कांग्रेस उपाध्यक्ष राहुल गांधी का पार्टी अध्यक्ष बनना तय हो गया है. अध्यक्ष पद के लिए सिर्फ उन्होंने पर्चा दाखिल किया और अगले कुछ दिनों में उनके कांग्रेस अध्यक्ष बनने की औपचारिक घोषणा भी हो जाएगी. इस पूरी प्रक्रिया पर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने हमला बोला है. वे कह रहे हैं कि कांग्रेस ने अध्यक्ष के चुनाव के लिए लोकतांत्रिक प्रक्रियाओं का पालन नहीं किया और पार्टी में आगे बढ़ने का मूलमंत्र वंशवाद और विरासत की राजनीति ही है.

नरेंद्र मोदी की यह बात सच है कि कांग्रेस के होने वाले अध्यक्ष राहुल गांधी समेत पार्टी में कई ऐसे नेता हैं जिनके उभार में उनकी राजनीतिक विरासत की बड़ी भूमिका रही है. इस कड़ी में राहुल गांधी के अलावा ज्योतिरादित्य सिंधिया और सचिन पायलट जैसे नेताओं का नाम भी लिया जा सकता है.

लेकिन वंशवाद की राजनीति एक ऐसा रोग है जिसकी चपेट में आने से शायद ही कोई राजनीतिक पार्टी बची हो. जयंत सिन्हा, अनुराग ठाकुर, पीयूष गोयल, पंकज सिंह, पंकजा मुंडे, पूनम महाजन जैसे कई ऐसे नाम भाजपा में भी हैं. वहीं क्षेत्रीय दलों की स्थिति यह है कि उनमें से ज्यादातर सिर्फ एक परिवार के आसपास ही सिमट गई हैं. चाहे वह उत्तर प्रदेश की समाजवादी पार्टी हो या फिर बिहार की राष्ट्रीय जनता दल या फिर उड़ीसा की बीजू जनता दल. तमिलनाडु की डीएमके और जम्मू-कश्मीर के नैशनल कांफ्रेंस का उदाहरण भी इसी क्रम में दिया जा सकता है.

अध्यक्ष के चुनाव के लिए लोकतांत्रिक प्रक्रियाओं का पालन करने के मामले में भी आज की भाजपा का रिकॉर्ड कांग्रेस से बेहतर नहीं कहा जा सकता. कांग्रेस में तो फिर भी नाम के लिए ही सही राष्ट्रीय स्तर पर और अलग-अलग राज्यों से राहुल गांधी का नामांकन भरवाने की प्रक्रिया चलाई गई थी. लेकिन क्या ऐसी किसी प्रक्रिया की जानकारी किसी को तब मिली थी जब अमित शाह को दो बार भाजपा का अध्यक्ष बनाया गया था!

अमित शाह पहली बार 2014 में भाजपा अध्यक्ष बने थे. तब वे राजनाथ सिंह के बचे हुए कार्यकाल के लिए अध्यक्ष बनाए गए थे. क्या इसके लिए भाजपा में आंतरिक लोकतंत्र का निर्वहन करते हुए कोई मतदान हुआ था? क्या उसमें अमित शाह के खिलाफ किसी और उम्मीदवार ने पर्चा भरा था? सार्वजनिक तौर पर जो जानकारियां सबके सामने हैं उनके आधार पर इन दोनों सवालों का जवाब न ही मिलता है. यही स्थिति तब की भी थी जब 2016 के जनवरी में अमित शाह को दोबारा एक पूरे तीन साल के कार्यकाल के लिए अध्यक्ष बनाया गया था.

अध्यक्ष चुनने के लिए आंतरिक लोकतंत्र के नाम पर भाजपा में भी पहले से लिए गये निर्णय पर संसदीय बोर्ड से मुहर लगवाने की प्रक्रिया भर है. दोनों बार अमित शाह को अध्यक्ष नियुक्त करवाने का निर्णय संसदीय बोर्ड ने लिया था. इसके अलावा न तो किसी चुनाव की जानकारी किसी को है और न ही किसी और लोकतांत्रिक प्रक्रिया की. इसका मतलब आंतरिक लोकतंत्र न होने का जो आरोप नरेंद्र मोदी कांग्रेस पर लगा रहे हैं वह उतना ही भाजपा के ऊपर भी लगाया जा सकता है.

अमित शाह के पहले भी जो लोग पार्टी अध्यक्ष बनाए गए, उनके मामले में भी ऐसा ही हुआ था. 2009 के चुनाव में हार के बाद राजनाथ सिंह की जगह नितिन गडकरी को भाजपा अध्यक्ष बनाने का निर्णय भी किसी लोकतांत्रिक प्रक्रिया से निकलकर नहीं आया था. यह एक सर्वविदित तथ्य है कि ऐसा राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के दबाव में किया गया था.

भाजपा के अंदर अध्यक्ष चुनने की प्रक्रिया कितनी लोकतांत्रिक है, इसका अंदाजा उस वक्त भी लगा था जब नितिन गडकरी को तीसरी बार अध्यक्ष बनाने के लिए पार्टी के संविधान में संशोधन किया गया. इस संशोधन को करने का निर्णय भी किसी लोकतांत्रिक प्रक्रिया के तहत नहीं बल्कि संघ के दबाव में ही लिया गया था.

जब 2013 में नितिन गडकरी का तीसरी बार अध्यक्ष बनना बिल्कुल तय था तो आखिरी मौके पर उनके कारोबारी प्रतिष्ठानों पर अचानक आयकर विभाग द्वारा सर्वेक्षण किया गया और वे विवादों से घिर गए. इसके बाद पार्टी के वरिष्ठ नेता और पूर्व वित्त मंत्री यशवंत सिन्हा ने गडकरी के खिलाफ अध्यक्ष पद के लिए पर्चा भरने की घोषणा कर दी.

अध्यक्ष पद के लिए चुनाव नहीं कराना पड़े, इससे बचने के लिए नितिन गडकरी ने खुद को अध्यक्ष पद की दौड़ से अलग कर लिया और फिर संघ और भाजपा के कुछ आला नेताओं ने राजनाथ सिंह को फिर से पार्टी अध्यक्ष बनवा दिया. उस वक्त राजनाथ सिंह दिल्ली में नहीं थे और उन्हें आनन-फानन में वहां आने की सूचना दी गई. जाहिर है कि उस वक्त भी भाजपा ने किसी लोकतांत्रिक प्रक्रिया को नहीं अपनाया था.

अगर पार्टियों में आंतरिक लोकतंत्र की कमी की बात की जाए तो चुनाव सुधार के लिए गठित कई समितियों ने इस बारे में अपने सुझाव दिए हैं. इन सभी का मानना है कि हमारे राजनीतिक दलों के अंदर आंतरिक लोकतंत्र को बढ़ाना लोकतंत्र की मूल भावना को बनाए रखने के लिए जरूरी है. ऐसे में अगर नरेंद्र मोदी वाकई में यह चाहते हैं कि राजनीतिक पार्टियों के अंदर लोकतंत्र आए तो प्रधानमंत्री होने के नाते उनके पास कार्यपालिका की कमान भी है और विधायिका की भी. वे जरूरी कानूनी सुधार करके सभी राजनीतिक दलों में आंतरिक लोकतंत्र बहाल करने की दिशा में कदम बढ़ा सकते हैं. सिर्फ चुनावी रैलियों में दूसरी पार्टियों की भीतर आंतरिक लोकतंत्र के अभाव की बात करने से इस समस्या का समाधान कैसे हो सकता है?