके आगे कहा गया है कि ऐसे वक्त जब सारी सरकारी योजनाओं को इंटरनेट से जोड़ा जा रहा है और अन्य सेवाएं इस माध्यम पर मौजूद हैं, इसकी पहुंच महंगी होने का मतलब लोगों पर अतिरिक्त आर्थिक बोझ पड़ना है. अखबार ने आखिर में एक सवाल छोड़ दिया है कि अगर अमेरिका ने नेट न्यूट्रैलिटी खत्म कर दी तो क्या भारत इससे बचा रह पाएगा.

उधर, ट्राई की सिफारिशों पर हिंदुस्तान टाइम्स का मानना है कि इंटरनेट कोई हाईवे या फिर रेलवे नहीं है और इस पर सरकार के साथ-साथ निजी कंपनियों का भी मालिकाना हक हो सकता है. साथ ही, कोई भी दूसरे को प्रभावित किए बिना इसके साथ कुछ कर सकता है. हालांकि, अखबार का आगे कहना है कि नेट न्यूट्रैलिटी की वजह से संभव है कि अपनी राजस्व हानि को दुरुस्त करने के लिए कंपनियां इसका बोझ उपभोक्ताओं के कंधे पर डाल दें. अखबार के मुताबिक ऐसी संभावना को देखते हुए ट्राई और गैर-प्रतियोगी संस्थाओं को सामने आकर इसका सामाधान करना होगा. उसके मुताबिक इंटरनेट की आजादी एक बहुत बड़ा मुद्दा है, और ट्राई ने इस पर सही कदम उठाया है.