‘ज़ेडडीएफ़’ सार्वजनिक फ़ीस से चलने वाला जर्मनी का दूसरा सबसे बड़ा राष्ट्रीय टीवी नेटवर्क है. शाम सात बजे उसके मुख्य समाचारों का समय होता है. इस पर 25 नवंबर 2017 को प्रसारित समाचारों में दो मिनट की एक ऐसी वीडियो-रिपोर्ट दिखायी गयी, जिसे जर्मन जनता अन्यथा भारत जैसे देशों के बारे में देखने-सुनने की आदी है. रिपोर्ट महिलाओं के साथ हिंसा-विरोधी अंतरराष्ट्रीय दिवस को समर्पित थी जिसे 1981 से हर 25 नवंबर को मनाया जाता है. 1999 में संयुक्त राष्ट्र संघ ने भी इस दिन को मान्यता देते हुए इस पर जोर दिया कि महिलाओं के साथ घरेलू हिंसा भी मानवाधिकारों का हनन है.

‘ज़ेडडीएफ़’ की रिपोर्ट में जिस घटना का जिक्र हुआ उसका सार-संक्षेप कुछ इस तरह है: दो हफ्ते पूर्व पूर्वी जर्मनी में माग्डेबुर्ग शहर के एक दंपति के बीच एक बार फिर किसी बात पर कहासुनी हो गयी. एक बार फिर पति ने पत्नी की पिटाई की. उसने अपनी दुबली-पतली पत्नी के मुंह पर ऐसा घूंसा मारा कि उसकी नाक टेढ़ी और एक आंख नीली हो गयी.

पुलिस से कभी शिकायत नहीं की

इससे पहले पति ने जब-जब पत्नी की पिटाई की थी, वह रो-धो कर चुप हो जाती थी. पुलिस से कभी शिकायत नहीं की. लेकिन इस बार सारी घटना बेटे के सामने हुई थी, बेटे के सामने हुआ यह अपमान वह सह नहीं पायी. उसने पुलिस को बुलाया. पुलिस ने पति को घर से निकल जाने और वहां दुबारा पैर नहीं रखने का हुक्म दिया और पत्नी को ‘घरेलू हिंसा के विरुद्ध हस्तक्षेप सेवा’ की सहायता लेने को कहा.

इस सेवा का कार्यालय माग्डेबुर्ग के एक प्रशासनिक भवन में है. वहां जो कोई जाता है, उसकी पहचान गुप्त रखी जाती है. इस कार्यालय की प्रमुख लिसी हेरमान ने ‘ज़ेडडीएफ़’ की महिला रिपोर्टर को बताया कि महिलाएं उनके पास आकर ही अपना मुंह खोलती हैं. उनके शब्दों में ‘अपने साथ हुई हिंसा की बात करना उन्हें अब भी एक वर्जना ही लगती है. शायद ही कोई महिला पहली बार की हिंसा के बाद अपने साथी से अलग हो पाती है और उसके साथ सुखद सहजीवन और सुखी परिवार का अपना सपना छोड़ पाती है.’

यौन-उत्पीड़न में सभी तेज़

‘सामाजिक तबकों या वर्गों से कोई फ़र्क नहीं पड़ता,’ लिसी हेरमान का इस रिपोर्ट में कहना है. ‘सार्वजनिक जीवन में बहुत सम्मानित और उच्चशिक्षा प्राप्त परिवारों में भी ऐसी हिंसा होती है. वे इसे छिपाते हैं, क्योंकि इससे पद-प्रतिष्ठा पर आंच आ सकती है.’ ‘ज़ेडडीएफ़’ की रिपोर्ट जिस परिवार के बारे में थी, वह भी अकादमिक शिक्षा प्राप्त परिवार है. पति-पत्नी 16 वर्षों से साथ रह रहे थे, पति एक बार फिर अपनी पत्नी के पास लौटना चाहता है, लेकिन इस बार पत्नी ऐसा बिल्कुल नहीं चाहती. उसका कहना है कि तन की चोट तो ठीक हो जाती है, पर मन की चोट काफ़ी लंबे समय तक टीस मारती रहती है.

जर्मनी जैसे देश में भी ऐसा बहुत कम ही होता है कि हिंसा-पीड़ित महिलाएं पुलिस के पास शिकायत करती हैं या बात अदालत तक पहुंचती है. ‘ज़ेडडीएफ़’ की रिपोर्ट में दिखाये गये एक वकील के अनुसार, बात यदि अदालत तक पहुंचती भी है, तब भी ‘बाद की सुनवाइयों में महिलाएं अपना आरोप वापस ले लेती हैं. अपराधी को कोई सज़ा नहीं मिल पाती. बात यदि सज़ा सुनाने तक पहुंची भी, तो बस, कोई छोटी-मोटी धनराशि सज़ा के तौर पर सुना दी जाती है. घरेलू हिंसा से पहुंची मानसिक चोट किसी सज़ा में प्रतिबिंबित नहीं होती.’

