बांग्लादेश : हाई कोर्ट ने विद्रोह के आरोपित 139 जवानों की मौत की सजा बरकरार रखी | सोमवार, 27 नवंबर 2017

फरवरी, 2009 में बांग्लादेश राइफल्स (नया नाम - बॉर्डर गार्ड बांग्लादेश) द्वारा किए गए विद्रोह के आरोपित जवानों की सजा वहां के हाई कोर्ट ने बरकरार रखी है. इस मामले में 139 जवान आरोपित हैं. इसके साथ अदालत ने 146 जवानों की उम्रकैद की सजा भी बरकरार रखी है.

हालांकि माना जा रहा है कि आरोपित जवान इस फैसले के खिलाफ सुप्रीम कोर्ट में अपील कर सकते हैं. चार साल पहले ढाका की एक अदालत ने इस मामले में 152 जवानों को मौत और 158 को उम्रकैद की सजा सुनाई थी. आरोपित जवानों पर विद्रोह की साजिश रचने के अलावा हत्या करने, लूटने और बंधक बनाने का आरोप है.

ब्रिटेन : आंग सान सू की को मिला सम्मान वापस लिया गया, रोहिंग्या संकट पर आंखें मूंदने का आरोप | मंगलवार, 28 नवंबर 2017

म्यांमार की नेता आंग सान सू की से ऑक्सफ़ोर्ड शहर का प्रतिष्ठित सम्मान ‘फ़्रीडम ऑफ़ द सिटी ऑफ ऑक्सफ़ोर्ड अवार्ड’ आधिकारिक रूप से वापस ले लिया गया है. द गार्डियन की ख़बर के मुताबिक़ ऑक्सफ़ोर्ड काउंसिल का कहना है कि वह हिंसा को देखकर भी आंखें मूंदने वालों के साथ खड़ी नहीं हो सकती. म्यांमार में रोहिंग्या मुसलमानों के ख़िलाफ़ हो रही हिंसा और उस पर सू की के रुख की कुछ समय से लगातार आलोचना हो रही है. यही वजह है कि काउंसिल ने उनसे यह पुरस्कार वापस लेने का फ़ैसला किया.

‘फ्रीडम ऑफ़ द सिटी अवार्ड’ ऑक्सफ़ोर्ड में पढ़े किसी महत्वपूर्ण व्यक्ति या किसी मशहूर हस्ती को दिया जाता है. आंग सान सू की को 1997 में यह पुरस्कार दिया गया था. 1964 से 1967 के बीच उन्होंने यहां के सैंट ह्यू कॉलेज से राजनीति, दर्शनशास्त्र और अर्थशास्त्र की पढ़ाई की थी. 2012 में सू की को ऑक्सफ़ोर्ड विश्वविद्यालय ने डॉक्टरेट की मानद उपाधि दी थी. उनसे पुरस्कार वापस लेने का प्रस्ताव रखने वाली काउंसलर मैरी क्लार्क्सन का कहना है, ‘ऑक्सफ़ोर्ड शहर की परंपरा विविध और मानवीय रही है, और हिंसा को अनदेखा करने वालों ने हमारी प्रतिष्ठा को कलंकित किया है. हमें उम्मीद है कि आज हमने रोहिंग्या मुसलमानों के मानवाधिकारों और न्याय की मांग कर रहे लोगों के साथ अपनी आवाज़ उठाई है.’

केन्या : विपक्ष के विरोध के बीच उहरू केन्याता ने राष्ट्रपति पद की शपथ ली | बुधवार, 29 नवंबर 2017

हालिया चुनावों में जीत दर्ज करने वाले उहरू केन्याता ने मंगलवार को केन्या के राष्ट्रपति पद की शपथ ली. यह उनका दूसरा और अंतिम कार्यकाल होगा. बीबीसी के अनुसार शपथ ग्रहण के बाद उन्होंने देश में बने राजनीतिक विभाजन को दूर करने का वादा किया. राष्ट्रपति उहरू केन्याता ने यह भी कहा कि समावेशी भावना में विपक्ष के विचारों को शामिल करने का प्रयास किया जाएगा. हालांकि, विपक्षी दलों ने उनके शपथ ग्रहण समारोह का बहिष्कार कर दिया था.

26 अक्टूबर को संपन्न राष्ट्रपति चुनाव में उहरू केन्याता ने 98 फीसदी वोट मिले थे. हालांकि, विपक्ष के चुनाव बहिष्कार की वजह से इसमें 39 फीसदी मतदान ही हुआ था. उन्होंने विपक्ष की नेता रायला ओडिंगा को हराया था. केन्या में अगस्त में भी राष्ट्रपति चुनाव हुआ था, लेकिन विपक्षी दलों ने उहरू केन्याता पर धांधली करने का आरोप लगाते हुए इसके परिणाम को मानने से इनकार कर दिया था. इसके बाद भड़की हिंसा में 11 लोग मारे गए थे. केन्या की सुप्रीम कोर्ट ने इस चुनाव परिणाम को खारिज कर दिया था और 60 दिन में दोबारा चुनाव कराने का आदेश दिया था.

