निर्देशक : मृगदीप सिंह लांबा

लेखक : विपुल विग, मृगदीप सिंह लांबा

कलाकार : पुलकित सम्राट, वरुण शर्मा, मंजोत सिंह, अली फजल, ऋचा चड्ढा, पंकज त्रिपाठी, विशाखा सिंह, प्रिया आनंद

रेटिंग : 2.5 / 5

‘फुकरे रिटर्न्स’ एक तकरीबन मजेदार फिल्म है. बाकियों की बात बाद में, लेकिन चूचा बनकर वरुण शर्मा हंसा-हंसाकर सर में दर्द कर देते हैं. उनका बुद्धू किरदार इस साल का सबसे सुघड़ तरीके से लिखा गया कॉमिक किरदार भी है और वरुण ने उसे ‘फुकरे’ की ही तरह इस बार भी निराले अंदाज में अभिनीत किया है. इतना खूब कि इंडस्ट्री में स्टीरियोटाइप होने की कगार पर खड़े होने के बावजूद यह कॉमेडियन, घोषित होने से पहले ही, हमारे द्वारा (नहीं) दिए जाने वाले फिल्म पुरस्कारों में ‘सर्वश्रेष्ठ हास्य कलाकार - 2017’ का प्रतिष्ठित अवॉर्ड अपने नाम कर लेता है!

दिक्कत बस इतनी है कि धागे की मोटाई बराबर ‘फुकरे रिटर्न्स’ की कहानी है. पहली फिल्म के खत्म होने के एक साल बाद इस सीक्वल की कहानी शुरू होती है और जेल से बाहर निकलकर भोली पंजाबन (ऋचा चड्ढा) खुशहाल चार फुकरों और पंकज त्रिपाठी की राह का दोबारा रोड़ा बनती है. लेकिन जहां पिछली बार 2013 में, स्कूल से निकलकर कॉलेज जाने का सपना देख रहे फुकरे मासूम हरकतों की वजह से गलतियां करते थे, 2017 में उनका वास्ता भ्रष्ट नेता से पड़ता है. और आपको पता ही है कि भ्रष्ट नेताओं वाली हिंदी फिल्में किन पुरातन रास्तों पर चलती हैं!

‘फुकरे रिटर्न्स’ को संपूर्णता में यही नेता एंगल मजेदार फिल्म बनाते-बनाते कमजोर फिल्म बना देता है. नेता बने राजीव गुप्ता (‘पान सिंह तोमर’ वाले) खालिस दमदार काम करते हैं - एक बार फिर याद दिलाते हुए कि उन्हें अच्छा काम कम देकर इंडस्ट्री अपना ही नुकसान कर रही है - लेकिन लचर पटकथा से मुकाबला करने में वे भी अक्षम नजर आते हैं. नेताओं की टिपिकल भ्रष्टता टिपिकल अंदाज में ही दिखाने के अलावा नायकों व नायिका द्वारा खलनायक से जूझना भी दिलचस्पी पैदा नहीं कर पाता.

यहां एक ये भी कमी है कि दूसरे हिस्से में गड़बड़झालों के दौरान कई पगलैट किरदार होने के बावजूद, दृश्यों में उस स्तर का पागलपन नहीं रचा जाता जो ऐसी कॉमेडी फिल्मों को रोचक बनाने के बहुत काम आता है. भले ही शेर, लॉटरी, सुरंग, सांप जैसी विचित्र चीजें आपस में यहां गुत्थमगुत्था हैं, लेकिन ये सब मिलकर भी कथा में रवानगी नहीं ला पातीं और सिर्फ हास्य पैदा करने वाले कुछ स्टैंड-अलोन दृश्यों को रचने के काम आती हैं.

यह बात भी फिल्म के खिलाफ जाती है कि जहां ‘फुकरे’ में निर्देशक मृगदीप लांबा को बहुत सारा समय चारों आड़े-टेढ़े नायकों को स्थापित करने के लिए मिला था, और इस वजह से फिल्म का आखिरी एक्ट कम सयाना होने के बावजूद अखरा नहीं था, वहीं ‘फुकरे रिटर्न्स’ में निर्देशक को तुरंत इन मशहूर किरदारों को री-इंट्रोड्यूस करके मुख्य कहानी कहनी पड़ती है. और ये कहानी अपने आप में, जैसा कि हम पहले बता चुके हैं, धागे की मोटाई बराबर पतली है.

