गुजरात विधानसभा चुनाव में देरी का फैसला निर्वाचन आयोग के लिए अब तक परेशानी बना हुआ है. द इंडियन एक्सप्रेस ने इस सिलसिले में एक खबर दी है. इसमें सूचना के अधिकार (आरटीआई) के तहत मिली जानकारी के हवाले से बताया गया है कि आयोग ने बाढ़ राहत कार्यों की वजह से गुजरात में थोड़ी देर से चुनाव कराने का फैसला किया. इसके साथ ही यह सवाल भी उठाया गया है कि जब गुजरात की तरह ही 2014 में जम्मू-कश्मीर बाढ़ से जूझ रहा था तो आयोग ने वहां विधानसभा चुनाव की तारीखें आगे खिसकाने में रुचि क्यों नहीं दिखाई?

चुनाव आयोग ने अख़बार को बताया है कि इस साल अक्टूबर में गुजरात के मुख्य सचिव ने एक पत्र लिखा था. इसमें आग्रह किया था कि विधानसभा चुनाव की तारीखें आगे बढ़ाई जाएं ताकि चुनाव आचार संहिता के कारण बाढ़ राहत कार्य प्रभावित न हों. अक्टूबर की 12 तारीख को हिमाचल प्रदेश की चुनाव तारीखें घोषित करते समय मुख्य निर्वाचन आयुक्त एके जाेति ने भी यही दलील दी थी. उन्होंने कहा था कि गुजरात में जुलाई में भारी बाढ़ आई और सितंबर से राहत कार्य शुरू हो पाए. इन्हें पूरा करने के लिए गुजरात ने समय मांगा है.

लेकिन दिलचस्प बात ये है कि आयोग की यही दलील 2014 में जम्मू-कश्मीर के विधानसभा चुनाव के मामले में लागू नहीं हुई. वहां 25 नवंबर से 20 दिसंबर 2014 के बीच पांच चरणाें में विधानसभा चुनाव कराए गए. जबकि सितंबर 2014 में वहां भी बीते कई दशक बाद भीषण बाढ़ आई थी. लेकिन इसके बावजूद आयोग ने चुनाव तारीखें नहीं टालीं. हालांकि बाढ़ राहत कार्यों को चुनाव आचार संहिता के दायरे से बाहर जरूर रखा. यानी चुनाव के दौरान भी तत्कालीन सरकार को बाढ़ रहत कार्य पहले की तरह करते रहने की इजाजत दी थी.

मतलब साफ है कि महज बाढ़ राहत कार्यों के कारण चुनाव टाले की जाने की कोई वजह ही नहीं थी. क्योंकि जम्मू-कश्मीर की तरह गुजरात में भी बाढ़ राहत कार्यों को चुनाव आचार संहिता के दायरे से बाहर रखा जा सकता था. और अगर इसी एक कारण से चुनाव टाले जाना जरूरी था तो फिर जम्मू-कश्मीर के लिए भी ऐसा फैसला क्यों नहीं किया गया. इस बाबत आयोग ने अख़बार को बताया है कि जम्मू-कश्मीर सरकार की ओर से चुनाव टालने के लिए कोई औचचारिक आग्रह नहीं किया गया था. इसलिए वहां समय पर चुनाव कराए गए.