बाबा साहेब अंबेडकर के महापरिनिर्वाण दिवस की पूर्व संध्या पर केंद्र सरकार ने अंतरजातीय शादियों को आर्थिक प्रोत्साहन देने वाली योजना में पांच लाख रुपये की सालाना आय की सीमा खत्म करने का फैसला किया है. ‘डॉक्टर अंबेडकर स्कीम फॉर सोशल इंटिग्रेशन थ्रू इंटर कास्ट मैरिज’ नाम की इस योजना के तहत उन दंपतियों को ढाई लाख रुपये दिए जाते हैं जिनमें से कोई एक दलित समुदाय का हो. 2013 में शुरू की गई इस योजना का मकसद बिलकुल सीधा है : ज्यादातर लोग जो जाति से बाहर शादी करते हैं उन्हें सामाजिक बहिष्कार का सामना करना पड़ता है और ऐसे में सरकार द्वारा मिली आर्थिक मदद रूढ़िवादी समाज से बाहर उन्हें अपना नया जीवन शुरू करने में मददगार साबित होती है.

केंद्र के अलावा अंतरजातीय शादियों को बढ़ावा देने वाली ऐसी ही योजनाएं कई राज्य सरकारें भी चला रही हैं. लेकिन आंकड़े बताते हैं कि इन योजनाओं का असर बहुत ही सीमित है. राष्ट्रीय परिवार स्वास्थ्य सर्वेक्षण (एनएफएचएस-3) (2005-06) के मुताबिक देश में सिर्फ 11 प्रतिशत शादियां अंतरजातीय थीं.

देश में आज भी बहुसंख्यक लोग अपनी रिश्तेदारियां जाति में ही करना चाहते हैं. यह इस लिहाज से बुरा संकेत है कि इससे सामाजिक रुढ़िवादिता को बढ़ावा मिलता है. बुनियादी तौर पर शादी नाम का यह सामाजिक संस्थान जाति व्यवस्था को कायम रखने और मजबूत करने का काम करता है. इसीलिए बाबा साहेब अंबेडकर ने लिखा था, ‘जाति तोड़ने का असली उपाय है अंतरजातीय शादियां. इसके अलावा और कुछ नहीं.’ अंबेडकर का मानना था कि यही एक तरीका है जिससे जातियां विघटित होंगी. महात्मा गांधी शुरू में वर्ण व्यवस्था के समर्थक थे. लेकिन बाद के सालों में उन्होंने यह नियम बना दिया था कि उनके आश्रम में सिर्फ वही अंतरजातीय हो सकती हैं जिनमें वर या वधु दलित समुदाय से हो.

इस गणतंत्र की स्थापना करने वाले हमारे पुरखों की सोच बिलकुल साफ थी कि जाति व्यवस्था खत्म होनी चाहिए. लेकिन सवाल है कि आखिर इस मकसद को हासिल कैसे किया जाए? श्रीनारायण गुरु से लेकर अंबेडकर, पेरियार, ईवी रामास्वामी और राममनोहर लोहिया तक मानते थे कि दमित जातियों का राजनीतिक सशक्तिकरण जाति व्यवस्था खत्म करने की दिशा में पहला कदम है.

देश में चले जाति-विरोधी राजनीतिक आंदोलनों का जोर इस पर रहा है कि निचली जातियां मजबूती से अपनी अस्मिता का झंडा बुलंद करें. फिर इसे जाति विरोधी राजनीतिक लामबंदी की तरह से पेश भी किया गया. जाति व्यवस्था के खिलाफ इस लड़ाई में अंतरजातीय शादियों को एक महत्वपूर्ण हथियार माना गया था. लेकिन इस हलचल के बीच सतह के नीचे कहीं इन आंदोलनों का मकसद गुम हो गया. चुनावी राजनीति में एक दूसरे से प्रतिस्पर्धा कर रही जातियों को अब लोहियावादी और अंबेडकरवादी संख्याबल के आधार पर आंकते हैं और अब इसी आधार पर राजनीतिक मोलभाव होता है.

पहले निचली जातियां जोरदार तरीके से अपनी अस्मिता की बात करती थीं लेकिन अब इनमें एक जातिगत गौरव की भावना आ रही है. इससे जाति व्यवस्था और मजबूत हो गई है. यही वजह है कि आज अंतरजातीय विवाह किसी भी मुख्यधारा की पार्टी के राजनीतिक एजेंडे में नहीं हैं. और इससे बुरी बात यह है कि आज राजनेता इस मामले में ज्यादा रुढ़िवादी पक्ष की ओर खड़े दिखना चाहते हैं. यह एक तरह से विवाह के जरिए जाति व्यवस्था को संरक्षण देने की कवायद है. (स्रोत)