ऐसे में हास्य ही ‘फुकरे रिटर्न्स’ का सारथी बनता है. हालांकि ये सिचुएशनल कम होकर संवाद आधारित ज्यादा है इसलिए सिर्फ टुकड़ों-टुकड़ों में हंसी के फव्वारे छूटते हैं. लेकिन इतना काबिल तो है ही कि फिल्म को अंत तक औसत से थोड़ा बेहतर बनाए रखे. विपुल विग और मृगदीप सिंह लांबा अपने संवादों को किसी साजिद-फरहाद की तरह किरदारों पर थोपते भी नहीं हैं बल्कि हर किरदार के मिजाज अनुसार ही संवाद उन्हें देते हैं. इसीलिए अपने अफ्रीकी गुर्गों को हिंदी वाक्य समझाने के लिए भोली पंजाबन ‘मिट्टी के तेल’ को ‘ऑइल ऑफ मड’ कहती है तो एक आशिक-आवारा सरीखे नायक से फिल्म यह गंभीर संवाद भी हल्के-फुल्के से दृश्य में कहलवा ले जाती है –‘जात के जमाने लद गए, औकात का जमाना है अब तो.’

वरुण शर्मा के पास खासतौर पर फिल्म के ज्यादातर बेहतरीन संवाद हैं और जितने भी दिलचस्प सिचुएशनल सीन हैं, उन्हें वे ही कमाल बनाते हैं. फिल्म के शुरुआती एक घंटे में तो उनकी वजह से घनघोर हास्य पैदा होता है और गाढ़ी दोस्ती पर मजाक के बहाने ही सही फिल्म बढ़िया दर्शन देती है. भोली पंजाबन के रोल में ऋचा चड्ढा उतनी खुर्राट नजर नहीं आती जितनी वे ‘फुकरे’ में थीं (वह उनकी शुरुआती फिल्मों में थी इसलिए शायद बात अलग थी) फिर भी अपने बेबाक रूप में काफी दर्शनीय रहती हैं. ‘फुकरे’ की सफलता में उनका और वरुण शर्मा का मुख्य रूप से हाथ था इसलिए ‘फुकरे रिटर्न्स’ में ये दोनों ही प्रमुखता से छाए रहते हैं और जब भी वरुण सीन में अकेले होते हैं, या वरुण व ऋचा साथ होते हैं, ‘फुकरे रिटर्न्स’ एकदम ‘फुकरे’ जितनी बढ़िया फिल्म बन जाती है. अच्छा ही हुआ कि आखिर तक ये दोनों साथ-साथ बने रहते हैं!

हालांकि फिल्म में इन दोनों का छाना बाकी कलाकारों के साथ अन्याय कर देता है. पुलकित सम्राट भले ही हनी वाले अपने रोल में जंचते हैं (खुदा का शुक्र है कि सलमान खान बनने की एक और कोशिश उन्होंने नहीं की!) लेकिन फिल्म उन्हें पहली बार की तरह ज्यादा आगे आने के मौके नहीं देती. लाली के रोल में मंजोत सिंह भी सिर्फ रिक्त स्थान भरते हैं और अली फजल तो लगभग पूरी ही फिल्म में आउट ऑफ फोकस रहते हैं, जहां नहीं रहते, वहां खुद को कर लेते हैं.

‘फुकरे रिटर्न्स’ में पंकज त्रिपाठी कमाल करते हैं और हम सोचते हैं कि कितना घिसा-पिटा वाक्य हो गया है अब ये और कि कैसे इसे पढ़ने वालों के लिए दिलचस्प बनाया जाए! लेकिन दिलचस्प है यह समझना कि पंकज त्रिपाठी के अभिनय में जो ठहराव अब हर फिल्म में नजर आता है, उसको उन्होंने धीरे-धीरे गढ़ा है. उनकी शुरुआती फिल्मों में वे उसी रफ्तार से संवाद बोलते थे, और कैमरा भी उन पर उतनी ही देर के लिए ठहरता था, जितना कि अभिनय के नियम-कायदों में लिखा है. ‘फुकरे’ भी एक ऐसी फिल्म थी जिसमें यह ऐसा ठहराव कम था, और इसीलिए ‘फुकरे रिटर्न्स’ में जब पंकज त्रिपाठी उसी पंडित जी के किरदार में लौटते हैं तो उसे वहीं से कंन्टीन्यू करते हैं जहां 2013 में छोड़ आए थे. इसे सिनेमा में कंन्टीन्यूटी कहा जाता है और जहां एक फिल्म में सीन दर सीन इसे बनाए रखने में अभिनेताओं के प्राण सूख जाते हैं, अपने अभिनय का तरीका बदल चुके पंकज त्रिपाठी चार साल बाद भी एक रोल की कन्टीन्यूटी को बनाए रखते हैं.

हम तो ‘फुकरे रिटर्न्स’ इसी अभिनेता के लिए दोबारा भी देख सकते हैं, शायद कुछ नया और मिल जाए!