श्री श्री रविशंकर राम मंदिर पर समझौता करवाने निकले थे, लेकिन ऐसा क्या हुआ कि आर्ट ऑफ लिविंग के ताकतवर और प्रतिष्ठित संस्थापक की यह कोशिश पूरी तरह असफल हो गई. सुनी-सुनाई से कुछ ज्यादा है कि रविशंकर को सरकार और संघ दोनों के ही शीर्ष नेतृत्व से आश्वासन मिला था कि वे इस अभियान में उनके साथ हैं. लेकिन जब तक श्री श्री अयोध्या पहुंचते सरकार अपने कदम पीछे खींच चुकी थी और संघ से जुड़े लोग साधु-संतों के दबाव के आगे झुकने को मजबूर हो गए थे. आखिरकार श्री श्री रविशंकर को सिर्फ मुलाकात की रस्म पूरी करके ही वापस लौटना पड़ा.

संघ के एक बड़े नेता के करीबी की मानें तो निर्मोही अखाड़ा से जुड़े साधु किसी और संत, महंत या फिर धर्मगुरु को सुनने को भी तैयार नहीं हैं. उसी तरह सुन्नी वक्फ बोर्ड और मुस्लिम पर्सनल बोर्ड से जुड़े मुस्लिम नेता भी किसी भी तरह की मध्यस्थता की बात सुनकर ही कन्नी काटने लगते हैं. ऐसी हालत में श्री श्री दिल्ली से लखनऊ और अयोध्या तक गये जरूर लेकिन समझौते की तरफ एक कदम भी नहीं बढ़ा पाए.

उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ की बातचीत के जरिये राम मंदिर निर्माण का रास्ता निकालने में सबसे ज्यादा रुचि थी. पिछले छह महीने में उन्होंने करीब पांच-छह बार अलग-अलग लोगों के जरिए बातचीत करने की कोशिश भी की. लेकिन हर बार न तो साधु-संत समझौता करना चाहते थे और न ही मुस्लिम समाज. आखिरकार योगी ने भी एक इंटरव्यू में कह ही दिया कि अब लगता है कि बातचीत नहीं हो सकती और जो होगा अदालत में ही होगा. इसके बाद से माना जा रहा था कि राम मंदिर पर बातचीत की कोई सार्थक कोशिश अब निकट भविष्य में नहीं होने वाली.

सुनी-सुनाई है कि श्री श्री रविशंकर से भी अब बात हो चुकी है और वे भी अब मान चुके हैं कि बातचीत का रास्ता बंद हो चुका है. इसलिए अब वे भी दोबारा अयोध्या की यात्रा पर नहीं जाएंगे. रविशंकर को पहले भी भाजपा और संघ के कुछ नेताओं ने समझाया था लेकिन वे नहीं माने. ऐसे में सरकार और संघ ने एक बार फिर साधु-संतों और मुस्लिम समाज का मन पढ़ने की कोशिश की. योगी आदित्यनाथ के एक करीबी अफसर के मुताबिक उन्होंने भी रविशंकर को सरकार की कोशिशों के बारे में बताया था और यह भी कहा था कि अब समझौते की उम्मीद न के बराबर है.

राम मंदिर निर्माण से जुड़े भाजपा के कुछ नेता मानते हैं कि बातचीत का रास्ता लंबा है और 2019 के चुनाव से पहले उत्तर प्रदेश में अपनी स्थिति मजबूत करने के लिए भाजपा को इस पर कुछ न कुछ तो करना ही है. भाजपा के सांसद सुब्रहमण्यम स्वामी तो अगली दीवाली की तारीख भी तय कर चुके हैं. संघ प्रमुख मोहन भागवत ने भी घोषणा कर दी है कि मंदिर वहीं मनाएंगे और उन्हीं पत्थरों से बनाएंगे जो सालों से इकट्ठा किये जा रहे हैं और वही लोग बनाएंगे जो 25 साल से इस आंदोलन से जुड़े हैं.

भाजपा के एक बड़े नेता मोहन भागवत के बयान की व्याख्या कुछ इस तरह से करते हैं – ‘अगर सुप्रीम कोर्ट तेजी से सुनवाई करेगा तो राम मंदिर विवाद पर 2018 में ही फैसला आ सकता है. दिल्ली और लखनऊ में इस बार सरकार भाजपा की है. इसलिए सारी तैयारी पहले से हो चुकी है. पत्थर लाए जा रहे हैं. कार्यशाला में काम चल रहा है. जैसे ही सुप्रीम कोर्ट का फैसला आया वैसे ही मंदिर निर्माण का काम शुरू हो जाएगा... इससे पहले कि कोई नई कानूनी अड़चन आए, मंदिर की पहली ईंट लग चुकी होगी. 2019 के चुनाव का माहौल बनाने के लिए इतना करना बहुत होगा.’