लैंगिक समानता लगती है, है नहीं

यह स्थिति उस जर्मनी में है, जहां पुरुष ही नहीं, महिलाएं भी बड़े तपाक से और गर्व के साथ कहती मिलेंगी कि हमारे यहां तो लैंगिक समानता है! हम पूरी तरह स्वतंत्र और समानाधिकारी हैं. घरों से बाहर के सार्वजनिक जीवन में हर जगह और हर स्तर पर महिलाओं की अच्छी-ख़ासी संख्या इस दावे की पुष्टि करती लगती है. ‘लगती’ है, न कि वाकई पुष्टि करती है. घरों के भीतर यह समानता प्रत्यक्षतः उतनी नहीं रह जाती, जितनी घरों से बाहर देखने-सुनने में आती है या उसका ढिंढोरा पीटा जाता है.

महिलाओं के साथ हिंसा-विरोधी अंतरराष्ट्रीय दिवस से एक ही दिन पहले, जर्मनी के संघीय अपराध निरोधक कार्यालय ‘बीकेए’ ने आये दिन होने वाले घरेलू अपराधों के 2016 के आंकड़े प्रकाशित किये. इन आंकड़ों से पता चलता है कि 2016 में जर्मनी में 149 महिलाओं की उनके पतियों या बिना विवाह के साथ रह रहे जीवन-संगियों ने हत्या कर दी. इनमें पीट-पीटकर मार डालने के मामले भी थे. दूसरे शब्दों में, भारत से 16 गुना कम जनसंख्या वाले जर्मनी में, हर दूसरे दिन, कोई महिला अपने ही पति, प्रेमी या संगी के हाथों मौत के घाट उतार दी जाती है.

हर दिन एक महिला की जान जोखिम में

जिन मामलों में किसी महिला की मौत नहीं हो पायी, मारने का प्रयास विफल हो गया, उनकी संख्या 2016 में 208 थी. यानी, हर सप्ताह चार महिलाएं मर तो नहीं पातीं, पर मौत के मुंह तक पहुंचने की सारी शारीरिक और मानसिक यातनाएं झेलने के लिए विवश कर दी जाती हैं, घरेलू हिंसा के कारण 2016 में मरने वाली या किसी तरह जीवित बच जाने वाली महिलाओं की कुल संख्या 357 होने का अर्थ है कि जर्मनी में हर दिन एक महिला अपने ही पति, प्रेमी या जीवनसंगी के हाथों या तो मरती है या अधमरी होकर जैसे-तैसे जीवित बच जाती है.

महिलाओं के हाथों मारे गये उनके पतियों, प्रेमियों या संगियों की संख्या 2016 में मात्र 14 और जीवित बच गयों की 70 थी. असंगत होते हुए भी यह एक अच्छी ही बात है कि अपने आप को पुरुषों के बराबर बताने वाली जर्मन महिलाएं, अपने साथ हुए दुराचार का बदला लेने में, पुरुषों की बराबरी नहीं करतीं. जर्मनी के संघीय अपराध निरोधक कार्यालय ‘बीकेए’ द्वारा जारी आंकड़ों के अनुसार, 2016 में हुये घरेलू हिंसा के मामलों में 10,595 महिलायें घातक रूप से और 46 गंभीर रूप से घायल हुयीं. 2,231 महिलाओं के साथ बलात्कार हुआ और 300 के साथ बलात्कार का प्रयास हुआ.

पुलिस तक शिकायत नहीं पहुंचती

जर्मनी में किसी न किसी प्रकार की घरेलू हिंसा के ऐसे मामलों की कुल संख्या 2016 में 1,33,080 रही, जिनकी शिकायत पुलिस तक पहुंची. इन मामलों में महिला-पीड़ितों का अनुपात 83 प्रतिशत रहा. जिन मामलों की शिकायत पुलिस तक नहीं पहुंची, उनके अनुपात के बारे में विशेषज्ञों के अनुमान 70 से 90 प्रतिशत तक जाते हैं! देखने में यही आ रहा है कि 2012 से महिलाओं के साथ घरेलू हिंसा के मामले औसतन 4.4 प्रतिशत वार्षिक की दर से बढ़ रहे हैं.

जिन महिलाओं को बार-बार की हिंसा के कारण अकेले या अपने बच्चों के साथ घर से भागना पड़ता हैं, उन्हें शरण देने के लिए जर्मनी में करीब 350 ऐसे नारी-निकेतन हैं, जिन्हें समाजसेवी संस्थायें चलाती हैं. उनका अधिकांश ख़र्च सरकारी विभाग उठाते हैं. 17 भाषाओं वाली एक विशेष ‘टेलीफोन हेल्पलाइन’ का 2013 से 2016 के बीच 61,000 महिलाओं ने उपयोग किया.

घरेलू हिंसा के ये सारे आंकड़े केवल ऐसी महिलाओं और पुरुषों के सहजीवन में हिंसा की व्यापकता को दर्शाते हैं, जो विवाहित या अविवाहित जोड़ों के तौर पर एकसाथ रह रहे हैं. ये आंकड़े उन लड़कियों और महिलाओं के साथ होने वाली यौन-हिंसा का परिचय नहीं देते, जो अविवाहित हैं या जिनका कोई पुरुष जीवनसंगी नहीं है. उनके साथ हिंसा घरेलू हिंसा की श्रेणी में नहीं आती.