आतंकी संगठन लश्कर-ए-तैयबा का समर्थन कर परवेज़ मुशर्रफ आखिर क्या संकेत देना चाहते हैं? | गुरुवार, 30 नवंबर 2017

पाकिस्तान के पूर्व राष्ट्रपति और सैनिक तानाशाह जनरल परवेज़ मुशर्रफ ने खुलकर आतंकी संगठन लश्कर-ए-तैयबा (एलईटी) का समर्थन किया है. उन्होंने एलईटी के संस्थापक और 26/11/2008 के मुंबई हमले के मुख्य साजिशकर्ता हाफिज़ सईद को भी ‘अपनी पसंद’ बताया है.

आत्म निर्वासन की स्थिति में इस वक़्त दुबई में रह रहे मुशर्रफ ने एक टीवी शो के दौरान कहा, ‘मैं लश्कर-ए-तैयबा का सबसे बड़ा समर्थक हूं. और मै जानता हूं कि एलईटी और जेयूडी (हाफिज़ सईद का संगठन जमात-उद-दावा) के लोग भी मुझे पसंद करते हैं.’ इसके बाद जब उनसे पूछा गया कि क्या वे सईद को पसंद करते हैं तो उन्होंने कहा, ‘हां मैं उससे मिला हूं. बल्कि अभी हाल में ही मिला था. मैं हमेशा से कश्मीर में कार्रवाई के पक्ष में रहा हूं. इसलिए मैं उनके पक्ष में भी हूं.’

अमेरिकी राष्ट्रपति चुनाव में रूसी दख़लंदाज़ी के मसले पर डोनाल्ड ट्रंप की परेशानी बढ़ती दिख रही है | शुक्रवार, 01 दिसंबर 2017

अमेरिकी राष्ट्रपति चुनाव में रूसी दख़लंदाज़ी के मसले पर डोनाल्ड ट्रंप की परेशानी बढ़ती दिख रही है. ऐसा इसलिए क्योंकि उनके सहयोगी और देश के पूर्व राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार माइकल टी फ़्लिन रूस से मिलीभगत के आरोप सही पाए गए हैं. साथ ही यह भी कि उन्होंने इस मामले की जांच के दौरान एफबीआई (संघीय जांच एजेंसी) से झूठ बोला.

द न्यू यॉर्क टाइम्स के मुताबिक ट्रंप के सत्ता में आने से पहले ही फ़्लिन ने अमेरिका में रूस के तत्कालीन राजदूत सर्गेई आई किसल्यक से विदेश नीति के संबंध में बातचीत की थी. इसकी भनक लगने के बाद उन्हें तब के राष्ट्रपति बराक ओबामा के प्रशासन के एक वरिष्ठ अधिकारी ने चेतावनी भी दी थी. बताया जाता है फ़्लिन और किसल्यक की बातचीत ट्रंप की टीम के किसी ‘अतिवरिष्ठ सदस्य’ के निर्देश पर हुई थी. हालांकि इस सदस्य का नाम सामने नहीं आया है.

डोनाल्ड ट्रंप के इस कदम से मुस्लिम जगत में उथल-पुथल मच सकती है | शनिवार, 02 दिसंबर 2017

अमेरिका के राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप जेरूसलम को इजरायल की राजधानी की मान्यता दे सकते हैं. इंडियन एक्सप्रेस के मुताबिक एक वरिष्ठ अधिकारी ने रॉयटर्स को बताया कि राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप अगले हफ़्ते जेरूसलम को इजरायल की राजधानी घोषित कर सकते हैं. बताया जा रहा है कि अमेरिकी राष्ट्रपति छह दिसंबर को अपने भाषण के दौरान यह घोषणा करेंगे. इस कदम के तहत अमेरिकी दूतावास को इजरायल के शहर तेल अवीव से जेरूसलम स्थांतरित किया जाएगा.

अधिकारी ने यह भी बताया कि इस घोषणा के साथ ही (जेरूसलम को लेकर) अमेरिका की दशकों पुरानी नीति समाप्त हो जाएगी. लेकिन इससे मध्य पूर्व में बड़ी उथल-पुथल पैदा हो सकती है. इजरायल और फिलिस्तीन की दुश्मनी के बीच जेरूसलम की स्थिति दुनिया के सबसे विवादित मुद्दों में से एक है. दोनों ही देश इसे अपनी राजधानी होने का दावा करते हैं. यह जगह ईसाइयों, यहूदियों और मुसलमानों के लिए एक पवित्र स्थल भी है. ये सभी समुदाय जेरूसलम पर इजरायल के दावे को मान्यता नहीं देते. इस स्थिति में जरा भी बदलाव की मध्य पूर्व और दूसरे मुस्लिम बहुत देशों में बड़ी प्रतिक्रिया हो सकती है.