इन पंक्तियों के लेखक को हाल ही में किसी यज्ञोपवीत तमाशे को नजदीक से देखने का अवसर मिला. जी हां, इस कर्मकांड के लिए सबसे उपयुक्त यह ‘तमाशा’ शब्द वहां के मुख्य पुरोहित की ही देन थी. मुख्य पुरोहित अपेक्षाकृत युवा था और बनारस तथा दक्षिण भारत के किसी प्रसिद्ध वैदिक संस्कृत संस्थान का पढ़ा-लिखा था. संस्कृत से ही बीएड और एमएड था और किसी केन्द्रीय शिक्षण संस्थान में उपयुक्त सरकारी नौकरी की तलाश में था. इसलिए वह बाकी गंवई पुरोहितों को हेय दृष्टि से देखता था और बात-बात में उन पर चुटकी लेता था. एक तटस्थ पर्यवेक्षक की भूमिका में पुरोहितवाद के अलग-अलग स्तर को समझने का यह अच्छा मौका था.

पहले के देहाती पुरोहितों की कट्टरता और उनके दकियानूसीपने में भी एक तरह का भोलापन होता था. वह जो भी करते थे, उसमें उनका अंधता की हद तक विश्वास होता था और किसी भी ईश्वरीय सत्ता के प्रति उनमें डर होता था. विशेष संदर्भों में उनके भोलेपन को मूर्खता भी कहा जा सकता था. लेकिन विश्वविद्यालयी शिक्षा लिया हुआ आज का कस्बाई और शहरी पुरोहित सामाजिक बदलाव और राजनीति को थोड़ा-बहुत समझता है. इसलिए पुराने पुरोहितों के भोलेपन के स्थान पर नए पुरोहितों में एक प्रकार की चतुराई आ गई है. अब प्रस्तुत परिस्थिति, स्थान और सामने वाले व्यक्ति के हिसाब से पाला बदलने और अवसरानुकूल प्रगतिशीलता का जामा पहनने में वह माहिर हो चुका है. इसलिए स्वयं उस जनेऊ कर्मकांड का मुख्य संपादक होते हुए भी जब इस पुरोहित ने इसे तमाशे का नाम दिया, तो यह इस लेखक के लिए आश्चर्य की बात नहीं थी.

उसका आशय पूछने पर उस पुरोहित ने बताया कि देखिए ये सब खानापूर्ति है. सांप कभी का निकल गया, लेकिन ये मूर्ख बाभन अभी तक उसकी लीक को लाठी से पीटते जा रहे हैं. इन लड़कों का यज्ञोपवीत केवल इसलिए कराया जा रहा है, क्योंकि यह इनका ससमय विवाह होने के लिए एक पूर्वशर्त है. इनमें से किसी भी लड़के ने शास्त्रीय विधान के अनुरूप अब तक अनिवार्य ‘ब्रह्मचर्य’ का पालन किया होगा या आगे ऐसा करेंगे, इसकी आशा करना हद दर्जे की मूर्खता होगी. इनमें से ज्यादातर को संस्कृत का लेशमात्र भी ज्ञान नहीं है, इसलिए मंत्रोच्चार की जगह ये कुछ भी बुदबुदाते रहते हैं. सिर मुंडाकर, किसी चाकू में सुपारी खोंसकर, देह में उबटन और आंखों में काजल लगाकर और किसी भी तरह पीली धोती लपेटे ये लड़के बांस की छतरी ताने अभी रस्मी तौर पर पांच या सात घर भीख मांगने निकलेंगे. यह उस भिक्षाटन की नकल है जब गुरु के आश्रम के लड़के विद्याध्ययन के दौरान गांव से भीख मांगकर लाते थे.

और तो और यज्ञोपवीत के अगले दिन से ही इनमें से कोई भी जनेऊ धारण किए रहना नहीं चाहेगा और मां-बाप से नजर बचाकर इसे उतारकर कहीं फेंक देगा. अब चूंकि ये मैथिल बाभन हैं, इसलिए इनका कोई भी कथित ‘यज्ञ’ बिना पशुबलि के संपन्न नहीं होगा. वो देखिए कई मोटे-ताजे बकरे कटने के लिए तैयार बैठे हैं. रात को इनका मांस पकेगा और गांवभर के बाभन छककर इसे खाएंगे. और इसके बाद जब इनकी डकार निकलेगी, तब जाकर यज्ञोपवीत को संपन्न हुआ माना जाएगा. आप देखिए कि पांच दिनों की इस प्रक्रिया में इनके लिए नमक तक वर्जित है, लेकिन आप देख सकते हैं कि इनमें से ज्यादातर लड़के बीच-बीच में समय निकालकर गुटखा और तमाखू दबा आते हैं. अभी तक यह हमारे आपस की बात थी.

