फिल्म निर्माता संजय लीला भंसाली की ‘पद्मावती’ को सेंसर बोर्ड (केंद्रीय फिल्म प्रमाणन बोर्ड-सीबीएफसी) की हरी झंडी जल्द मिल पाएगी इसकी संभावना दिख नहीं रही है. हिंदुस्तान टाइम्स के मुताबिक इस फिल्म को सीबीएफसी का प्रमाण पत्र तभी मिलेगा जब देश के कुछ ‘चुनिंदा’ इतिहासकार इस पर मुहर लगा देंगे.

अख़बार के मुताबिक सूचना एवं प्रसारण मंत्रालय ने इस सिलसिले में मानव संसाधन विकास मंत्रालय को पत्र लिखा है. इसमें आग्रह किया गया है कि उसे देश के कुछ जाने-माने इतिहासकारों की सूची उपलब्ध कराई जाए. इन इतिहासकारों को यह जिम्मेदारी दी जाएगी कि वे ‘पद्मावती’ फिल्म देखें और उसमें बताए गए ऐतिहासिक तथ्यों का मिलान करें, और फिर बताएं कि फिल्म में जिन ऐतिहासिक तथ्यों का उल्लेख है वे सही हैं या फिर उनसे छेड़छाड़ हुई है.

इससे पहले 30 नवंबर को सीबीएफसी के मुखिया प्रसून जोशी ने सूचना एवं प्रसारण मंत्रालय की संसदीय समिति के सामने भी कहा था कि फिल्म को तब तक रिलीज़ नहीं किया जाएगा जब तक इतिहासकारों की इस पर मुहर नहीं लग जाती. जबकि इसी संसदीय समिति को भंसाली ने बताया था कि फिल्म की कहानी ‘काल्पनिक विषयवस्तु’ पर आधारित है. ग़ौरतलब है कि ‘पद्मावती’ को ब्रिटिश सेंसर बोर्ड की मंजूरी मिल चुकी है लेकिन भारत में नहीं मिली है. इस वजह से यह फिल्म अब तक रिलीज़ नहीं हो सकी है. जबकि इसे दिसंबर के पहले सप्ताह में रिलीज होना था.

फिल्म पर मध्य प्रदेश, उत्तर प्रदेश, बिहार, गुजरात, राजस्थान की सरकारों ने रोक लगा दी है. साथ ही करणी सेना जैसे राजपूत संगठन इसका खुला विरोध कर रहे हैं. इन संगठनों का आरोप है कि 14 वीं सदी में मेवाड़ के राजा रहे रावल रतन सिंह की रानी पद्मावती की कहानी को इस फिल्म में गलत संदर्भों के साथ पेश किया गया है. ऐतिहासिक तथ्यों के साथ छेड़छाड़ की गई है. इसलिए वे इस फिल्म को रिलीज़ नहीं होने देंगे.