कल नामांकन का पर्चा दाखिल करने के साथ ही राहुल गांधी का कांग्रेस अध्यक्ष बनना निश्चित हो चुका है. पार्टी के नेता इसे कांग्रेस के लिए एक ‘नया युग’ बता रहे हैं. हालांकि मां से बेटे को अध्यक्ष पद मिलने का यह पीढ़ीगत बदलाव भारत की इस सबसे पुरानी पार्टी में वंशानुगत उत्तराधिकार मिलने जैसा ही है.

बतौर उपाध्यक्ष अगर राहुल गांधी के कार्यकाल को देखें तो उनके खाते में कोई खास सफलता दर्ज नहीं है. हां, लेकिन नरेंद्र मोदी को राष्ट्रीय फलक पर स्थापित करने वाले गुजरात में राहुल गांधी को अचानक वह राजनीतिक प्राणवायु मिलती दिख रही है जिसकी उन्हें सख्त जरूरत थी. वे यहां भाजपा पर तीखे हमले कर रहे हैं और उनकी रैलियों में भारी भीड़ उमड़ रही है. हैरत की बात नहीं कि गुजरात में इस जोशीले अभियान के चलते राहुल गांधी के अध्यक्ष बनने के ठीक पहले कांग्रेस के नेताओं-कार्यकर्ताओं में भारी उत्साह है. लेकिन इसके साथ यह भी सही है कि कांग्रेस और खुद राहुल गांधी के सामने इस समय चुनौतियों का अंबार लगा हुआ है.

राहुल गांधी उत्तर प्रदेश के 2012 और 2017 के अपने अनुभव से बहुत अच्छे से जानते होंगे कि रैलियों में आने वाली भीड़ पार्टी के लिए वोट बढ़ाने का भी काम करे यह जरूरी नहीं. हालांकि इस कांग्रेस नेता ने समय-समय पर भाजपा को परेशान जरूर किया है. ‘सूट-बूट की सरकार’ से लेकर ‘गब्बर सिंह टैक्स’ तक के नारे उछालकर वे कई बार भाजपा में तिलमिलाहट पैदा कर चुके हैं. लेकिन यह सब ज्यादा कारगर साबित नहीं हो सकता. जनता किसानों के लोन माफ करने और आरक्षण जैसे वादों से ऊब चुकी है. अब राहुल गांधी कांग्रेस को उबारना चाहते हैं तो उन्हें देश को आगे बढ़ाने का एक अलग और स्पष्ट खाका पेश करना होगा.

भाजपा इस समय अपने एजेंडे में शामिल सांस्कृतिक रूप से रूढ़िवादी कार्यक्रमों-योजनाओं की तरफ ज्यादा ध्यान दे रही है और कांग्रेस के लिए यही वो मौका है जब वह युवाओं और भारतीयों के उस तबके को आकर्षित कर सकती है जो कुछ नया करना-बनना चाहता है. राहुल गांधी के नेतृत्व की असली परीक्षा यहीं होगी कि वे इस मौके को समझ पाते हैं और भुना पाते हैं कि नहीं.

साथ ही साथ कांग्रेस को अपने जमीनी कार्यकर्ताओं, जो बीते मुश्किल वक्त में भी पार्टी के साथ रहे हैं, में नई जान फूंकने की जरूरत है. बीते समय में इनके बीच यह विश्वास मजबूत हुआ है कि पार्टी सिर्फ नेताओं की है जहां आम कार्यकर्ताओं के लिए आगे बढ़ने के बहुत कम मौके हैं. राहुल गांधी की चुनौती सिर्फ इतनी ही नहीं है. कांग्रेस के सामने मोदी और अमित शाह की अगुवाई में जो नई भाजपा है, वो एक ऐसी तगड़ी और निर्मम राजनीतिक प्रतिद्वंदी है जिसका सामना न कभी नेहरू ने किया था, न इंदिरा गांधी ने और न ही सोनिया गांधी ने.

अगले साल कई महत्वपूर्ण राज्यों में विधानसभा चुनाव होने हैं और 2019 में आम चुनाव. इससे पहले राहुल गांधी के हाथ में कांग्रेस की कमान आने से पार्टी में बड़े स्तर के मंथन और बदलावों की पृष्ठभूमि तैयार हो चुकी है. राहुल गांधी के पास अब पूरी पार्टी की जिम्मेदारी है और उनके लिए असफलताओं या गलतियों की जिम्मेदारी किसी और पर डालने का आगे कोई मौका नहीं होगा. इसमें कोई दोराय नहीं कि कांग्रेस के नए अध्यक्ष के सामने बहुत बड़ी चुनौतियां हैं और राहुल गांधी को इनसे पार पाना ही होगा. अगर वे ऐसा करने में असफल होते हैं तो फिर कांग्रेस को नए उत्तराधिकारी के लिए गांधी परिवार से अलग कोई दूसरा विकल्प तलाशना होगा. (स्रोत)