बच्चे वयस्क होते ही माता-पिता से अलग

जर्मनी में, बल्कि पूरे यूरोप में, ऐसे परिवार अपवादस्वरूप ही मिलते हैं, जहां विवाहित तो क्या, अविवाहित वयस्क लड़के-लड़कियों ने भी अपने माता-पिता का घर स्वेच्छा से नहीं छोड़ दिया हो. बच्चे वयस्क होते ही माता-पिता से अलग हो कर अकले रहने लगते हैं, भले ही माता-पिता और वयस्क बच्चे एक ही शहर में क्यों न रहते हों. इसीलिये सास-ससुर और बहू, देवर-जेठ और भाई की पत्नी या ननद और भाभी के बीच झगड़े-टंटे या हिंसा की नौबत नहीं आती और न ही आंकड़ों में उनका कोई उल्लेख मिलता है.

यूरोपीय संघ के दूसरे सबसे महत्वपूर्ण देश फ्रांस में भी, महिलाओं के साथ घरेलू हिंसा की प्रवृत्ति इतनी शोचनीय है कि राष्ट्रपति इमानुएल माक्रों को, 25 नवंबर 2017 वाले दिन, इसी विषय पर एक भाषण देना पड़ा. राष्ट्रपति-भवन ‘एलिज़े पैलेस’ में आयोजित एक सभा में उन्होंने इस समस्या से लड़ने के लिए एक ऐसी कार्ययोजना (ऐक्शन प्लान) की घोषणा की, जिसके तहत कुछ नये कठोर क़ानून भी बनाये जायेंगे. भाषण से पहले उन्होंने और आमंत्रित लोगों ने उन 123 महिलाओं की याद में एक मिनट का मौन रखा, जो 2016 में अपने वर्तमान या पिछले जीवनसाथी के हाथों मारी गयीं.

फ्रांस में नारी-समानता के लिए अलग मंत्रालय

फ्रांस में स्त्री-पुरुष समानता के लिए एक अलग से मंत्रालय है. राष्ट्रपति माक्रों ने घोषित किया कि इस मंत्रालय के बजट में 13 प्रतिशत की वृद्धि की जायेगी. नारी-समानता की विभिन्न योजनाओं के लिए 2018 से 42 करोड़ यूरो अलग से आवंटित किये जायेंगे. यौन-अपराधों से बचाव को ध्यान में रखते हुए सरकारी स्कूलों के बच्चों और किशोरवय छात्रों के लिए यौनशिक्षा के नये पाठ्यक्रम शुरू किये जायेंगे.

राष्ट्रपति माक्रों ने बताया कि फ्रांस की दंडविधान संहिता में एक नया क़ानून जोड़ते हुए राह चलती लड़कियों और महिलाओं के साथ धींगामस्ती, छेड़ख़ानी या अभद्र छींटाक़शी को ‘दंडनीय अपराध’ बना दिया जायेगा. इस अभियान को आगे बढ़ाते हुए वयस्कों के लिए भी नैतिक शिक्षा के कोर्स चलाये जायेंगे. महिलाओं के प्रति हिंसाभाव उकसाने वाले इंटरनेट-वीडियो वगैरह पर कड़ी नज़र रखी जायेगी.

‘हमारा समाज कामुकता से बीमार है’

अपने भाषण में राष्ट्रपति माक्रों ने दुख प्रकट करते हुए कहा कि यह सब इसलिये करना पड़ रहा है कि फ्रांस में यौन-अपराध भयावह होते जा रहे हैं, औसतन हर तीन दिन पर, कोई न कोई महिला अपने जीवनसाथी की हिंसा के कारण दम तोड़ बैठती है. ‘हमारा समाज कामुकता से बीमार है,’ उन्होंने कहा. उनकी यह बेबाक स्वीकारोक्ति सबके लिए बहुत चौंकाने वाली थी.

राष्ट्रपति माक्रों ने फ्रांसीसी समाज को ‘कामुकता से बीमार’ बताते समय याद नहीं किया होगा कि दिसंबर 2012 में, जब दिल्ली में ‘निर्भया बलात्कार कांड’ हुआ था तो फ्रांस सहित यूरोप के क़रीब हर देश में ‘भारत के हिंदू समाज’ को कोसने-धिक्कारने और उसे ‘बलात्कारियों का देश’ सिद्ध करने के लिए ठीक इसी प्रकार के शब्दों के प्रयोग की होड़-सी लग गयी थी. कोई ऐसा दिन नहीं बीतता था, जब भारत से आयी बलात्कार की किसी ख़बर को पश्चिमी मीडिया में चटखारे लेकर उछाला न गया हो, मानो इस तरह की वीभत्स घटनाएं पश्चिम में न तो होती हैं और न हो सकती हैं!

