पिछले हफ़्ते गुजरात चुनाव को लेकर आयोजित एक रैली में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने पूर्व प्रधानमंत्री मोरारजी देसाई को लेकर एक बड़ा दावा किया. नरेंद्र मोदी ने कहा कि 1969 में बैंकों का राष्ट्रीयकरण किया जाना एक ड्रामा था जिसे तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी ने मोरारजी देसाई की बर्ख़ास्तगी पर पर्दा डालने के लिए रचा था. मोरारजी देसाई के बहाने गुजराती अस्मिता का ज़िक्र करते हुए मोदी ने कहा, ‘मोरारजी देसाई, सूरत के रहने वाले गुजराती को इंदिरा गांधी ने रातोंरात वित्त मंत्री के तौर पर बर्ख़ास्त कर दिया. बर्ख़ास्तगी के बाद देसाई ने कहा था कि उन्हें सब्ज़ी की तरह फेंक दिया गया.’

शायद प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी यह संदेश देना चाहते थे कि जिस तरह मोरारजी से वित्त मंत्रालय लिया गया उससे इंदिरा गांधी और उनकी सरकार के लिए कोई बड़ा राजनीतिक संकट खड़ा हो जाता, इसलिए उन्होंने बैंकों के राष्ट्रीयकरण की घोषणा कर दी ताकि लोगों का ध्यान बंट जाए. सवाल उठता है कि क्या यह सच है?

इस सवाल के जवाब के लिए पहले उस समय की परिस्थितियों को समझना होगा. बैंकों के राष्ट्रीयकरण को लेकर इंदिरा गांधी सरकार में पहले से बहस से चल रही थी. इस पर दो धड़े बन गए थे. एक इसका समर्थक था तो दूसरा विरोधी. इसलिए बीच का रास्ता निकाला गया. इसे सामाजिक नियंत्रण नीति यानी सोशल कंट्रोल पॉलिसी कहा गया. इसके तहत बैंकों के निदेशक मंडल (बोर्ड ऑफ़ डायरेक्टर्स) का फिर से गठन होना था और इस तरह से होना था कि उनका नियंत्रण उद्योग जगत से बाहर के लोगों के हाथ में हो. यानी तब तक आम तौर पर औद्योगिक घरानों के नियंत्रण में रहे बैंकों में सरकार का दखल बढ़ना था. लेकिन फिर इंदिरा गांधी को लगा कि बीच के इस रास्ते में टकराव होता रहेगा इसलिए उन्होंने बैंकों का पूरी तरह राष्ट्रीयकरण करने का फ़ैसला किया.

लेकिन वित्त मंत्री और उप-प्रधानमंत्री मोरारजी देसाई इसके ख़िलाफ़ थे. 10 जुलाई, 1969 को उन्होंने इंदिरा गांधी को एक नोट जारी किया जिसमें उन्होंने लिखा, ‘हाल के अनुभव से नहीं लगता कि बड़े बैंकों को सरकार के अधिकार में लिए जाने की ज़रूरत है. सामाजिक नियंत्रण की नीति के तहत बैंकों से देशहित का वह काम नहीं कराया जा सकता जो स्टेट बैंक कर रहा है, ऐसा मानने की कोई वजह नहीं है.’ मोरारजी देसाई का कहना था कि केवल राष्ट्रीयकरण से बैंकों के लिए ज़्यादा संसाधन उपलब्ध नहीं होंगे.

लेकिन मोरारजी देसाई की बात को इंदिरा गांधी ने नहीं माना. जानकारों के मुताबिक अपने राजनीतिक हितों के लिए उन्हें बैंकों के राष्ट्रीयकरण की घोषणा करनी ही थी. इससे पार्टी और देश पर कमजोर पड़ रही उनकी पकड़ मजबूत होती जो कि बाद में हुआ भी. 19 जुलाई, 1969 की आधी रात को देश के 14 व्यावसायिक बैंकों का राष्ट्रीयकरण हो गया.

