आखिरकार अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने तमाम अटकलों पर विराम लगाते हुए जेरुसलम को इजरायल की राजधानी के रूप में मान्यता दे दी है. इस तरह उन्होंने इजरायल को लेकर सालों से चली आ रही अमेरिका की नीति को पलट दिया है. इस फैसले के मुताबिक अब अमेरिकी दूतावास को तेल अवीव से जेरुसलम स्थानांतरित किया जाएगा.

एक दूसरे से जुड़े इन दोनों कदमों से पश्चिमी एशिया और मध्य-पूर्व एशिया में नए सिरे से अस्थिरता बढ़ने की आशंका पैदा हो गई है. अब इजरायल-फिलस्तीन के बीच चल रही शांति वार्ता का भविष्य संकट में दिख रहा है और अरब देशों में भी एक तरह की बेचैनी देखी जा रही है. इस वक्त भारत को किसी भी परिस्थिति में इन फैसलों के लिहाज से अपनी नीति नहीं बदलनी चाहिए.

हाल के सालों में इजरायल-फिलस्तीन विवाद से जुड़े सभी पक्षों का झुकाव इस समाधान की तरफ हो चला था कि यहां इन्हीं दो नामों से दो स्वतंत्र देशों को मान्यता मिल जानी चाहिए. वहीं जेरुसलम पर सभी पक्षों के बीच एक सहमति बननी बाकी थी. दरअसल 1967 के युद्ध में इजरायल ने पूर्वी जेरुसलम पर कब्जा कर लिया था, जबकि फिलस्तीनी जनता मानती रही है कि यह उनके भविष्य की राजधानी है.

लेकिन ट्रंप ने पूरे जेरुसलम को राजधानी के तौर पर मान्यता देकर इजरायल को इस इलाके में अपनी बसाहटों का विस्तार करने का भी अधिकार दे दिया है. पूर्वी जेरुसलम में तकरीबन एक लाख फिलस्तीनी रहते हैं, लेकिन यह क्षेत्र इजरायल के कब्जे में आने के बाद इनकी स्थिति म्यांमार के रोहिंग्याओं जैसी हो सकती है.

ट्रंप का यह फैसला इस धारणा को भी मजबूत करेगा कि मुस्लिम दुनिया के खिलाफ यहूदी और ईसाइयों की गुटबंदी है. हालांकि इससे अमेरिका में मौजूद रूढ़िवादी ईसाइयों में ट्रंप की पकड़ और मजबूत होगी, लेकिन वहीं दूसरी तरफ यह फैसला अमेरिकी कूटनीति को कमजोर भी बनाएगा. इस माहौल में मुस्लिम देशों के लिए अमेरिका का साथ देना मुश्किल हो जाएगा क्योंकि तब इन्हें अपने यहां इस्लामिक कट्टरपंथ के उभार के खतरे से भी जूझना होगा. कुल मिलाकर इससे अमेरिकी हितों को ही नुकसान पहुंचेगा.

अरब देशों और पश्चिम एशिया के इस क्षेत्र में अस्थिरता बढ़ने का सीधा असर तेल की कीमतों पर भी पड़ सकता है. इनमें अचानक तेजी आ सकती है. अगर ऐसा हुआ तो इसके चलते मंदी से उबर रही वैश्विक अर्थव्यवस्था के साथ-साथ भारत जैसे तेल आयातक देशों के लिए कई मोर्चों पर मुश्किल खड़ी हो जाएगी. (स्रोत)