कामुकता-केंद्रित पश्चिमी संस्कृति

उस समय सारा पश्चिमी जगत अपना गुणगान करने, अपने आप को दूध का धुला और भारत की ‘हिंदू संस्कृति’ को ‘सड़ा-गला’ बताने में परम सुख पा रहा था! कोई सुनने-समझने को तैयार नहीं था कि यह भारतीय नहीं, सेटेलाइट टेलीविज़न और इंटरनेट के माध्याम से नग्नता और अश्लीलता को घर-घर पहुंचाने वाली पश्चिमी संस्कृति की फैलायी हुई एक विश्वव्यापी (ग्लोबलाइज़्ड) ‘बीमारी’ है. यहां तक कि स्वयं भारतीय फ़िल्म, कला और मीडिया जगत भी समाज के नैतिक पतन को लेकर अपनी गिरेबां में झांकने के बदले हिंदू धर्म को जूते मार रहा था, जिसके बारे में अन्यथा कहा जाता है कि वह कोई धर्म नहीं, एक जीवनपद्धति है.

इस बीच यह ‘बीमारी’ अमेरिका सहित यूरोपीय देशों में भी इतनी संक्रामक हो गयी है कि प्राइमरी स्कूल के बच्चे तक यौन-अपराध करने लगे हैं. उन्हें इसका बोध ही नहीं होता कि टेलीविज़न फ़िल्मों, इंटरनेट वीडियो या स्मार्ट फ़ोन की तस्वरों में वयस्क जो क्रीड़ाएं करते दिखते हैं, वे हम बच्चों के लिए वर्जित, हानिकारक या अपराध क्यों हैं?

स्कूली बच्चों में भी यौन-हिंसा प्रवृत्ति

फ्रांस के स्कूलों में यौन-हिंसा के प्रति आंख खोलने वाले नये पाठ्यक्रम शुरू करने की राष्ट्रपति माक्रों की कार्ययोजना इस बात की पुष्टि है कि लड़कियों और महिलाओं के साथ यौन-हिंसा वयस्कों के बीच ही नहीं, छोटे-छोटे स्कूली बच्चों के बीच भी भयावह आयाम धारण कर चुकी है. भारत में दिख रहे नैतिक पतन के लिए जो लोग (हिंदू) धर्म को दोषी ठहराते हैं, यूरोप और अमेरिका में उससे भी अधिक पतन के लिए क्या वे ईसाई धर्म को दोषी ठहराने का साहस करेंगे? इन देशों मे तो इतने हिंदू या भारतीय नहीं हैं कि सारे समाज की नैतिकता को भ्रष्ट कर सकें!

स्थिति यह है कि जर्मनी और फ्रांस ही नहीं, सारा यूरोप दशकों से नारी-समानता की सौगंध खा रहा है, पर हर जगह असमानता-भरे दुराचार की दुर्गंध ही फैलती मिल रही है. 28 देशों और 50 करोड़ जनसंख्या वाले यूरोपीय संघ की एक ‘मौलिक अधिकार एजेंसी’ है जिसे संक्षेप में ‘एफ़आरए’ कहते हैं. संघ के देशों में महिलाओं की स्थिति का आकलन करने के लिए उसने सभी 28 देशों की 18 से 74 वर्ष आयु के बीच की 42 हज़ार (हर देश में डेढ़ हज़ार) महिलाओं के बीच एक सर्वेक्षण किया. मार्च 2014 में प्रकाशित उसके नतीज़ों की सूची बड़ी लंबी और निराशजनक है. सबसे अधिक चौंकाने वाले कुछ तथ्य और आंकड़े इस प्रकार हैंः

यूरोपीय संघ में यौन-हिंसा की स्थिति

* हर तीसरी महिला (33 प्रतिशत = 6 करोड़ 13 लाख) ने बताया कि उसे अपने 15वें जन्मदिन के बाद कम से कम एक बार शारीरिक और / या यौन-हिंसा झेलनी पड़ी है.

* हर 20वीं महिला (93 लाख) को कम से कम एक बार बलात्कार की वेदना सहनी पड़ी है. 12 प्रतिशत (2 करोड़ 10 लाख) को तो 15 साल की होने से पहले ही किसी वयस्क की हवस का शिकार होना पड़ गया.

* 22 प्रतिशत (4 करोड़ 18 लाख) को अपने जीवनसंगी की ओर से शारीरिक या बलात्कारी हिंसा झेलनी पडी. 43 प्रतिशत (7 करोड़ 15 लाख) को मानसिक यातना से गुज़रना पड़ा. दोनों प्रकार की 67 प्रतिशत पीड़िताओं ने पुलिस के पास कभी शिकायत नहीं की.

* 33 प्रतिशत (6 करोड़ 13 लाख) को अपने बचपन में ही किसी वयस्क की ओर से शारीरिक प्रताड़ना या लैंगिक हिंसा का कटु अनुभव मिल गया.

* 11 प्रतिशत (1 करोड़ 85 लाख) को भद्दे ईमेल और एसएमएस भेज कर तंग किया गया.