तभी दालान पर बैठे लोगों के बीच यज्ञोपवीत कर रहे लड़कों द्वारा पहने गए हैंडलूम और खादी की धोती की चर्चा चली और बात महात्मा गांधी तक जा पहुंची. मुख्य पुरोहित सतर्क था, उसने इस विषय पर अचानक चुप्पी साध ली. लेकिन गांव के अन्य बाभनों ने गांधी के खिलाफ मोर्चा खोल दिया. तरह-तरह के काल्पनिक प्रसंगों के माध्यम से गांधी को बुरा-भला कहने का क्रम शुरू हो गया. हिन्दुओं और विशेषकर बाभनों की दुर्दशा के लिए गांधी को जिम्मेदार ठहराया जाने लगा. इससे इस लेखक की जिज्ञासा बढ़ी कि वास्तव में गांधी यज्ञोपवीत या जनेऊ को लेकर क्या सोचते थे. आज जबकि फिर से जनेऊ को लेकर एक नया प्रसंग सामने है, ऐसे समय में पाठकों के लिए भी यह जानना दिलचस्प हो सकता है कि वास्तव में गांधी जनेऊ को लेकर क्या सोचते थे.

प्रसिद्ध स्वतंत्रता सेनानी और सुधारक काका कालेलकर ने 1926 में महात्मा गांधी को जनेऊ के संबंध में एक चिट्ठी लिखी जिसमें कहा गया था कि सामाजिक समरसता लाने के लिए कथित अन्त्यजों को भी जनेऊ पहनाने का एक अभियान चले. तब तक गांधी इस विषय पर कोई मत नहीं बना सके थे, हालांकि व्यक्तिगत तौर पर वे जनेऊ इत्यादि के प्रपंच से मुक्त हो चुके थे. फिर भी उन्होंने 5 सितंबर, 1926 को साबरमती आश्रम से काका कालेलकर को अपने जवाबी पत्र में लिखा -

‘जो लोग जनेऊ पहनते हैं, वे इसे उतार दें ऐसा मैं नहीं चाहता और न ही यह आग्रह है कि वे इसे धारण अवश्य करें. आजकल तो इसका महत्व सूती धागे के बराबर भी नहीं रह गया है. मेरी स्थिति तो ऐसी ही है कि जब तक शूद्र या अन्त्यज लोग जनेऊ धारण नहीं कर पाते, तब तक तो मेरे मन में जनेऊ के प्रति अरुचि ही उत्पन्न होगी. लेकिन शूद्रों और अन्त्यजों पर भी बिना सोचे-विचारे और बिना किसी कारण के हम जनेऊ पहनने का बोझ क्यों लादें?’

जाहिर है कि गांधी तब तक इस विषय पर ठीक से सोच-विचार नहीं पाए थे. दूसरी बात यह कि वे किसी भी प्रकार के आमूल परिवर्तनवादी अभियान से पहले सामाजिक शिक्षण और प्रबोधन के माध्यम से एक वातावरण बना लेना चाहते थे. लेकिन इसके डेढ़ साल बाद शिमला के बाघात रियासत में एक अजीब घटना घटी, जिसने जनेऊ के बारे में गांधी को कठोरतापूर्वक विचार करने के लिए बाध्य कर दिया.

1928 में आर्य-समाज के सभापति ने महात्मा गांधी को चिट्ठी लिखी कि शिमला की बाघात रियासत में आर्य समाज ने कोली जाति के लोगों को जनेऊ पहनाने का अभियान चलाया, जिससे ऊंची जाति के हिन्दू चिढ़ गए और इसका विरोध किया. 6 जनवरी, 1928 को इस रियासत के महाराजा ने स्वयं इस मामले की सुनवाई की और पुराने रीति-रिवाज को बनाए रखने के नाम पर 10 कोलियों को छह महीने की कैद और ऊपर से दो-दो सौ रुपये जुर्माने की सजा दे दी. न तो कोलियों का पक्ष सुना गया और न आर्य समाज को ही उनका बचाव करने की अनुमति दी गई. खबर थी कि जनेऊ उतारने के लिए जेल में भी उन पर जुल्म किया जा रहा था.

गांधी यह सब पढ़कर सन्न रह गए. उन्होंने ‘यंग इंडिया’ में जो इस विषय पर लेख लिखा उसका शीर्षक था- ‘क्या यह सच हो सकता है?’ हालांकि गांधी तब तक इसके लिए मानसिक रूप से तैयार नहीं हो सके थे कि वे जनेऊ मात्र की प्रचलित पुरोहितवादी दुर्व्यवस्था का पूरी तरह धर्मविरुद्ध ठहरा सकें. उन्होंने इस लेख में यह साबित करने की कोशिश की कि खेतिहर होने के नाते कोली समुदाय वैश्य वर्ण के अंतर्गत आते हैं और इसलिए उनके लिए जनेऊ पहनना अनुचित नहीं था. हालांकि उन्होंने यह अवश्य लिखा कि ‘अगर मान भी लें कि उन्हें जनेऊ पहनने का धार्मक अधिकार प्राप्त नहीं है, तो भी मैं यह सुनने को कभी तैयार नहीं था कि किसी रियासत में कानून की दृष्टि से जनेऊ पहनना दंडनीय माना जाएगा. ...अगर सजा और न्याय के इस ढकोसले के बारे में जो कुछ कहा गया है वह सच हो, तो मुझे यह जानकर कोई ताज्जुब नहीं होगा कि उनके शरीर पर से जनेऊ जबरन उतार लिए गए हैं.’

