अमेरिका के राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप खुद को चतुर कारोबारी मानते हैं और यह भी मानते हैं कि अमेरिकी सरकार की कार्यप्रणाली कारोबार की तर्ज पर ही चलनी चाहिए. लेकिन तनाव और अनिश्चितता तो किसी भी कारोबार के लिए ठीक नहीं है! इस तरह देखें तो इजरायल-फिलस्तीन को लेकर ट्रंप का बदला हुआ रुख उनकी कारोबारी चतुरई पर सवालिया निशान लगाता है.

अमेरिकी राष्ट्रपति द्वारा ‘येरुशलम दूतावास कानून-1995’ से छूट लेने वाले दस्तावेज पर हस्ताक्षर करने की समय सीमा सोमवार को खत्म हो चुकी है और डोनाल्ड ट्रंप ने इस पर हस्ताक्षर नहीं किए हैं. इसके बाद यह अटकलबाजी तेज हो गई है कि वे अमेरिकी दूतावास को येरुशलम में स्थानांतरित करना चाहते हैं.

1995 में अमेरिकी कांग्रेस ने ‘येरुशलम दूतावास कानून’ पारित किया था. इसके तहत अमेरिका को इजरायल के शहर तेल अवीव, जहां ज्यादातर देशों के दूतावास स्थित हैं, से अपना दूतावास हटाकर येरुशलम में स्थानांतरित करना था. हालांकि अमेरिका ने कभी यह कानून लागू नहीं किया. बिल क्लिंटन से लेकर जॉर्ज बुश और बराक ओबामा तक सभी राष्ट्रपति इस कानून से छूट लेने वाले दस्तावेज पर हस्ताक्षर करते रहे हैं. इस कानून के मुताबिक अमेरिकी राष्ट्रपति को हर छह महीने में इस दस्तावेज पर हस्ताक्षर करने पड़ते हैं. ट्रंप ने पिछली बार जून में इस पर हस्ताक्षर किए थे और तब माना गया था कि वे अपने एक और चुनावी वादे से पीछे हटने जा रहे हैं.

अब अगर ट्रंप अपने वादे के मुताबिक आगे बढ़ते हैं तो यह हालिया सालों के दौरान पश्चिम एशिया के इस क्षेत्र में शांति वार्ता को बिगाड़ने वाला सबसे बड़ा कदम माना जाएगा. मीडिया में आई रिपोर्टें बताती हैं कि वाइट हाउस के अधिकारी भी पूरी तरह से इस फैसले के पक्ष में नहीं हैं तो वहीं अमेरिका के कई सहयोगी देशों, जिनमें अरब देश भी शामिल हैं, ने इसका विरोध किया है. जॉर्डन येरुशलम में मौजूद इस्लाम के पवित्र स्थलों का संरक्षक है. उसके साथ-साथ फ्रांस और सऊदी अरब ने भी इस कदम के खिलाफ अमेरिका को चेताया है. हालांकि इनमें से किसी को भी अंदाजा नहीं होगा कि ट्रंप असल में क्या करने वाले हैं.

ट्रंप अगर अमेरिकी दूतावास को येरुशलम में स्थानांतरित करते हैं तो इसके कई खतरनाक नतीजे हो सकते हैं. सबसे महत्वपूर्ण तो यही होगा कि इस तरह से अमेरिका पूरे येरुशलम पर इजरायल के अधिकार को वैधता दे देगा. जबकि इस शहर के पूर्वी हिस्से पर फिलस्तीन दावा करता और इस पर दोनों देशों के बीच कोई समझौता अब तक नहीं हो पाया है. वहीं 1967 के बाद से इजरायल पूर्वी येरुशलम में कई बसाहटें आबाद कर चुका है, जो अंतरराष्ट्रीय कानूनों के हिसाब से वैध नहीं हैं. अमेरिका का फैसला इन्हें भी वैधता दे देगा.

कूटनीतिक पैमानों पर देखें तो भी यह कोई समझदारी भरा फैसला नहीं कहा जा सकता. अमेरिका इजरायल और फिलस्तीन के बीच मध्यस्थ की भूमिका में है, लेकिन इस फैसले से उसकी विश्वसनीयता खतरे में पड़ जाएगी. सीधे कहें तो इससे पश्चिम एशिया में शांति प्रक्रिया कमजोर होगी साथ ही इस इलाके में अमेरिका का प्रभाव भी कमजोर पड़ जाएगा.

हालांकि एक वजह से उम्मीद है कि ट्रंप शायद ऐसा कोई फैसला न करें. उन्होंने चुनाव प्रचार के दौरान वादा किया था कि वे इजरायल-फिलस्तीन संघर्ष को सुलझाएंगे, लेकिन अभी तक इस दिशा में उन्होंने कोई कदम नहीं उठाया है.

पश्चिम एशिया को अभी-भी इस्लामिक स्टेट के खतरे से पूरी तरह बाहर निकलना है. इस बीच यहां सऊदी अरब और ईरान के बीच तनाव बढ़ने लगा है और इसका असर क्षेत्र के तमाम देशों पर पड़ रहा है. जाहिर है कि ऐसे में अमेरिकी दूतावास का येरुशलम में स्थानांतरित होना आखिरी चीज है जो दुनिया के दिग्गज मुल्क चाहेंगे. (स्रोत)