इस बार का गुजरात विधानसभा चुनाव राजनीतिक तौर पर बेहद अहम माना जा रहा है. प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का गृह राज्य होने की वजह से यह चुनाव उनकी प्रतिष्ठा से जुड़ गया है. ऐसी ही स्थिति भारतीय जनता पार्टी के राष्ट्रीय अध्यक्ष अमित शाह के लिए है. वे भी गुजरात के हैं और यह चुनाव उनके लिए भी प्रतिष्ठा का विषय है. मौजूदा कांग्रेस उपाध्यक्ष और भावी कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गांधी भी जिस तरह से गुजरात चुनावों में दिलचस्पी ले रहे हैं, उससे यही संदेश जा रहा है कि इन चुनावों में कांग्रेस की कामयाबी या नाकामयाबी को उनसे भी जोड़कर देखा जाएगा.

लेकिन सबसे अधिक अगर किसी की प्रतिष्ठा से गुजरात विधानसभा चुनाव जुड़े हुए हैं तो वे हैं प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी. गुजरात में जीत, जीत का अंतर या फिर हार, इन तीनों परिस्थितियों का असर उनकी राजनीति पर पड़ना तय है. चुनावों के नतीजे चाहे जैसे भी हों, उन्हें सीधे-सीधे नरेंद्र मोदी से जोड़कर देखा जाएगा. तो सवाल उठता है कि अलग-अलग चुनाव परिणामों का असर नरेंद्र मोदी पर किस तरह पड़ सकता है!

अगर भाजपा बड़ी जीत हासिल करती है

भाजपा अध्यक्ष अमित शाह लगातार यह दोहरा रहे हैं कि पार्टी गुजरात में विधानसभा की 182 में से 150 से अधिक सीटों पर जीत हासिल करेगी. हालांकि, नरेंद्र मोदी ने अब तक यह बात कहीं नहीं कही है. जानकारों के मुताबिक इसके बावजूद अगर अमित शाह का यह लक्ष्य पूरा हो जाता है तो भी इसका श्रेय खुद अमित शाह और पूरी पार्टी प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और उनकी अगुवाई वाली केंद्र सरकार की नीतियों को ही देंगे. प्रदेश के मुख्यमंत्री विजय रूपाणी को इसका जरा भी श्रेय मिलना असंभव है.

ऐसे नतीजे का सीधा मतलब यह होगा कि सरकार और पार्टी पर नरेंद्र मोदी और अमित शाह का दबदबा कायम रहेगा. भाजपा के अंदर जो लोग पार्टी और सरकार के कामकाज को लेकर थोड़ा आलोचनात्मक रुख अपनाने की कोशिश कर रहे हैं, उन्हें इसके बाद अगर राजनीति करनी है तो रक्षात्मक मुद्रा अपनाने को मजबूर होना पड़ेगा. इस तरह के चुनावी नतीजे से पार्टी के मामलों में अमित शाह और मजबूत होंगे और वे अपने ढंग से चुनावों का प्रबंधन करने के मामले में नरेंद्र मोदी से और छूट लेंगे. पूरी भाजपा नरेंद्र मोदी सरकार की नीतियों का प्रचार-प्रसार पूरे देश में करने में जुट जाएगी. कुल मिलाकर देखा जाए तो नरेंद्र मोदी अभी जितने हैं उससे भी ताकतवर बनकर उभरेंगे.

अगर भाजपा 100 सीटों के आसपास सिमट जाती है

2012 के विधानसभा चुनावों में भाजपा को 115 सीटें मिली थीं. इस बार भले ही अमित शाह 150 से अधिक सीटें मिलने का दावा कर रहे हों लेकिन कुछ चुनावी सर्वेक्षणों और ज्यादातर राजनीतिक जानकारों के आकलन में भाजपा को 100 के आसपास सीटें मिलने का अनुमान लगाया जा रहा है. अगर यह स्थिति बनती है तो भी प्रदेश में भाजपा की सरकार बन जाएगी. क्योंकि उसे सरकार बनाने के लिए सिर्फ 92 विधायक ही चाहिए.