हालांकि यह पूरा दौर मंदिर प्रवेश आंदोलनों और पेरियार तथा डॉ अंबेडकर के विचारों के तेजी से फैलने का दौर भी था. इसलिए संभवतः गांधी लंबे समय तक इस मुद्दे को टाल भी नहीं सकते थे. तभी रंगून के एक सेठ सोनीराम पोद्दार, जो कि दलितोद्धार के कार्य से जुड़े थे, ने गांधी को जनेऊ के संबंध में एक पत्र लिखा. वह पत्र संभवतः अब उपलब्ध नहीं है, लेकिन इसके जवाब में गांधी ने जो लिखा उसके आधार पर यह पता चलता है कि किसी गौरीप्रसाद नाम के दलित का यज्ञोपवीत कराए जाने का अनुरोध किया गया था. यह एक विचित्र स्थिति थी. जहां दलितों के एक वर्ग में जनेऊ के प्रति घृणा और विरोध उत्पन्न हुआ था, वहीं सवर्णेतर जातियों के दूसरे वर्ग में इसके प्रति आकर्षण भी उत्पन्न हो गया था. इसी जनेऊ के आधार पर आर्य बनाम अनार्य आंदोलन भी जोर पकड़ रहा था.

इसलिए गांधी की कोशिश थी कि सांप भी मर जाए और लाठी भी न टूटे. यानी जनेऊ के आधार पर आर्य बनाम अनार्य का संघर्ष भी एकीकरण में बदल जाए और फिर जनेऊ के प्रति न केवल कथित आर्यों बल्कि सवर्णेतर जातियों के एक हिस्से में बढ़ता व्यामोह भी समाप्त हो जाए. इसलिए उन्होंने एक मध्यमार्गी सूत्र ढूंढ़ निकाला. 21 जुलाई, 1932 को सोनीरामजी को उनके जनेऊ वाले पत्र के जवाब में गांधीजी ने लिखा-

‘मैंने जनेऊ के एकाधिक गूढ़ अर्थ सुने हैं. लेकिन ये सब अनुमान मात्र हैं. जनेऊ का प्रयोग जब आरंभ हुआ तब उस समय ये विचार मौजूद थे, मैं ऐसा नहीं मानता. अपने को आर्य कहने वाले लोगों ने आर्य-अनार्य का भेद करने के लिए जनेऊ को अपनाया. यह उस समय हुआ होगा जब रुई से कपड़ा बनाने की कला ईजाद हुई होगी. उस समय करोड़ों लोग केवल धोती पहनते थे, जैसा कि आज भी पहनते हैं, और शरीर का शेष भाग अनढका रहता था. किसी भी सूरत में वे लोग तो ऐसा करते ही थे जिन्हें अनार्य माना जाता है. इसलिए आर्यों ने कताई कला को बढ़ावा देने और उसमें सुधार करने के लिए और यह सिद्ध करने के लिए कि यह एक पुनीत काम है, जनेऊ धारण करना शुरू किया. अपनी इस बात के समर्थन में मेरे पास कोई ऐतिहासिक प्रमाण नहीं है. यह मेरा अनुमान मात्र है...’

‘...आज आर्यों और अनार्यों के बीच कोई भेद नहीं है, और होना भी नहीं चाहिए. हजारों वर्ष पहले दोनों जातियों के खून मिल गए थे और भारत के वर्तमान निवासी उसी मिश्रित रक्त की उत्पत्ति हैं. यदि जनेऊ धारण ही किया जाता है तो सभी जातियों को उसे धारण करने का अधिकार होना चाहिए. मुझे इस आंदोलन में कोई सार नजर नहीं आता. यही कारण है कि जनेऊ का प्रयोग छोड़ने के बाद मैंने उसे पुनः पहनने की कोशिश नहीं की, और न वैसा करने की मेरी इच्छा ही है. और जहां तक जनेऊ पहनने के रिवाज के कारण ऊंच-नीच का भेद उत्पन्न होने की संभावना है, वहां तक उसे छोड़ ही देना चाहिए.’

चरखे पर खादी कातने वाले गांधी कताई के प्रचार के लिए जनेऊ के बारे में यह अनोखा सिद्धांत ले तो आए, लेकिन उसका कोई लेवाल नहीं हुआ. न तो बाभनों और सवर्णों ने इसे स्वीकारा, न ही अन्य जातियों ने. हालांकि गांधी ने इसी बहाने किसी के भी लिए जनेऊ की व्यर्थता जरूर बता दी थी. वे आधुनिक युग में इसे एक ढकोसला और भेद-भाव बढ़ानेवाला ही मानते रहे. कम से कम गांधी नामधारी आज के लोगों को जनेऊ पर महात्मा गांधी के विचार तो अवश्य ही जान लेने चाहिए. जान लेते तो ऐसी जगहंसाई की नौबत नहीं आती.