* 32 प्रतिशत (6 करोड़ 8 लाख) ने कहा कि उन्हें अपने अधिकारियों, सहकर्मियों या ग्राहकों ने तंग किया.

* अपने पति या संगी से इतर यौन-हिंसा झेल चुकी हर दसवीं महिला ने कहा कि उसे अपरिचित लोगों ने सामूहिक बलात्कार या शीलभंग का शिकार बनाया.

शिक्षा और खुशहाली यौन-हिंसा बढ़ाने वाली?

यूरोपीय संघ की इस ‘मौलिक अधिकार एजेंसी’ के व्यापक सर्वेक्षण से यह चौंकाने वाला तथ्य भी सामने आया – जिस पर कोई विश्वास नहीं करेगा – कि जिस देश का समाज जितना अधिक खुशहाल, उदारवादी और सुशिक्षित है, वहां महिलाओं को महिला होने के नाते उत्पीड़ित किये जाने का अनुपात भी उतना ही अधिक है! यूरोपीय संघ के देशों में स्वीडन. डेनमार्क, नीदरलैंड (हॉलैंड) और फ़िनलैंड इन तीनों कसौटियों के अलावा भ्रष्टाचार-मुक्त सुशासन में भी सबसे अग्रणी माने जाते हैं.

इन देशों की 70 प्रतिशत से अधिक महिलाओं ने कहा कि 15 साल की आयु के बाद कभी न कभी यौन-उत्पीड़न से उनका का सामना हो ही गया. यूरोपीय संघ का सबसे उदार और सबसे समाज- कल्याणकारी देश कहलाने वाला स्वीडन, उत्पीड़न की 81 प्रतिशत शिकायतों के साथ पहले नंबर पर रहा. उसके बाद के स्थानों पर 70 प्रतिशत से अधिक शिकायतों के साथ क्रमशः डेनमार्क, फ्रांस, नीदरलैंड और फ़िनलैंड रहे. यहां बता दें कि स्वीडन की संसद में 47 प्रतिशत महिलाएं बैठती हैं. देश के 22 मंत्रियों में से नौ महिलाएं हैं. तब भी, महिलाओं के साथ यौन उत्पीड़न का यूरोप में वही नंबर एक है,

ग़रीब बुल्गारिया में सबसे कम यौन-हिंसा

यूरोपीय संघ के इस सर्वेक्षण में उसके सबसे ग़रीब और कुशासित देशों में गिने जाने वाले बुल्गारिया को, 24 प्रतिशत शिकायतों के साथ, सबसे अंतिम स्थान मिला. यानी, वहां महिलाओं का सबसे कम यौन-उत्पीड़न होता है! महिलाओं के साथ गंभीर क़िस्म की यौन-हिंसा के मामले में भी डेनमार्क, फ़िनलैंड और स्वीडन क्रमशः 52, 47 और 46 प्रतिशत के साथ प्रथम तीन स्थानों पर रहे. स्वीडन की विदेशमंत्री मार्गोट वालस्त्रौएम ने हाल ही में एक ट्वीट में लिखा कि उन्हें तो यूरोपीय संघ के शिखर सम्मेलनों तक में ‘जांघ पर हाथ रखने’ जैसी शरारतों का सामना करना पड़ा है.

यौन-उत्पीड़न की 35 प्रतिशत शिकायतों के साथ जर्मनी का नाम यूरोपीय सर्वेक्षण के मध्यक्रम में दिखायी पड़ता है. इटली, क्रोएशिया या बुल्गारिया जैसे देशों के नाम 30 प्रतिशत से भी कहीं कम अनुपात के साथ गंभीर क़िस्म की यौन-हिंसा के सबसे निचले क्रम में मिलते हैं. इन देशों में आर्थिक खुशहाली और शिक्षा का सूचकांक कहीं नीचे, पर कुशासन और भ्रष्टाचार का सूचकांक उतना ही ऊपर है. फिर भी यौन उत्पीड़न के मामले में उनकी स्थिति संपन्न और खुशहाल देशों से कम खराब है. इसका अर्थ तो यही हुआ कि महिलाओं के साथ यौन-हिंसा या दुराचार एक ऐसी ऐय्याशी है, जिस का शौक ऊंची शिक्षा और मोटी आय वाले लोगों के लिये ही पालना कहीं सरल हैं.

स्वीडन बलात्कारों के नोबेल पुस्कार का दावेदार

सच तो यह है कि यदि बलात्कारों के लिए भी कोई नोबेल पुस्कार होता, तो वह नोबेल पुरस्कारों के देश स्वीडन को ही मिल रहा होता. प्रति 10000 निवासियों पर प्रतिवर्ष 53.2 बलात्कारों के साथ स्वीडन पूरे यूरोप में पहले नंबर पर और विश्व में दूसरे नंबर पर है. भारत में यह अनुपात केवल 2.6 है, तब भी उसे दुनिया के सबसे बलात्कारी देश के तौर पर बदनाम कर दिया गया है. भारत की जनसंख्या यदि एक अरब 30 करोड़ के बदले स्वीडन की ही तरह एक करोड़ से भी कम होती, तो उसका कोई नाम भी नहीं लेता. स्वीडन में 1975 में बलात्कार के केवल 421 मामले दर्ज किये गये थे, जबकि 40 साल बाद यह संख्या लगभग 16 गुना बढ़ कर 2014 में 6,620 हो गयी थी.

