क्या मंदिर और मस्जिद तोड़ने वालों का वास्तविक धर्म से कोई वास्ता होता होगा? विभाजन और दंगों की त्रासदी के दौरान यह सवाल गांधी ने बार-बार लोगों से पूछा था. दरअसल इस दौरान जो समुदाय जहां पर बहुसंख्यक था, वह दूसरे समुदाय के धर्मस्थल को तोड़ने या क्षतिग्रस्त करने की कोशिश करता था. यहां तक कि ऐसी कई दरगाहों को भी नुकसान पहुंचाया गया, जिन पर हिंदू और मुसलमान दोनों संप्रदाय के लोगों की एकसमान श्रद्धा होती थी. अक्सर हर समुदाय में थोड़े ही लोग ऐसे होते थे, जो धर्मस्थलों को निशाना बनाने की कोशिश करते थे. लेकिन दूसरों की मौन स्वीकृति से उन्हें शह मिलता था.

संगठित धर्मपंथ को ही वास्तविक धर्म मान लेने वाली संकीर्ण सांप्रदायिकता के साथ यही समस्या है. वह अपने धर्मग्रंथ चुन लेती है. वह अपने धर्मस्थल की खास बनावट और शैली को चुन लेती है. वह अपने-अपने रंग और झंडे चुन लेती है. पोशाक से लेकर रूप-सज्जा के अलग-अलग ढब और टोटके चुन लेती है. ऐतिहासिक और भौगालिक कारणों से अस्तित्व में आई स्वाभाविक सांस्कृतिक भिन्नताओं को भी जब संप्रदायों के स्तर पर रूढ़ बना दिया जाता है, तो उनकी गतिशीलता और विकास की प्रक्रिया बाधित हो जाती है. फिर उनमें मुक्तता और व्यापकता की जगह संकीर्णता आती जाती है. एक-दूसरे के साथ आध्यात्मिक ज्ञान और अनुभव के परस्पर आदान-प्रदान का सिलसिला रुकता जाता है.

और एक दिन राजनीति इसमें चुपके से प्रवेश कर जाती है. सदियों से आपस में भाई-भाई की तरह रहते आए पड़ोसी भी मुंहबोले रिश्तों से नहीं, बल्कि अपने फिरकों और जमातों से पहचाने जाने लगते हैं. आपसी अविश्वास और टकराव की स्थितियां उत्पन्न होती जाती हैं. करते तो सबकुछ धर्म के नाम पर ही हैं, लेकिन असल मानवीय धर्म किसी कोने में पड़ा सुबक रहा होता है. वह परित्यक्त या क्षत-विक्षत धर्मस्थलों के रूप में पंथों और फिरकों के हथौड़ों की चोट सहला रहा होता है. असल मानव धर्म जलते हुए घरों के ताप में दग्ध हो रहा होता है. असहाय बच्चों की चीख और छाती पीटती मांओं की चीत्कार से उसके कान फट रहे होते हैं.

सीरिया से लेकर म्यांमार तक और बशीरहाट से लेकर मुजफ्फरनगर तक हैवानियत अपने नाम, रूप, रंग और फिरके बदल लेती है, लेकिन अपने मूल चरित्र को कायम रखती है. धर्म का एक अर्थ यदि केवल गुणधर्म से लें, तो एक प्रकार की हैवानियत ही उसका गुणधर्म बन जाती है. बामियान से लेकर अयोध्या तक हथौड़ों की वह टंकार अपने उसी गुणधर्म की उद्घोषणा कर रहा होती है. पालमायरा के बेल टेंपल से लेकर इराक के मार-बेहनम मॉनेस्ट्री तक वह तोप के गोलों से विनाशकारिता के नए-नए कीर्तिमान कायम कर रहा होती है. ध्यान से देखिए वह न केवल अपना चारित्रिक गुणधर्म कायम रख रही होती है, बल्कि हर बार उसे नए तरह से परिपुष्ट कर रहा होती है.

इसलिए फ़ैज़ाबाद के बाबरी से पहले चलिए आपको देहली के मेहरौली लिए चलते हैं. दिसंबर, 1992 से सितंबर 1947 में लिए चलते हैं. यहां की कुतुबुद्दीन बख्तियार चिश्ती दरगाह पवित्रता के मामले में अजमेर की दरगाह से कम नहीं मानी जाती थी. इस दरगाह पर केवल मुसलमान ही नहीं, बल्कि हज़ारों हिन्दू और दूसरे गैर-मुस्लिम भी श्रद्धाभाव से आते थे. लेकिन सितंबर, 1947 में इस दरगाह पर ऐसे ही कुछ धर्मध्वजियों का कहर बरस गया. इसके आस-पास रहनेवाले मुसलमान अपने आठ सौ साल पुराने घरों को छोड़ने पर मजबूर हो गए.