अब बात मोरारजी देसाई के कैबिनेट से जाने की. प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने कहा कि इंदिरा गांधी ने मोरराजी देसाई को बर्ख़ास्त किया था और उनकी बर्ख़ास्तगी पर पर्दा डालने के लिए राष्ट्रीयकरण का ड्रामा रचा गया. लेकिन मोरारजी देसाई के ही शब्दों में कहें तो इंदिरा ने ‘एक अद्भुत प्रस्ताव और चतुराई भरे क़दम’ से उन्हें बर्ख़ास्त भी नहीं किया और कैबिनेट छोड़ने पर मजबूर भी कर दिया.

इंदिरा गांधी ने बैंकों के राष्ट्रीयकरण की घोषणा से पहले ही मोरारजी देसाई से वित्त मंत्रालय ले लिया था. लेकिन उन्होंने मोरारजी को कैबिनेट से नहीं निकाला था. इंदिरा गांधी ने कहा था कि वे वित्त मंत्रालय का अनुभव लेना चाहती हैं इसलिए उन्होंने ऐसा किया. इंदिरा गांधी का कहना था मोरारजी उप-प्रधानमंत्री बने रहें और कोई दूसरा मंत्रालय ले लें. लेकिन मोरारजी देसाई ने इससे इनकार कर दिया. उन्होंने इंदिरा गांधी को पत्र लिखकर कहा, ‘आप वित्त मंत्रालय चाहती थीं तो मुझसे बात कर सकती थीं. आप जानती हैं कि मैंने कभी भी किसी मुद्दे को लेकर आपसे अनुचित तरीक़े से बात नहीं की. लेकिन आपने मेरे साथ जो व्यवहार किया वैसा कोई किसी क्लर्क से भी नहीं करेगा.’ इसके बाद मोरारजी ने मंत्रिमंडल से इस्तीफा दे दिया.

बहुत से जानकार मानते हैं कि मोरारजी देसाई इस स्थिति में नहीं थे कि उन्हें अचानक हटाए जाने से कोई बड़ा विवाद खड़ा हो जाता जिसे पैदा होने से पहले ही इंदिरा गांधी ने बैंकों के राष्ट्रीयकरण के ज़रिए रोक दिया. यह फ़ैसला वे पहले ही ले चुकी थीं. इसका उन्हें खूब राजनीतिक फायदा हुआ. इसकी वजह यह थी कि बैंकों के राष्ट्रीयकरण से किसानों और छोटे-मंझोले कारोबारियों को कर्ज मिलना आसान हो गया. संदेश गया कि बैंकों के दरवाजे अब गरीबों के लिए भी खुल गए हैं. इंदिरा गांधी की लोकप्रियता बहुत बढ़ गई थी. हवा के आसार भांपते हुए उन्होंने 1972 में होने वाला आम चुनाव 1971 में करवाया और पहले से ज्यादा सीटों के साथ सत्ता में लौटीं.

मोरारजी देसाई के राजनीतिक करियर में दो मौक़े आए थे जब उनका नाम प्रधानमंत्री पद के लिए सामने आया. 1964 में जवाहरलाल नेहरू और बाद में लाल बहादुर शास्त्री के निधन के बाद मोरारजी देसाई का नाम प्रधानमंत्री पद के लिए चर्चा में आया था. लेकिन दोनों ही बार वे असफल रहे. पहले उनकी जगह शास्त्री को प्रधानमंत्री बना दिया गया और बाद में इंदिरा गांधी ने उन्हें पछाड़ दिया. बताया जाता है कि मोरारजी, इंदिरा गांधी को इस पद के लिए उपयुक्त उम्मीदवार नहीं मानते थे और वे इंदिरा के लिए मुश्किलें पैदा करते रहे. इन दोनों नेताओं के बीच अक्सर मतभेद रहते थे. जानकार बताते हैं कि इंदिरा ने इसके लिए मोरारजी को माफ़ नहीं किया. मोरारजी ने बैंकों के राष्ट्रीयकरण का विरोध किया तो इंदिरा गांधी को उन्हें किनारे लगाने का एक मौक़ा मिल गया.