भारत में हम इंग्लैंड-अमेरिका की भाषा और रहन-सहन पर मरते हैं, लेकिन उनका रिकॉर्ड भी बहुत ही शर्मनाक है. इन दोनों देशों की सरकारें यौन-हिंसा के बारे में भरोसेमंद आधिकारिक आंकड़े प्रकाशित करने से बचती हैं. 6 करोड़ 30 लाख जनसंख्या वाले ब्रिटेन के सरकारी अभियोक्ता कार्यालयों के महानिदेशक एलिसन साउन्डर्स ने ब्रिटिश दैनिक ‘गार्डियन’ को, सितंबर 2016 में, वहां कि स्थिति की झीनी-सी झलक दी. साउन्डर्स ने बताया कि लड़कियों-महिलाओं के साथ घरेलू दुर्व्यवहार, बलात्कार और मारने-पीटने जैसे अपराध, 2015-16 के दौरान, 10 प्रतिशत बढ़ कर 1,17,568 हो गये.

ब्रिटेन में सोशल मीडिया का आतंक

लेकिन, बलात्कार के केवल 4,643 मामले अदालतों तक पहुंचे, जिन के बल पर 2.689 फैसले सुनाये गये. इंटरनेट, सोशल मीडिया और अन्य तकनीकी माध्यमों द्वारा धौंस- धमकी देने, फ़ोटो या शब्दों द्वारा निंदित, अपमानित एवं तंग करने जैसे मानसिक कष्ट पहुंचाने वाले मामले और भी तेज़ी से बढ़ रहे हैं, साउन्डर्स का कहना था कि इंटरनेट की आड़ लेकर बेझिझक ऐसे अपराध करना बहुत आसान हो गया है. यौन-अपराधों की जांच-पड़ताल सरकारी अभियोजकों के काम का क़रीब 20 प्रतिशत हिस्सा बन गाया है.

ब्रिटेन की स्थिति के बारे में ठोस सरकारी आंकड़ों के अभाव में इस समय जो भी आंकड़े उपलब्ध हैं, उनके आधार पर अनुमान लगाया गया है कि वहां हर एक लाख जनसंख्या पर साल भर में औसतन 24 से अधिक बलात्कार होते हैं. यह अनुपात भारत की तुलना में कम से कम नौ गुना अधिक है!

ब्रिटेन में भी सभी यौन-अपराध पुलिस के कानों तक नहीं पहुंचते. वहां भी ऊंचे तबकों के कैसे नामी लोग भी अपनी कामवासना को क़ाबू में नहीं रख पाते, इसका एक प्रमाण नवंबर 2017 के आरंभ में रक्षामंत्री सर माइकल फ़ैलन के त्यागपत्र से मिलता है. एक महिला रेडियो-पत्रकार ने आरोप लगाया था कि 2002 में, टोरी पार्टी के एक रात्रिभोज-सम्मेलन के समय, सर फ़ैलन ने कई बार उसके घुटने पर अपना हाथ रख दिया. महिला पत्रकार का कहना है, ‘मैंने बिना किसी गुस्से के नम्रतापूर्वक उनसे कहा कि यदि उन्होंने फिर यह हरकत की, तौ मैं उनके मुंह पर तमाचा जड़ दूंगी.’

अमेरिका में हर दिन 500 बलात्कार

ब्रिटेन की ही तरह अमेरिका में भी यौन-अपराधों के आंकड़े इधर-उधर से जुटाने पड़ते हैं. वे किसी एक ही स्रोत से नहीं मिलते. वहां के ‘राष्ट्रीय अपराध सर्वे’ (एनसीवीएस) की एक रिपोर्ट का कहना है कि 2008 में वहां हर दिन औसतन 500 महिलाओं के साथ बलात्कार हो रहा था. 2005 में हर दिन औसतन तीन महिलाओं की हत्या हो रही थी. उस वर्ष कुल मिलाकर 1, 181 औरतें मार डाली गयीं. एक-तिहाई मौतों के लिए उनके पती या प्रेमी ज़िम्मेदार थे. अफ्रीकी मूल की अश्वेत अमेरिकी महिलाओं के साथ, श्वेत अमेरिकी महिलाओं की अपेक्षा, 35 प्रतिशत अधिक यौन-हिंसा होती है.