इस घटना पर महात्मा गांधी ने कहा था- ‘हिंदुओं, सिखों, वहां के सरकारी अफसरों और हमारी सरकार का फर्ज है कि जल्दी-से-जल्दी पहले की तरह वह दरगाह खोलकर यह कलंक का टीका धो डालें. यह चीज देहली में और देहली के इर्द-गिर्द के मुसलमानों की सभी धार्मिक जगहों पर लागू होती है. वक्त आ गया है कि दोनों तरफ की सरकार सख्ती के साथ अपनी-अपनी अकसरियत (बहुसंख्यकों) के सामने यह स्पष्ट कर दे कि अब धार्मिक स्थलों का अपमान बर्दाश्त नहीं किया जाएगा, चाहे वह स्थल छोटा हो चाहे बड़ा. इन स्थलों का जो नुकसान किया गया है, उसकी मरम्मत होनी चाहिए.’

इसी तरह पटना में कुम्हरार के एक मस्जिद को नुकसान पहुंचाने के संदर्भ में 12 मार्च, 1947 को गांधी ने कहा था- ‘मैं इसे शैतानी का काम समझता हूं. हिंदू यह कहे कि हमारे मंदिर को बिगाड़ा गया, इसलिए हमने मस्जिद को नुकसान पहुंचाया, तो यह कोई माकूल जवाब नहीं होगा. हिंदू मूर्ति की पूजा करते हैं, मुसलमान नहीं करते. लेकिन हर इन्सान किसी न किसी की पूजा तो करता ही है. खुदा या ईश्वर सिर्फ ‘बाइबिल’, ‘कुरान’, मंदिर और मस्जिद में नहीं है. वह नाक, कान, बाल, नाखून सब में मौजूद है. बचपन में ही मुझे सिखाया गया कि ईश्वर हर जगह है. वह हवा से भी बारीक है. फिर ऐसे ईश्वर को कोई मस्जिद में पूजे, मंदिर में पूजे या गिरजा में जाकर पूजे— वह एक ही बात है. मैं मूर्तिपूजक भी हूं और मूर्तिभंजक भी. फिर भी जब मैं किसी मंदिर में जाता हूं और वहां मुझे सफाई दिखाई पड़ती है, तो मैं खुश होता हूं.’

गांधी ने आगे कहा था- ‘जिन लोगों ने मस्जिद को नापाक किया, वे इन्सान नहीं, बल्कि हैवान थे. क्योंकि मंदिर, मस्जिद या गिरजा सब खुदा के ही घर हैं. ...मस्जिद को नुकसान पहुंचाने से मंदिर कैसे बच सकता है या हिंदू धर्म को इससे क्या फायदा पहुंचेगा? इसी तरह अगर मुसलमान किसी मंदिर को तोड़ने आए, तो चाहे मैं मूर्तिपूजक न भी हूं, तो भी मेरा धर्म हो जाता है कि उनको जबर्दस्ती मंदिर तोड़ने से रोकूं. मैं मूर्ति को अपने सिर पर रख लूं और उनसे खुशामद से कहूं कि आप मंदिर न तोड़ें चाहे मेरी जान ही चली जाए.’

मुस्लिम बहुल नोआखाली में जब हिंदू मंदिरों को निशाना बनाया गया, तब भी गांधी ने इसी भाषा में वहां के मुसलमानों को समझाने की कोशिश की थी. गांधी और उनके सचिव प्यारेलाल के हस्तक्षेप के बाद वहां एक ऐसे ही मंदिर पर से मुसलमानों का कब्जा हटाया गया और वापस दोनों समुदायों के सहयोग से मंदिर बनाया गया और रामधुन चलाने की अनुमति मिली.

सत्य का साक्षात्कार करने वाले संतों और बुद्धों ने तो अपनी अनुभूति से यही बताया है कि वास्तविक धर्म न तो किसी मंदिर में बसता है, न मस्जिद में और न गिरजा में. असल धर्म है पाशविकता से उबरकर इंसानियत को धारण करना. क्या किन्हीं राम को अपना मंदिर बनवाने के लिए हिंसक और लंपट लठैतों और ऊपर से नीचे तक असत्याचरण में डूबे राजनीतिक दलों की जरूरत है? यदि हर फिरकों के अलग-अलग खुदा, ईश्वर और गॉड होते, तो उन्होंने आपस में ही लड़कर अपनी सर्वोच्चता का फैसला न कर लिया होता?

बरबस ही कबीर याद आते हैं- ‘तुरकन महजिद देहुरे हिंदू, दू ठां राम खुदाई. जहां मसीती देहुरा नाहीं, तहां का की ठकुराई..’ क्या कोई भी अदालत अपने फैसले में कबीर के इस सवाल का जवाब लिख पाएगी?