कोई महिला अगर किसी दूसरे धर्म के पुरुष के साथ शादी कर ले तो उसका धर्म नहीं बदल जाता. गुरुवार को सर्वोच्च न्यायालय के मुख्य न्यायाधीश जस्टिस दीपक मिश्रा, जस्टिस एके सीकरी, एएम खानविलकर, डी वाई चंद्रचूड़ और अशोक भूषण की पीठ ने स्पेशल मैरिज एक्ट का संदर्भ देते हुए यह टिप्पणी की. उसने कहा कि अलग-अलग धर्म के महिला और पुरुष, शादी के बाद भी अपनी धार्मिक मान्यताओं और परंपराओं को जारी रख सकते हैं.

अदालत के मुताबिक किसी गैर धर्म में शादी के बाद महिला का धर्म उसका पति का धर्म हो जाए, इसका सवाल ही नहीं उठता. शीर्ष अदालत ने कहा कि जब एक पुरुष किसी अन्य धर्म की महिला के साथ शादी करके अपनी धार्मिक मान्यताओं को जारी रख सकता है और अपने समुदाय में बना रहता है तो आखिर महिला को इस अधिकार से भला कैसे वंचित किया जा सकता है. यह पूूरी तरह से उस महिला पर निर्भर करता है कि किसी अन्य धर्म के पुरुष से शादी के बाद वह अपनी धार्मिक मान्यताओं को छोड़ना चाहती है या नहीं.

सुप्रीम कोर्ट ने यह निर्णय एक पारसी महिला गुलरोख एम गुप्ता की याचिका पर सुनाया. गुप्ता ने गुजरात उच्च न्यायालय द्वारा साल 2010 में सुनाए गए उस फैसले को चुनौती दी थी, जिसमें कहा गया था कि गैर धर्म में शादी करने के बाद पारसी धर्म की महिला की पहचान उसके समुदाय में खत्म हो जाती है. गुलरोख ने सर्वोच्च न्यायालय में 2012 में अपील की थी. इसमें उन्होंने कहा कि स्पेशल मैरिज एक्ट के अनुसार हिंदू लड़के से शादी के बाद भी पारसी समुदाय में उसकी जगह बनी रहनी चाहिए. उनकी जब एक पारसी लड़का किसी गैर धर्म की लड़की से शादी से करके अपने समुदाय में बना रह सकता है तो आखिर एक लड़की से उसके अधिकार क्यों छिन जाते हैं.

गुलरोख की तरफ से मामले की पैरवी कर रही अधिवक्ता इंदिरा जयसिंह ने कहा कि किसी समुदाय की रीतियां और प्रथाएं किसी व्यक्ति के अधिकारों और संविधान की अवधाराणाओं से उपर नहीं मानी जा सकती. इस पर सर्वोच्च न्यायालय की संवैधानिक पीठ ने वलसाड पारसी ट्रस्ट की ओर से पैरवी कर रहे वरिष्ठ अधिवक्ता गोपाल सुब्रह्मण्यम से कहा कि वह इस महीने की 14 दिसंबर को न्यायालय का इस बात से अवगत कराएं कि क्या एक हिन्दू व्यक्ति से शादी करने वाली पारसी महिला गुलरोख को उसके माता-पिता के अंतिम संस्कार में शामिल होने की अनुमति दी जा सकती है.