‘एनसीवीएस’ का ही यह भी कहना है कि 2006 में अमेरिका में महिलाओं के साथ बलात्कार और यौन-उत्पीड़न के कुल 2,32,960 ऐसे भी मामले हुए, जिनकी पुलिस के पास कोई शिकायत नहीं पहुंची. इन सब आंकड़ों के बारे में सोचते समय याद रखना ज़रूरी है कि कि अमेरिका की 32 करोड़ जनसंख्या भारत की एक अरब 30 करोड़ जनसंख्या के केवल एक-चौथाई के बराबर है. भारतीय मीडिया की ही तरह विदेशी मीडिया की भी आदत-सी बन गयी है कि जनसंख्या बताये बिना वे भारत जैसे भीम की तुलना ब्रिटेन या बेल्जियम जैसे बौनों से करने लगते हैं.

हर पांच में से एक छात्रा का बलात्कार हो सकता है

अमेरिका में जो महिलायें 20 से 24 साल आयु की हैं, उनके साथ घरेलू यौन-हिंसा होने का ख़तरा सबसे अधिक पाया गया है. जो 24 साल या उससे कुछ कम की हैं, उनके साथ बलात्कार होने की संभावना सबसे अधिक होती है. अमेरिका के न्याय विभाग (डिपार्टमेंट ऑफ़ जस्टिस) का आकलन है कि अपने कॉलेज के दिनों में हर पांच में से एक छात्रा को बलात्कार हो जाने या उसके प्रयास के कटु अनुभव से गुज़रना पड़ेगा. इस अनुभव को झेल चुकी पांच प्रतिशत छात्राएं भी पुलिस के पास शिकायत करने नहीं जायेंगी! 2015 में अमेरिका के 27 विश्वविद्यालयों में किये गये एक अध्ययन से सामने आया कि स्नातक यानी ग्रेजुएशन की पढ़ाई कर रही 23 प्रतिशत छात्राएं अपने साथ यौन-हिंसा प्रेरित बलप्रयोग या कामुकतापूर्ण दुर्व्यवहार झेल चुकी थीं,

यूरोप और अमेरिका से हट कर यदि विश्व-स्तर पर देखा जाये, तो केवल पांच करोड़ 30 लाख की जनसंख्या वाले दक्षिण अफ्रीका का नाम महिलाओं के साथ बलात्कार और य़ौन-हिंसा की संयुक्त राष्ट्र सूची में हर साल पहले नंबर पर मिलता है. वहां हर साल 64,000 से अधिक बलात्कार होते हैं – प्रति एक लाख जनसंख्या पर 115 बलात्कार. महिला यौन-उत्पीड़न के अन्य प्रकारों के आंकड़े तो और भी भयावह होंगे. जनसंख्या में दक्षिण अफ्रीका से 24.5 गुना बड़े भारत के राष्ट्रीय अपराध कार्यालय ने 2014 में बलात्कार के 34,651 मामले दर्ज किये थे.

यौन-अपराध और संयुक्त राष्ट्र

संयुक्त राष्ट्र का ऑस्ट्रिया की राजधानी वियेना में क़रीब 500 कर्मचारियों वाला एक ऐसा कार्यालय है, जिसका काम है मादक द्रव्यों और हर प्रकार के अपराधों से संबंधित जानकारियां जमा करना और उनका अध्ययन करना. ‘यूअनओडीसी’ (यूनाइटेड नेशन्स ऑफ़िस ऑन ड्रग्स ऐन्ड क्राइम) नाम का यह कार्यलय यौन-अपराधों की भी खोज-ख़बर रखता है. संयुक्त राष्ट्र के हर सदस्य देश से अपेक्षा की जाती है कि वह अपने यहां होने वाले यौन-अपराधों के बारे में भी नवीनतम जानकारियां दिया करें. पर, मुश्किल से आधे सदस्य देश ही इस पर ध्यान देते हैं.

‘यूअनओडीसी’ का कहना है कि क़रीब 140 देशों ने घरेलू हिंसा के बारे में भी क़ानून बनाये हैं और 144 देशों में यौन-उत्पीड़न की रोकथाम के भी क़ानून हैं, पर ज़रूरी नहीं है कि ये क़ानून अंतरराष्ट्रीय मानदंडों पर खरे उतरें या उन पर ईमानदारी से अमल होता है. 37 देश ऐसे हैं, जो अपनी पत्नी के साथ बलात्कार करने पर, या किसी दूसरी स्त्री के साथ बलात्कार करने के बाद उससे विवाह कर लेने पर, बलात्कारी पुरुष को क़ानूनी कार्रवाई से छूट देते हैं.

विश्व स्वास्थ्य संगठन के ताजा अनुमान

ऐसे ही लचर क़ानूनों तथा पैसे वालों, बाहुबलियों और सत्ताधारियों के निहित स्वार्थों के चलते, सारे विश्व में, महिलाओं के साथ बलात्कारों, उनकी हत्याओं और शोषण-उत्पीड़न के अपराधों की बाढ़-सी आ गयी है. विश्व स्वास्थ्य संगठन (डब्ल्यूएचओ) द्वारा प्रकाशित ताजा अनुमानों में कहा गया है कि हर तीन में से एक (35 प्रतिशत) महिला, अपनों ही या ग़ैरों के हाथों, शारीरिक या यौन हिंसा झेल चुकी है. संगठन का यह भी कहना है कि...

