राष्ट्रीय अपराध रिकॉर्ड ब्यूरो (एनसीआरबी) के ताजा आंकड़े इस धारणा को ध्वस्त करते हुए दिखाई दे रहे हैं कि शहरी क्षेत्रों में दलितों पर अत्याचार नहीं होता. 2016 के इन आंकड़ों में पहली बार देश के 19 बड़े शहरों में दलितों के खिलाफ हिंसा के मामलों को अलग से दर्ज किया गया है. ये आंकड़े बताते हैं कि शहरी क्षेत्रों में भी संबंधित ग्रामीण क्षेत्रों की तर्ज पर दलितों के खिलाफ अपराध हो रहे हैं. जैसे इस सूची में लखनऊ और पटना सबसे ऊपर हैं तो वहीं राज्यों की सूची में उत्तर प्रदेश और बिहार पहले और दूसरे स्थान पर हैं.

यह माना जाता रहा है कि शहरी भारत में दलितों के साथ कम से कम भेदभाव होता है और उन पर अत्याचार की घटनाएं भी कम ही होती हैं. इसके पक्ष में अक्सर यह तर्क दिया जाता है कि शहरी क्षेत्रों में तमाम समुदाय-जातियों के लोग आते हैं और यहां के माहौल में काफी हद तक आपस में घुलमिल जाते हैं. यहां नौकरी-पेशे के मौके होते हैं और बाहर से आई ज्यादातर आबादी का मकसद यहां आजीविका या धन कमाना होता है. इस वजह से शहरों में जाति या समुदाय के ऊपर वर्ग निर्मित हो जाते हैं. यही तर्क आगे कहता है कि समाज में वर्ग बनना जातिगत पूर्वग्रह-दुराग्रह और हिंसा में कमी लाने में मददगार साबित होता है.

बाबा साहेब आंबेडकर भी मानते थे कि शहरीकरण दलितों का दमन खत्म कर सकता है. हालांकि एनसीआरबी के आंकड़े बता रहे हैं कि शहर भी अब ग्रामीण समाज की मान्यताओं और सामाजिक शक्ति समीकरणों से प्रभावित हो रहे हैं, जबकि इन्हें ऐसे स्वायत्त सामाजिक या राजनीतिक माहौल का वाहक बनना था जहां दलितों को बिना किसी दबाव के आगे बढ़ने का मौका मिलता. इस बात में कोई दोराय नहीं कि शहर ज्यादा से ज्यादा आर्थिक अवसर पैदा करते हैं, लेकिन यह जरूरी नहीं है कि इनसे सामाजिक भेदभाव कम या खत्म हो रहा हो. शहरों में दलितों के खिलाफ हिंसा की तात्कालिक वजहें ग्रामीण इलाकों से अलग हो सकती हैं, लेकिन यह बिलकुल साफ है कि ये भी आज गांवों की तरह ही दलितों को गैर-बराबरी का माहौल दे रहे हैं.

आजादी के इन 70 सालों के बाद भी हर साल दलितों के खिलाफ हिंसा के मामले बढ़ ही रहे हैं और यह दिखाता है कि भारतीय राजनीति कहीं चूक गई है. देश में एक प्रगतिशील संविधान मौजूद है और दलितों के सशक्तिकरण के लिए कई कानून भी बने हैं, इसके बावजूद जातिगत भेदभाव खत्म नहीं हो पाया है. वहीं इसके उलट दलित समुदायों का राजनीतिकरण होने और इनके पहले के मुकाबले सशक्त होने से ऊंची जातियां इनके खिलाफ एकजुट हो रही हैं, आक्रामक प्रतिक्रियाएं दे रही हैं. ये जातियां अपने सामाजिक, राजनीतिक और आर्थिक विशेषाधिकार छोड़ना नहीं चाहतीं. वहीं इस जातिगत टकराव से निपटने में मुख्यधारा की राजनीति सक्षम नहीं दिख रही और यही वजह है कि हमें देश में नए सामाजिक आंदोलन और समूह उभरते दिख रहे हैं.

गुजरात चुनाव में भी इस उथल-पुथल के संकेत देखे जा सकते हैं. यहां की राजनीति में अब तक भाजपा और कांग्रेस का दबदबा रहा है, लेकिन आज दोनों पार्टियों को जिग्नेश मेवाणी जैसे नौजवान नेता के उभार को स्वीकार करना पड़ रहा है. मेवाणी सामाजिक आंदोलन से निकले नेता हैं और अब वे चुनावी राजनीति में आ चुके हैं. वहीं उत्तर प्रदेश में दलित राजनीति को एक नए अंदाज में बढ़ाने के लिए भीम आर्मी का उदय हुआ है. भीम आर्मी जमीनी स्तर पर आंदोलन करते हुए उभरी है और दलित जातियों के वर्चस्व को चुनौती देने वाले इस संगठन का बसपा से कोई नाता नहीं है.

अधिकार, अस्मिता और आत्मसम्मान के इस उभार की प्रतिक्रिया में हिंसा भी बढ़ी है. हालांकि आज दलितों के खिलाफ हिंसा के ज्यादा से ज्यादा मामले दर्ज हो रहे हैं और वहीं इसके साथ शहरी और ग्रामीण भारत में प्रतिरोध के आंदोलन नए-नए स्वरूपों में सामने आ रहे हैं. (स्रोत)