भारतीय रिजर्व बैंक (आरबीआई) की अगुवाई में मौद्रिक नीति समिति ने हर दो महीने पर होने वाली समीक्षा बैठक के बाद बुधवार को ब्याज दरों को जस का तस रखने का निर्णय लिया. इसके तहत रेपो दर (बैंकों से छोटी अवधि के कर्जों पर वसूली जाने वाली ब्याज दर) अगस्त में हुई कटौती के बाद के छह फीसदी के स्तर पर बनी रहेगी. वहीं रिवर्स रेपो दर (छोटी अवधि के लिए आरबीआई के पास रखी गई जमा राशि पर मिलने वाली ब्याज दर) भी 5.75 फीसदी पर बनी रहेगी. आरबीआई के इन फैसलों से कर्ज के और सस्ता होने की उम्मीदें एक बार फिर धूमिल हो गईं .

ब्याज दरें स्थिर रखने के अलावा आरबीआई ने बुधवार को मौजूदा वित्त वर्ष की दूसरी छमाही के लिए खुदरा महंगाई का अनुमान थोड़ा बढ़ा दिया है. अब दूसरी छमाही में महंगाई दर 4.3 से 4.7 फीसदी के बीच रहने का अनुमान है जबकि पहले यह आंकड़ा 4.2-4.6 फीसदी था. वहीं उसने ब्याज दर पर अपना रुख पहले की तरह ‘तटस्थ’ रखा है. इसका मतलब समझाते हुए उर्जित पटेल ने कल भी कहा कि तय सीमा से ज्यादा महंगाई होने पर आरबीआई ब्याज दरें बढ़ाने से नहीं चूकेगा. दूसरी ओर विकास दर (सकल मूल्य वर्द्धन यानी जीवीए) के बारे में केंद्रीय बैंक ने कहा कि मौजूदा वित्त वर्ष (2017-18) में यह 6.7 फीसदी रहेगी. इससे पहले आरबीआई ने अगस्त में ही विकास दर का अपना अनुमान 7.3 से घटाकर 6.7 फीसदी कर दिया था. वहीं तीसरी और चौ​थी तिमाही में विकास दर क्रमश: सात और 7.8 फीसदी रह सकती है.

आरबीआई अपनी साख से समझौता करने के मूड में नहीं है

इस तरह देखें तो आरबीआई की इस बैठक में ऐसा कुछ भी नहीं हुआ जिसे ‘अप्रत्याशित’ कहा जाए. बात चाहे ब्याज दर की हो या विकास दर और खुदरा महंगाई दर के अनुमान की, हर मामले में आरबीआई का रुख उम्मीद के अनुसार ही रहा. इसलिए अब आलोचक भी कहने लगे हैं कि देश के केंद्रीय बैंक की नीतियां लगातार स्थिर और पारदर्शी होती जा रही हैं.

असल में रघुराम राजन के समय से आरबीआई नीतिगत दरें निर्धारित करने की प्रणाली को पारदर्शी बनाने की कोशिशों में जुटा है. साथ ही वह यह भी चाहता है कि इसमें अनिश्चितता कम से कम हो. इसके लिए उसने अप्रैल 2014 में नई मौद्रिक नीति लागू की. इसमें ब्याज दरों के जरिए खुदरा महंगाई को चार फीसदी के आसपास बनाए रखने का लक्ष्य तय किया गया. मौजूदा गवर्नर ​उर्जित पटेल भी राजन की नीति को आगे बढ़ा रहे हैं. केंद्रीय बैंक ने कई बार कहा कि अब वह दौर गया जब ब्याज दरें कुछ महीनों के अंतराल में कम या ज्यादा कर दी जाती थीं. यह भी कि अब बिना महंगाई घटे ब्याज दरों को घटाना मुमकिन नहीं.

जानकारों के अनुसार आरबीआई को इस बात के लिए श्रेय दिया जाना चाहिए किे उसने इस मामले में यूपीए और एनडीए दोनों ही सरकारों के दबाव को अपने पर हावी नहीं होने दिया. अभी पिछले ही हफ्ते प्रधानमंत्री की आर्थिक सलाहकार परिषद की सदस्य आशिमा गोयल ने आरबीआई की तीखी आलोचना की थी. उन्होंने कहा कि पिछले तीन-चार सालों में वास्तविक महंगाई हमेशा आरबीआई के अनुमान से करीब आधा प्रतिशत कम रही. उन्होंने इसके अलावा आरबीआई से मांग की कि वह ब्याज दर को खुदरा महंगाई दर से केवल एक प्रतिशत ही ज्यादा रखे. लेकिन आरबीआई को इन तर्कों से कोई फर्क नहीं पड़ा. इसके कई कारण हैं. अभी कई एजेंसियों और जानकारों का मानना है कि यदि सब कुछ ऐसे ही चला तो 2018 के मध्य तक खुदरा महंगाई पांच फीसदी के पार चली जाएगी. आरबीआई ने कल के संवाददाता सम्मेलन में भी इन कारणों को सामने रखा.