अगर विधानसभा चुनावों के ऐसे नतीजे आते हैं तो इसकी व्याख्या अलग-अलग लोग अलग-अलग तरीके से करने की कोशिश करेंगे. भाजपा में नरेंद्र मोदी और अमित शाह को मजबूत करने वाला खेमा इसे यह कहकर प्रचारित कर सकता है कि इतने विरोध के बावजूद गुजरात में भाजपा सरकार इसलिए बच गई क्योंकि केंद्र की नरेंद्र मोदी सरकार ने अच्छा काम किया और अमित शाह से बहुत अच्छे ढंग से चुनाव प्रबंधन किया. भाजपा की राजनीति को समझने वाले लोगों का मानना है कि ऐसे नतीजों की हालत में नरेंद्र मोदी की नजर में अमित शाह की स्थिति कमजोर तो होगी, लेकिन उनके जैसा विश्वस्त कोई और न होने की स्थिति में पार्टी चलाने के लिए उनकी जरूरत बनी रहेगी.

ऐसे नतीजों का प्रचार विपक्ष नरेंद्र मोदी की बढ़ती अलोकप्रियता और उनकी नीतियों को खारिज किए जाने के तौर पर करेगा. वह इस बात की पूरी कोशिश करेगा कि इस नतीजे को वह आम लोगों के मन में नरेंद्र मोदी की हार के तौर पर स्थापित करे. 2019 के लोकसभा चुनावों में नरेंद्र मोदी और भाजपा का रथ रोकने के लिए वह दूसरे राजनीतिक दलों और समूहों को साथ लेकर एक मजबूत विकल्प पेश करने की कोशिश भी करेगा.

और अगर भाजपा चुनाव हार गई

हालांकि, गुजरात से जो सूचनाएं मिल रही हैं, उनके आधार पर वहां भाजपा का हारना बेहद मुश्किल लग रहा है. लेकिन चुनावी राजनीति में किसी भी स्थिति को सिरे से खारिज नहीं किया जा सकता. चुनाव का दिन पास आते-आते कांग्रेस लगभग बराबरी की टक्कर में दिखने भी लगी है. अगर किसी वजह से गुजरात में भाजपा हार जाती है और वहां कांग्रेस की सरकार बन जाती है तो इसका सबसे नकारात्मक असर नरेंद्र मोदी पर ही पड़ेगा.

सबसे पहली बात तो यह कि विपक्ष इसे नरेंद्र मोदी की हार के तौर पर पेश करेगा. कांग्रेस और दूसरे विपक्षी दल इसे मोदी सरकार की नीतियों की नाकामी के तौर पर भी लोगों के बीच स्थापित करने की कोशिश करेंगे. वहीं गुजरात के बाहर के आम लोगों के बीच भी यह संदेश जाएगा कि अगर नरेंद्र मोदी को खुद उनके गृह राज्य के लोग खारिज कर रहे हैं तो फिर उनकी नीतियों में जरूर कोई न कोई खामी है. कुल मिलाकर लोगों में भी नरेंद्र मोदी और उनकी सरकार की नीतियों को लेकर अविश्वास का माहौल बन सकता है.

ऐसे नतीजे आने पर भाजपा के अंदर भी नरेंद्र मोदी और अमित शाह के एकाधिकार को चुनौती मिलने की शुरुआत हो सकती है. अब तक पार्टी के जो नेता दबी जुबान में इन दोनों की कार्यशैली के प्रति आलोचनात्मक रुख अपनाए हुए हैं, वे मुखर हो सकते हैं. भाजपा के एक नेता कहते हैं, ‘नरेंद्र मोदी की सत्ता को तो शायद उतनी चुनौती नहीं मिलेगी, लेकिन अमित शाह को पार्टी के अंदर आंतरिक चुनौतियों का सामना करना पड़ सकता है. कुल मिलाकर एक ऐसी स्थिति बन सकती है जिसमें मोदी-शाह के चुनाव लड़ने के माॅडल पर सवाल उठने लगें. दूसरे दलों के लोगों को चुनाव लड़ाने और अपने पुराने कार्यकर्ताओं की उपेक्षा वाले इस मॉडल का पार्टी के अंदर दबी जुबान में ही सही लेकिन काफी समय से विरोध हो रहा है.

गुजरात चुनाव हारने के बाद यह विरोध मुखर हो सकता है. इसे आधार बनाकर अमित शाह को चुनौती देने की कोशिश होगी. भाजपा के इस नेता की मानें तो भले ही अमित शाह भाजपा के अध्यक्ष बने रहें (उनका कार्यकाल 2019 में खत्म हो रहा है) लेकिन उनकी ताकत जरूर कम होगी. अगर वे कमजोर होंगे तो जाहिर है कि नरेंद्र मोदी की ताकत भी कम होगी.