* महिलाओं की दुनिया भर में होने वाली 38 प्रतिशत हत्याएं उनका पुरुष पति या प्रेमी ही करता है. उच्च आय वाले देशों में यह प्रवृत्ति 23.2 प्रतिशत और कम आय वाले दक्षिणपूर्व एशियाई क्षेत्र में 37.7 प्रतिशत है.

* अपने जीवनसाथी की हिंसा झेल चुकी महिलाओं के अवसाद (डिप्रेशन) ग्रस्त हो जाने की संभावना दो गुनी और उन्हें एड्स रोग हो जाने की संभावना डेढ़ गुनी बढ़ जाती है.

* बालविवाह भी यौन-उत्पीड़न है. दुनिया भर की इस समय जीवित 75 करोड़ लड़कियों की शादी 18 साल की आयु से पहले ही कर दी गयी.

* विश्व की 12 करोड़ लड़कियों (हर 10 में से एक) को कभी न कभी सहवास या किसी यौनक्रीड़ा के लिए बाध्य किया गया.

* खतने की प्रथा वाले 30 देशों में कम से कम 12 करोड़ औरतों और लड़कियों को अधितर उस समय गुप्तांग के ख़तने की पीड़ा भुगतनी पड़ी जब, उनकी आयु पांच साल से कम थी. कुछ की आयु तो केवल कुछ महीने ही थी.

* मानव-तस्करी के शिकारों में 71 प्रतिशत अनुपात औरतों और अवयस्क लड़कियों का होता है. इस तरह की हर चार में से तीन लड़कियों या औरतों से वेश्यावृत्ति करवाई जाती है.

हॉलीवुड अभिनेत्रियों की गुहार

अदनी ही नहीं, हॉलीवुड की प्रसिद्ध अभिनेत्रियां और यूरोपीय संसद की महिला सांसदों जैसी बिरली महिलाएं भी, अक्टूबर 2017 से, गुहार लगा रही हैं कि उन्हें भी महिला होने के नाते यौन-उत्पीड़न भुगतना पड़ा है. अमेरिका के ‘द न्यूयॉर्क टाइम्स’ और ‘द न्यूयॉर्कर’ ने अक्टूबर 2017 में भंडाफोड़ किया था कि हॉलीवुड के सबसे बड़े और जाने-माने फ़िल्म-निर्माता, हार्वे वाइनस्टीन, अपनी फ़िल्मों की अभिनेत्रियों के साथ यौन-दुराचार करते हैं. इन दुराचारों की पहली ख़बर छपते ही ऐसी दर्जनों अभिनेत्रियां और अन्य महिलाएं खुल कर सामने आयीं, जो वाइनस्टीन की तिकड़मों, उत्पीड़नों और बलात्कारों की भुक्तभोगी रह चुकी हैं.

इस घटना ने ट्विटर पर ‘मी टू’ (मैं भी) नाम से एक ऐसे हैशटैग को जन्म दिया, जिस का उपयोग करते हुए स्वीडन की विदेशमंत्री और यूरोपीय संसद की महिला सांसदों से लेकर महिला वैज्ञानिकों, कलाकारों, पत्रकारों इत्यादि तक हज़ारों महिला भुक्तभोगियों ने अपनी आपबीतिया्ं पोस्ट की हैं.

महिला सांसद मानसिक यौन-हिंसा झेलती हैं

विश्व के विभिन्न देशों की संसदों के सदस्यों की ‘अंतर संसदीय यूनियन’ (इंटर पार्लियामेंटरी यूनियन) ने पांच अलग-अलग भूखंडों के 39 देशों में महिला सांसदों के अनुभवों का अध्ययन किया. अध्ययन में भाग लेने वाली 82 प्रतिशत महिला सांसदों ने कहा कि अपने संसदीय कार्यकाल में उन्हें भी अपने प्रति मानसिक हिंसा के किसी न किसी रूप को झेलना पड़ा. यह हिंसा पुरुष सांसदों की ओर से किसी भद्दी टिपणी, भाव-भंगिमा, इशारेबाज़ी, घेराव या धमकी के रूप में थी.

कहने की आवश्यकता नहीं कि यौन-हिंसा या य़ौन-उत्पीड़न के अनगिनत रूप-स्वरूप हैं और हर कोई यह हिंसा करने के सक्षम है. चिंता का विषय यह है कि जब नेता, अभिनेता और क़ानून बनाने वाले सांसद भी यौन-उत्पीड़न के परपीड़ासुख से मुक्त नहीं कहे जा सकते, तो फिर उत्पीड़ितों को कौन और कैसे मुक्ति देगा?

लड़कियों और महिलाओं के यौन-उत्पीड़न का वैश्विक आयाम वास्तव में जितना विशाल और भयावह है, उसके प्रति चेतना और जानकारी उतनी ही क्षुद्र और हास्यास्पद है. उत्पीड़ित महिलाओं का ही जीवन नरक नहीं बन जाता, उनकी मर्मांतक पीड़ा की छाया में पले बच्चों के भावी विकास का भी बेड़ा ग़र्क हो जाता है.