महंगाई बढ़ाने वाले संभावित कारक

1. 2017 में कच्चे तेल के दाम में उम्मीद से ज्यादा तेजी देखी गई. पहली छमाही में ब्रेंट क्रूड आॅयल 50 डॉलर प्रति बैरल के आसपास था. पिछले तीन सालों में यह इसी स्तर पर रहा है. लेकिन पिछले तीन-चार महीनों से यह 60 डॉलर के पार चला गया है. फिलहाल यह 62 डॉलर के आसपास है. आगे भी इसके इसी स्तर पर बने रहने की संभावना है. जापानी वित्तीय फर्म नोमुरा का मानना है कि जब भी कच्चे तेल में 10 डॉलर प्रति बैरल की तेजी आती है तो इससे महंगाई 0.6-0.7 फीसदी बढ़ जाती है. इस​ लिहाज से सबकी चिंता बढ़ाने में कच्चे तेल का बड़ा योगदान है.

2. केंद्र का राजकोषीय घाटा मौजूदा वित्त वर्ष में 3.2 के बजाय 3.5 फीसदी रह सकता है. वहीं राज्यों के मामले में यह 2.6 के बजाय तीन फीसदी तक जा सकता है. यानी देश का कुल राजकोषीय घाटा मौजूदा वित्त वर्ष में 6.5 फीसदी रह सकता है. यह अनुमान से 0.7 फीसदी ज्यादा होगा. इसके पीछे किसानों की कर्ज माफी, जीएसटी के चलते राजस्व में कमी जैसे कारक जिम्मेदार हैं. वहीं केंद्र सरकार की योजना अब कॉरपोरेट टैक्स को 30 से घटाकर 25 फीसदी करने की है. ऐसी हालत में अगले वित्त वर्ष में राजकोषीय घाटे को घटाकर तीन फीसदी करना बहुत मुश्किल होगा. ऐसे में खुदरा महंगाई को चार फीसदी तक नियंत्रित करना आरबीआई के लिए कठिन चुनौती होगी.

3. केंद्र ने एक जुलाई, 2018 से सातवें वेतन आयोग के तहत लंबित आवासीय और अन्य भत्तों को देने की घोषणा कर दी है. इससे अनुमान है कि महंगाई में करीब 0.3 फीसदी की वृद्धि हो सकती है.

4. इस साल मानसून के ज्यादा अच्छा न रहने से खरीफ और रबी दोनों फसलों का उत्पादन पिछले साल से कम रहने का अनुमान है. इससे अनाज और उद्योगों के कच्चे माल के महंगा होने का अनुमान है.

5. दिसंबर के मध्य में अमेरिका के केंद्रीय बैंक फेडरल रिजर्व द्वारा ब्याज दरों में एक बार फिर चौथाई फीसदी की वृद्धि किए जाने का अनुमान है. वहीं डोनाल्ड ट्रंप सरकार ने पिछले तीन दशकों का सबसे बड़ा कर सुधार करते हुए कॉरपोरेट टैक्स में करीब 40 फीसदी की कटौती करने की घोषणा कर दी है. इससे कंपनियों को 35 के बजाय केवल 20 फीसदी कर देना होगा. इन दोनों वजहों से रुपये की तुलना में डॉलर के मजबूत होने की संभावना है. इससे देश का आयात महंगा हो सकता है जिससे महंगाई बढ़ सकती है.

इन्हीं वजहों से मौद्रिक नीति समिति की इस बैठक से पहले ही ज्यादातर जानकार कह रहे थे कि आरबीआई इस बार भी अपनी ब्याज दरें नहीं घटाएगा. रॉयटर्स के एक सर्वेक्षण में भाग लेने वाले 54 में से 52 अर्थशास्त्रियों ने लगभग इन्हीं कारकों का हवाला देकर नीतिगत दरें न बदलने का अनुमान जताया था. वहीं बिजनेस स्टैंडर्ड के सर्वेक्षण में भी सभी 10 अर्थशास्त्रियों ने यथास्थिति का अनुमान जताया था. आरबीआई की नीतियों में बढ़ती स्थिरता और पारदर्शिता का इससे बड़ा सबूत और क्या हो सकता है?