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बीते दिनों जब दिल्ली स्मॉग की चपेट में थी तो डॉक्टरों ने लोगों को घर पर रहने की हिदायत दी थी और बाहर निकलने की सूरत में मास्क लगाने के लिए कहा था. यह वीडियो लोगों की बीड़ी-सिगरेट की लत और धुएं से भरे इस शहर की हालत का एक मजेदार कॉम्बिनेशन दिखाता है. यहां पर मजे-मजे में यह सवाल पूछा जा सकता है कि जिस दिल्ली में एक दिन सांस लेना ही 50 सिगरेट पीने के बराबर है, वहां अगर किसी को सिगरेट की तलब लग जाए तो क्या उसे उसकी इक्यावनवीं सिगरेट गिना जाना चाहिए!

यह वीडियो एक फिक्शनल फिल्म है जिसमें एक लड़का प्रदूषण होने की वजह से अपने चेहरे से मास्क नहीं उतार सकता और मास्क न उतार पाने के कारण अपनी सिगरेट की तलब शांत नहीं कर पा रहा है. वीडियो में उसकी इस समस्या का जो हल दिखाया गया है, उसे देखकर आप चाहकर भी अपनी हंसी नहीं रोक सकते. यह वीडियो मजेदार होने के साथ-साथ उस फितरत पर तंज भी है, जिससे पता चलता है कि कितने भी बुरे हालात हो जाएं हम नहीं सुधरने वाले!

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एक अव्यवस्थित सी दिनचर्या जिसमें एक ही काम रोज करना है और बार-बार करना है, यानी कपड़े धोना और सुखाना, फिर धोना और सुखाना और यही करते रहना है. इसमें देखने लायक क्या हो सकता है, भला! लेकिन कलाकार की नजर शोर में से भी सुर ढूंढ़ ही लेती है. एक गुमनाम फिल्ममेकर चिन्मय रावत का वीडियो इसी बात का उदाहरण है.

करीब ढाई मिनट की इस शॉर्ट फिल्म को मुंबई के महालक्ष्मी रेलवे स्टेशन के पास स्थित धोबी घाट पर फिल्माया गया है. यह धोबी घाट विश्व की सबसे बड़ी और खुले आसमान के नीचे बनी लॉन्ड्री है. ब्रिटिश शासन के दौर में इस धोबी घाट का निर्माण हुआ था. करीब 140 साल पुराने इस घाट पर हर दिन 7000 से अधिक लोग कपड़ों को धोते-सुखाते और रंगते हैं, यही उनकी आजीविका का साधन है.

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मशहूर चीनी कंटेम्प्रेरी आर्टिस्ट और एक्टिविस्ट आई वेवे ने अपना पूरा बचपन अपने ही देश के शरणार्थी शिविरों में बिताया है. उनके पिता एक कवि और सक्रिय राजनीतिक कार्यकर्ता थे. चीनी सरकार की लगातार कड़ी आलोचना करने के चलते उन्हें परिवार सहित लेबर कैंप भेज दिया गया था. लेबर कैंप के इन्हीं अनुभवों की बदौलत वेवे के मन में शरणार्थी जीवन को लेकर एक अलग तरह की दिलचस्पी पैदा हुई. हाल ही में उन्होंने ‘ह्यूमन फ्लो’ नाम की एक डॉक्युमेंट्री फिल्म बनाई है. यह डॉक्युमेंट्री दुनियाभर के शरणार्थियों की गंभीर और भयावह स्थितियों को दिखाती है.

द गार्जियन की यह वीडियो रिपोर्ट भयावह परिस्थितियों में जीवन की तस्वीरें दिखाने वाले इस फिल्मकार के अनुभवों को उन्हीं की जुबानी बताती है. वेवे इस फिल्म के लिए 23 देशों के 40 रिफ्यूजी कैम्पों में लगभग 600 लोगों से मिले. इस वीडियो में वे कुछ लोगों से हुई मुलाकात का जिक्र करते दिखते हैं. वेवे बताते हैं कि उन लोगों ने सिर्फ अपना घर ही नहीं, अपना पूरा देश, अपनी पहचान, अपने रिश्तेदार और अपनी संस्कृति तक खो दी है और उन्होंने ऐसी परिस्थितियां देखी हैं जिनकी सामान्य आदमी कल्पना भी नहीं कर सकता. ये बातें सुनकर एहसास होता है कि अपनी इस फिल्म से वेवे शरणार्थी होने का मतलब गहराई से समझा देना चाहते हैं.